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    संजय द्विवेदी

    संजय द्विवेदी

    चौदह साल सक्रिय पत्रकारिता के दौरान संजय द्विवेदी ने दैनिक भास्कर, स्वदेश, नवभारत, हरिभूमि जैसे अखबारों में स्थानीय संपादक, समाचार संपादक जैसी जिम्मेदारियां निभायीं। इंफो इंडिया डाट काम (मुंबई) से भी जुड़े रहे। छत्तीसगढ़ के पहले सेटलाइट चैनल जी 24 घंटे में बतौर इनपुट एडीटर और एंकर रहे। देश के अनेक प्रमुख समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में राजनीति और मीडिया के संदर्भों पर उनका नियमित लेखन आज भी जारी है।

    संजय द्विवेदी वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (भोपाल) में एसोसिएट प्रोफेसर एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका “मीडिया विमर्श” के कार्यकारी संपादक हैं। इससे पूर्व वे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में रीडर और विवि की कार्यपरिषद के सदस्य रहे। संजय द्विवेदी की अबतक 8 पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं, जिनमें शावक (बाल कविता संग्रह), सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता (शोध), मोदी लाइव (राजनीतिक विश्लेषण) तथा 5 लेख संग्रहों का समावेश है। उन्होंने राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता से सम्बंधित 11 पुस्तकों का संपादन किया है। अपने कुशल लेखन तथा सम्पादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित संस्था और संस्थानों ने विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया है। 

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    धनबल, बाहुबल, जनबल के इस युग में जहां सामाजिक परिर्वतन को सिरमौर बनने की दृष्टि से देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक गिरावट के दौर में एक ऐसा व्यक्तित्व भी देखने को मिलता है, जो लोगों की आस्था का केंद्र बनता है। लोग उनके लिए न सिर्फ आंसू बहाते ..

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    भोपाल में संपन्न हुए लोकमंथन आयोजन के बहाने भारतीय बौद्धिक विमर्श में एक नई परंपरा का प्रारंभ देखने को मिला। यह एक ऐसा आयोजन था, जहां भारत की शक्ति, उसकी सामूहिकता, बहुलता-विविधता के साथ-साथ उसकी लोकशक्ति और लोकरंग के भी दर्शन हुए। यह आयोजन इस अर्थ ..

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    देश में इस वक्त यह बहस तेज है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। देखने और सुनने में यह विचार बहुत सराहनीय है और ऐसा संभव हो पाए तो सोने में सुहागा ही होगा।..

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    मीडिया की ताकत आज सर्वव्यापी है और कई मायनों में सर्वग्रासी भी। ऐसे में विकास के सवालों और उसके लोकव्यापीकरण में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो उठी है। यह एक ऐसा समय है, जबकि विकास और सुशासन के सवालों पर हमारी राजनीति में बात होने लगी है, तब ..

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    यह कितना निर्मम समय है कि लोग इतने गुस्से से भरे हुए हैं। दिल्ली में डॉ. पंकज नारंग की जिस तरह पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी, वह बात बताती है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं। साधारण से वाद-विवाद का ऐसा रूप धारण कर लेना चिंता में डॉलता है। लोगों में जैसी ..

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    शिक्षा परिसरों में विचारधारा के नाम पर टकराव संवाद के माध्यम से और मर्यादा में रहे तो ठीक है, किंतु यह टकराव मार-पिटाई, हत्या और आत्महत्या तक जा पहुंचे तो ठीक नहीं है। ..

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    आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई कड़े संकल्पों के कारण धीमी पड़ रही है। पंजाब के हाल के वाकये बता रहे हैं कि हम कितनी गफलत में जी रहे हैं। राजनीतिक संकल्पों और मैदानी लड़ाई में बहुत अंतर है, यह साफ दिख भी रहा है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के रहते ..

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    सड़क से लेकर संसद तक असहिष्णुता की चर्चा है। बढ़ती सांप्रदायिकता की चर्चा है। कलाकार, साहित्यकार सबका इस फिजां में दम घुट रहा है और वे दौड़-दौड़कर पुरस्कार लौटा रहे हैं। राष्ट्रपति से लेकर आमिर खान तक सब इस चिंता में शामिल हो चुके हैं। भारत की सूरत ..

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    राजनीति में विचारों के लिए सिकुड़ती जगह के बीच पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम एक ज्योतिपुंज की तरह सामने आता है। अब जबकि उनकी विचारों की सरकार पूर्ण बहुमत से दिल्ली की सत्ता में स्थान पा चुकी है, तब यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर दीनदयाल उपाध्याय ..

    विशेष24/09/2015
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    मीडिया अपना लक्ष्य पथ भूल गया है। पूरी मीडिया की समझ को लांछित किए बिना यह कहने में संकोच नहीं है कि टीवी मीडिया का ज्यादातर हिस्सा देश का शुभचिंतक नहीं है। वह बंटवारे की राजनीति को स्वर दे रहा है और राष्ट्रीय प्रश्नों पर लोकमत के परिष्कार की जिम्मेदारी ..

    वेध 03/08/2015
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    देश में मध्यप्रदेश इकलौता ऐसा राज्य है, जहां पर आम नागरिकों के हितों की आवाज को बुलंद करने वाले पत्रकारों के हित में पिछले 11 वर्षों में कई क्रांतिकारी निर्णय हुए हैं। इन निर्णयों से मध्यप्रदेश के 52 जिलों में 24 घंटे समाज को समर्पित रहते हुए मीडिया ..

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    सरकारों के भरोसे हिंदी का विकास और विस्तार सोचने वालों को अब मान लेना चाहिए कि राजनीति और सत्ता से हिंदी का भला नहीं हो सकता। हिंदी एक ऐसी सूली पर चढ़ा दी गयी है, जहां उसे रहना तो अंग्रेजी की अनुगामी ही है। आत्मदैन्य से घिरा हिंदी समाज खुद ही भाषा ..

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    विश्व मंच पर भारत की इतनी प्रभावी उपस्थिति शायद पहले कभी नहीं थी। दुनिया के तमाम देश भारत के इस उभार को देख रहे हैं, तो कुछ परंपरागत प्रतिद्वंदी देश भारी दुख और पीड़ा से भर गए हैं। अपनी निरंतर विदेश यात्राओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो हासिल ..

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    उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ का लाभ लेते हुए अगर मध्यप्रदेश सरकार ने जीवन से जुड़े तमाम मुद्दों पर संवाद करते हुए कुछ नया करना चाहा तो इसमें गलत क्या है? सिंहस्थ के पूर्व मध्य प्रदेश की सरकार ने अनेक गोष्ठियां आयोजित कीं और इसमें दुनिया भर के ..

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    संत श्री पवन दीवान ने जब गुडगांव के मेदांता अस्पताल में 2 मार्च, 2016 को आखिरी सांसें लीं तो सही मायने में एक युग का अवसान हो गया। छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा में अपनी पूरी जिंदगी लगा देनेवाले और समाज जीवन के हर मोर्चे पर सक्रिय श्री दीवान की कई स्मृतियां ..

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    देशभर के तमाम हिस्सों से सांप्रदायिक उफान, गुस्सा और हिंसक घटनाएं सुनने में आ रही हैं। वह भी उस समय जब हम अपनी सुरक्षा चुनौतियों से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। एक ओर पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले के चलते अभी देश विश्वमंच पर पाकिस्तान को घेरने की कोशिशों ..

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    प्रदर्शन सड़क पर होने चाहिए और बहस संसद में। लेकिन हो उल्टा रहा है प्रदर्शन संसद में हो रहे हैं, बहस सड़क और टीवी न्यूज चैनलों पर। ऐसे में हमारी संसदीय परम्पराएं और उच्च लोकतांत्रिक आदर्श हाशिए पर हैं। राजनीति के मैदान में जुबानी कड़वाहटें अपने ..

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    किसानों की बदहाली, बाढ़ व सूखा जैसी आपदाएं भारत जैसे देश में कोई बड़ी सूचना नहीं हैं। राजनीति में किसानों का दर्द सुनने और उनके समाधान की कोई परंपरा भी देखने को नहीं मिलती। किंतु पिछले कुछ दिनों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिस ..

    कृषि03/11/2015
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    अब जबकि भोपाल में 10 सितंबर से विश्व हिंदी सम्मेलन प्रारंभ हो रहा है, तो यह जरूरी है कि हम हिंदी की विकास बाधाओं पर बात जरूर करें। यह भी पहचानें कि हिंदी किसकी है और हिंदी की जरूरत किसे है?..