undefined15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्य उगा। सबके मन कमल खिले। सबने राहत की सांस ली पर साथ ही साम्प्रदायिकता की ऐसी भयंकर बाढ़ आई और महंगाई, भ्रष्टाचार व अपराध का कचरा पीछे छोड़ गई। धरती पर स्वार्थों का कचरा (दलदल) इस कदर फैल गया कि कल के स्वर्ण कलश की कल्पना ही तिरोहित हो गई। कितनी ही दीवारें खिंच गई-ऊंच-नीच की, अमीर-गरीब की, जाति वर्ण की, धर्म विश्वास की व इस इतिहास भूगोल की इस प्रकार विश्वासघाती इन समस्याओं ने राष्ट्रीय चेतना के सूर्य को ढक दिया।

स्वतंत्रता हमारा स्वभाव है। हम जब भी स्वभाव से हटते हैं, विभावों की भीड़ हमारे इर्द-गिर्द समस्याओं को खड़ा कर देती है और तब हम स्वतंत्रता के वास्तविक मायनों को ढूंढते हैं। स्वतंत्र भारत का राजनीतिक धरातल भी अपने स्वभाव को छोड़कर विभावों में जीने का आदी होता जा रहा है और इसी ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है। इसी से चुनाव प्रणाली भी दूषित हो गयी है। समस्याएं इतनी सघन और विकट है कि उसके समाधान तलाशे जाने जरूरी हो गये हैं। इसी दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में लिए गए दो फैसले स्वागत योग्य है। इनमें से एक किसी भी सजा पाए व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकता है और दूसरा जेल में बंद व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाता है। इन फैसलों से राजनीति के अपराधीकरण पर कितना नियंत्रण हो पायेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। प्रश्न यहां राजनीति के शुद्धिकरण एवं अपराधमुक्त राजनीति का है। प्रश्न यहां चुनाव प्रणाली को भी दुरस्त करने का है। ज्यादा जरूरी है न्यायपालिका की सक्रियता एवं पुलिस न्यायिक व्यवस्था की। न्याय में देरी ने राजनीति का ही नहीं, पूरे समाज का अपराधीकरण कर डाला है। चुनाव प्रणाली भी काफी हद तक ठीक होने पर भी उसमें अभी भी सुधार की गुंजाइश है। सबसे बड़ी आवश्यकता है ‘फीयर ऑफ एक्शन’ की अर्थात् नियम और कानून को भंग करने पर दण्ड के भय की। क्योंकि उस भय से ही कानून एवं व्यवस्था की पालना करवाई जा सकती। पर अभी जैसे बीज बोये जा रहे हैं उससे अच्छी खेती की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?

राजनीति और व्यापार की कुछ सबसे बड़ी गड़बड़ियां पुलिस न्यायिक व्यवस्था से ही पैदा होती है। अच्छाई और साफ-सुथरी स्थितियों को निर्मित करने के लिए जरूरी है कि चेहरा ही नहीं बदले, दिल भी बदले। सोच को संकल्प के ढांचे में ढाला जाए। इसके लिए हमें ऊंचे मानदंड निर्धारित करने होंगे- अपने लिए भी और नेतृत्व के लिए भी। आज राजनीति में अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अपराध, अराजकता और स्वार्थ से युक्त भावनाओं का बोलबाला है। समस्याओं के घने धुंधलके एवं हमारे पिछड़ेपन का कारण है कि हम ‘स्व-तंत्र’ से जुड़कर रह गए। हमने सिर्फ वही सोचा और वही किया जो व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए जरूरी था। व्यक्ति महत्वपूर्ण होता जा रहा है और राष्ट्र गौण।

चुनाव और भारतीय जीवन दोनों एक-दूसरे के आवश्यक अंग बन गए हैं और जो आवश्यक हो जाता है उसका शुद्ध होना भी उतना ही आवश्यक है। मतदाता हर चुनाव को रचाकर और अधिक अनुभवी व समझदार होकर निकलता है। पर कुछ दिशाएं अभी वह निर्धारित नहीं कर पाया है। लोकतंत्र में सही भूमिका अदा करने का सही प्रशिक्षण अभी उसे मिला नहीं है। जिसके अभाव में वह दिग्भ्रमित है।

खर्चीला, धांधलीभरा एवं धनबल, बाहुबल के दुरुपयोग से निम्नस्तर के हथकण्डे अपनाकर तथा मतदान केन्द्रों पर कब्जा करके जो एक प्रकार का आतंक पैदा किया जाता है उससे किसी सज्जन व चरित्रवान तथा सीमित साधनों वाले व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है तब मतदाता के सामने चयन का उचित विकल्प नहीं रहता।

इस मानसिकता के चलते हम अपने कथित नेतृत्व का सही-गलत सब स्वीकार कर लेते हैं। आखिर क्यों ? कब तक हमें नेताओं का झूठ झूठ नहीं लगता रहेगा ? कब तक हम उनके अपराधों को अपराध नहीं मानते रहेंगे ? कब तक हम नेताओं को साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने की स्वतंत्रता देते रहेंगे ? कब तक नेता लोग जाति के आधार पर हमारी भावनाओं से खेलते रहेंगे? लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का तकाजा है कि नेतृत्व को हमेशा औचित्य की कसौटी पर कसा जाए। उसकी कथनी-करनी पर लगातार नजर रखी जाए। जनतंत्र में जनता को वैसा ही नेतृत्व मिलता है जिसके वह लायक होती है। अक्सर हम राजनीतिक भ्रष्टाचार और अपराधीकरण की बढ़-चढ़कर चर्चा करते हैं लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका कारण कहीं-न-कहीं हम स्वयं भी हैं। आज कौन किसके लिए जीता-मरता है? सभी अपनी स्वार्थों की फसल को धूप-छांव देने की तलाश में हैं। इसी से समाज में संवेदनहीनता पनप रही है, वह व्यवस्था के सड़ने का संकेत है। संवेदनहीन और अहंकारी नेतृत्व इसी सड़ांध को आकार देता है। इधर राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने का मामला भी पेचीदा होता जा रहा है। राजनीतिक दल और राजनेता आखिर क्यों आरटीआई की परिधि में आने से घबरा रहे हैं। अमेरिका में जब वहां के राष्ट्रपति के चुनाव में सारे उम्मीदवारों को फेडरल इलेक्शन कमीशन के सामने पायी-पायी का हिसाब देना होता है और  ऐसा करते हुए वहां के उम्मीदवार तत्पर होते हैं। इन उम्मीदवारों को यह बताने में भी शर्म महसूस नहीं होती कि उन्होंने अमुक कंपनी या अमुक पूंजीपति से इतना चुनावी अनुदान लिया है। लेकिन विडम्बना देखिए कि हमारे देश की पार्टियां और उनके राजनेता अपने आपको आम आदमी का हितैषी कहते हुए भी उन्हीं से सच बताने में गुरेज करते हैं। कहीं-न-कहीं विसंगति और अपराध की मानसिकता ही काम करती है। इसी के चलते चुनाव के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये का लेन-देन हो जाता है। जबकि इन राजनीतिक दलों को सरकार से अनेक तरह के फंड प्राप्त होते हैं, जो जनता का पैसा है। इसलिए उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है। जनता को भी जागरूक होना होगा।

जनता के प्रति विश्वासघाती होकर क्या सही चयन हो सकता है ? जन प्रतिनिधि और मतदाता दोनों एक-दूसरे को ठग रहे हैं। अपनी-अपनी पार्टी के परचम के सामने हाथ उठाकर सिद्धांतों के प्रति वफादारी दिखाने वाले हाथ खरीद-फरोख्त में कितने नीचे उतर आते हैं। ऐसे अविश्वसनीय लोग कैसे सत्ता और सेवा का पवित्र दायित्व उठा सकेंगे ? लोकतंत्र का मखौल बनाने वाले कैसे स्वतंत्रता की रक्षा कर पायेंगे ? यह एक चिन्तनीय प्रश्न है।

चिन्तनीय प्रश्न यह भी है कि आज अपने ही घर-देश में इतने असुरक्षित हो गए हैं कि हर आहट पर किसी आतंकवादी हमलावर का अंदेशा होता है। आस्थाएं और निष्ठाएं इतनी जख्मी हो गईं कि विश्वास जैसा सुरक्षा-कवच मनुष्य-मनुष्य के बीच रहा ही नहीं। साफ चेहरों के भीतर कौन कितना बदसूरत मन समेटे है, कहना कठिन है।

इस अविश्वास, आतंक, हिंसा और प्रतिशोध के माहौल में देश अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। भारत दिल थामे उन मजबूत हाथों की तलाश में है, जिसमें देश की नीतियों को स्थिरता देने का विवेकी कौशल हो। जिसमें स्वयं को नहीं देश की संस्कृति, सभ्यता और सपनों को बचाने की गहरी बेचैनी हो। जो विकास की योजनाओं को क्रियान्विति देने में पसीना बहाकर, सिद्धान्तों और आदर्शों को स्वयं जीकर औरों को कुछ कहने की तैयारी में हो।

भीड़ में उभरता कोई व्यक्तित्व सामने आए जो वार्तमानिक समस्याओं का रचनात्मक समाधान दे सके। जो ‘मैं’ से ज्यादा ‘हम’ के हितों की चिंता कर सके। जो आम आदमी तक लागू की गई नीतियों के परिणाम पहुंचा सके। आज दावे और वायदे सुन-सुनकर आम आदमी बोर हो गया है। अब तो सिर्फ सबको सबूत चाहिए और उन प्रवेश-द्वारों को बंद करने का साहस चाहिए जो हिंसा, आतंक, भ्रष्टाचार, बेईमानी, अत्याचार, हत्या जैसी बुराइयों तक ले जाते हैं।

बहुत जरूरी है पुनः जागने की, खोया विश्वास पाने की, देश की चरमराती आस्थाओं को सुदृढ़ बनाने की। नए सोच के साथ नए रास्तों पर फिर एक-बार उस सफर की शुरूआत करें जिसकी गतिशीलता जीवन-मूल्यों को फौलादी सुरक्षा दे सके।

लोकतंत्र का पूरा मजबूत ढांचा इन्हीं मजबूत पायों पर आधृत हैं। अब्राहिम लिंकन के शब्दों में-लोकतंत्र जनता का जनता के द्वारा संचालित शासन व्यवस्था है। यह लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को भी राष्ट्राध्यक्ष बनने का अधिकार देती है, बशर्तें कि राष्ट्रीय हितों का विघटन न हो। इसलिए कि कण जब अपने को विराट का भागीदार अनुभव करता है तो गौरव की दीप्ति से उसकी लघुता भी प्रशासक बन जाती हैं और वह अपने करणीय के प्रति भी सचेष्ट हो जाता है।

कालान्तर में परिस्थितियां बदली और इस देश को विदेशी दासता स्वीकार करनी पड़ी। उस समय देश के शीर्षस्थ प्रबुद्धजनों व सामान्य नागरिकों के खून में एक अतिरिक्त उबाल था पर इस पवित्र मिट्टी में पले-पुसों ने जोश के साथ होश रखना भी सिखा है। इतिहास के पृष्ठों से उन्हें यह तजुर्बा मिला कि रक्त-रंजित स्वतंत्रता, क्रांतियां फलदायी और टिकाऊ नहीं होती। फलतः राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में युवाओं ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया-अहिंसक साधकों से देश को आजाद करवाने का।

15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्य उगा। सबके मन कमल खिले। सबने राहत की सांस ली पर साथ ही साम्प्रदायिकता की ऐसी भयंकर बाढ़ आई और महंगाई, भ्रष्टाचार व अपराध का कचरा पीछे छोड़ गई। धरती पर स्वार्थों का कचरा (दलदल) इस कदर फैल गया कि कल के स्वर्ण कलश की कल्पना ही तिरोहित हो गई। कितनी ही दीवारें खिंच गई-ऊंच-नीच की, अमीर-गरीब की, जाति वर्ण की, धर्म विश्वास की व इस इतिहास भूगोल की इस प्रकार विश्वासघाती इन समस्याओं ने राष्ट्रीय चेतना के सूर्य को ढक दिया। चारों ओर अलगाववादी, प्रांतीय, भाषाई, वर्गीय और मजहबी संघर्षों के बादल छा गए।

तब देश के कर्णधारों, समाज सुधारकों व धार्मिक नेताओं ने समस्या के मूल को पकड़ना चाहा, उनके चिंतन के चौखटे में यह बात फिट हो गई कि बुराई का बिन्दु व्यक्ति की आंतरिक चेतना में जन्म लेता है और सामाजिक वातावरण में उसका विस्तार होता है, इसलिए केवल कल कारखानों, विज्ञान एवं तकनीकी आविष्कारों से राष्ट्र सशक्त और समृद्ध नहीं बनेगा। मनुष्य-मनुष्य बने, यही राष्ट्रीय निर्माण की आधारशिला होगी और यही सच्ची स्वतंत्रता होगी। इसी से लोकतंत्र मजबूत होगा।

देश चिंतन के उस मोड़ पर खड़ा है जहां एक समस्या खत्म नहीं होती, उससे पहले अनेक समस्याएं एक साथ फन उठा लेती हैं। ऐसे समय में देश की अस्तित्व और अस्मिता को सुरक्षित रखने के लिए सही समय पर सही निर्णय लेने वाले दूरदर्शी, समझदार, सच्चे भारतवासी की जरूरत है जो न शस्त्र की भाषा में सोचता हो, न सत्ता की भाषा में बोलता हो और न स्वार्थ की तुला में सबको तोलता हो।