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अब समय आ गया है कि नई केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को बलात्कार से जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसे कठोर कदम उठाने होंगे
, जिनसे बलात्कारियों की भी 'रूह' कांप उठे। इसके साथ ही बलात्कार के मामलों के प्रति में लापरवाही, सवंदेनहीनता, गैर-जिम्मेदारी का प्रदर्शन करनेवाले हर व्यक्ति के खिलाफ, चाहे वह मंत्री हो या संतरी, सख्त से सख्त कदम उठाने का प्रावधान भी बनाना ही होगा।

- राजेश कश्यप

एक तरफ बर्बर एवं हृदयविदारक बलात्कार की अनवरत घटनाओं के कारण दुनियाभर में भारत की छवि को गहरा आघात लग रहा है और दूसरी तरफ देश में बड़ी बेशर्मी के साथ सरकार एवं प्रशासन स्तर पर मुद्दे के प्रति संवेदनहीनता की सारी हदें पार हो रही हैं। गत 29 मई को उत्तर प्रदेश में बदायूं जिले के उसजैत थाना क्षेत्र के कटरा गांव की दो नाबालिग चचेरी बहनों को कुछ हैवानों ने गैंगरेप जैसे जघन्य काण्ड को अंजाम देकर अपनी हवस मिटाई और उसके बाद उन दोनों को पेड़ पर रस्सी से लटका दिया। जैसे ही यह हैवानियत दुनिया के सामने आई, चारों तरफ कोलाहल मच गया और जिसने भी घटना के बारे में सुना, उसकी रूह कांप उठी। बेहद निम्र एवं गरीब परिवार से सम्बंध रखनेवालीं ये दोनों बहनें शाम को शौच के लिए घर से निकलीं थीं। जब लड़कियों के घरवालों को अनहोनी की आशंका हुई तो वे मदद के लिए पुलिस थाने में पहुंचे। लेकिन, उन्हें कोई मदद नहीं मिली, उलटे उनका मजाक उड़ाया गया। जब लड़कियां एक पेड़ पर लटकीं मिलीं तो पुलिस को सूचित किया गया। लेकिन, तब भी पुलिस संवेदनहीनता की सारी हदें पर करते हुए मौके पर ही नहीं पहुंची और अगले दिन शाम चार बजे तक हैवानियत का शिकार हुई दोनों अबलाओं की लाशें पेड़ पर लटकतीं रहीं।

जब मामले ने तूल पकड़ा तो उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की संवेदनहीनता भी सबके सामने आ गईं। एक महिला पत्रकार द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इस शर्मनाक घटनाक्रम पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने उलटे तंज कसते हुए कहा कि ''आपको तो कोई खतरा नहीं हुआ?'' अखिलेश के इस बेतुके बयान की देशभर में निन्दा हुई। जब मीडिया ने उत्तर प्रदेश में घट रही निरन्तर बलात्कार की घटनाओं को संज्ञान में लाना शुरू किया तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने के बजाय मीडिया के खिलाफ ही आग उगलने लगे। उन्होंने एक बार फिर बचकाना जवाब देते हुए कहा कि ''उत्तर प्रदेश में होनेवाली घटनाओं को मीडिया ज्यादा प्रचारित करती है। ऐसी घटनाएं केवल यू.पी. में ही नहीं होतीं।''

मुख्यमंत्री के इन बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों के बीच सपा महासचिव और मुलायम सिंह यादव के भाई राम गोपाल यादव ने यह बयान देकर जले पर नमक छिडक़ डाला कि ''महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।'' उन्होंने भी बेतुके तर्क पेश करते हुए कह डाला कि ''कई स्थानों पर जब लड़कियां और लडक़ों के रिश्ते सामने आ जाते हैं, तब इसे बलात्कार करार दे दिया जाता है।'' क्या इन सब बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों से उत्तर प्रदेश सरकार की बलात्कार, गैंगरेप एवं हत्या जैसी घटनाओं के प्रति घोर संवेदनहीनता, लापरवाही और अपराधियों की हौंसला-अफजाही नजर नहीं आ रही है ? क्या सपा के इस रवैये को देखते हुए, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक आधार बनता है ?

कुछ समय पूर्व चुनाव प्रचार के दौरान सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक तौरपर कहा था कि ''लडक़े हैं, गलतियां हो जाती हैं। तो क्या इसके लिए उन्हें फांसी दे दी जाए?'' क्या यह बलात्कार, गैंगरेप व हत्या जैसे घिनौने अपराधों को अंजाम देनेवाले हैवान दरिन्दों की खुलेआम वकालत नहीं है? मुलायम सिंह के इस बयान पर राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी निन्दा की हुई। अब संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून ने देश और दुनिया को मुलायम सिंह के बयान को ठुकराने की अपील तक जारी करनी पड़ी है। मून ने कहा है कि ''लडक़े हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं...जैसे बयानों को ठुकराना होगा। ये लहजा सिर्फ नुकसान ही पहुंचायेगा।'' कमाल की बात है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक बयान की निन्दा होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव को अपने इस अति निन्दनीय बयान पर अब तक कोई अफसोस नहीं हुआ है।

बेहद विडम्बना का विषय है कि नेताओं द्वारा दिए जानेवाले इन गैर-जिम्मेदाराना और घोर संवेदनहीन बयानों का यह शर्मनाक सिलसिला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। इस शर्मनाक सिलसिले को अब मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के गृहमंत्री बाबूलाल गौर ने आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरवी की है। उन्होनें अखिलेश व मुलायम सिंह को बेचारा बताते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया है कि ''वे मामले में क्या कर सकते हैं? रेप की घटनाएं अकेले में होती हैं और कभी रोकी नहीं जा सकती हैं।'' उन्होंने भी बेतुका तर्क दे डाला है कि ''कोई बताकर तो जाता नहीं कि बलात्कार करने जा रहे है, जो हम उन्हें पकड़ लें।'' जब केन्द्र शासित भाजपा सरकार उत्तर प्रदेश सरकार से बलात्कार और हत्या जैसे घिनौने मामलों में रिपोर्ट तालाब कर चुकी हो, ऐसे में उनकीं पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा इस तरह का बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना बयान देना क्या संकेत करता है? हालांकि, भाजपा ने गौर के इस बयान से किनारा कर लिया है। लेकिन, क्या इस तरह किनारा करना ही काफी है?

जब वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी तब भी बलात्कार के निरन्तर मामले प्रकाश में आ रहे थे। यू.पी. में होनेवाले बलात्कारों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जब मायावती से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने भी अखिलेश यादव की तरह मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए तपाक से कहा था कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनसे बढक़र तो दिल्ली में बलात्कार हो रहे हैं। इसी वर्ष हरियाणा में एक बाद एक होनेवाले बलात्कारों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। हरियाणा में प्रतिदिन औसतन दो से तीन बलात्कारों की घटनाओं ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया था और लॉ एण्ड ऑर्डर पर भी सवालिया निशान लगा दिया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी हरियाणा के जीन्द जिले के सच्चा खेड़ा में बलात्कार का शिकार एक दलित लडक़ी का हालचाल जानने पहुंची थी। पीड़ित परिवार से मिलने के बाद सोनिया गांधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ''यह कोई गंभीर बात नहीं है, इस तरह के मामले तो देशभर में हो रहे हैं।'' सोनिया गांधी की इस टिप्पणी से न केवल पीड़ित परिवार के प्रति जताई गई सहानुभूति संदेह के दायरे में आ गई, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के प्रति उनकीं संवेदनहीनता भी स्पष्ट हो गई थी। जब उनकी इस प्रतिक्रिया के संदर्भ में योगगुरू बाबा रामदेव ने पूछा कि यदि पीड़िता की तरह ही उसकी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार (बलात्कार) हुआ होता तो क्या तब भी वे यही बयान देती? कमाल की बात यह रही कि इसके प्रत्युत्तर में भी कांग्रेस की एक महिला सांसद ने अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा था कि बाबा से पूछना चाहिए कि उसकी कौन सी बेटी है? उसकी कौन सी बेटी से बलात्कार हुआ है?

यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक बेहद भयानक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष बलात्कार की घटनाओं मं निरन्तर इजाफा हो रहा है। देशभर में वर्ष 2007 के दौरान 20,737 महिलाओं को अपनी अस्मत लुटाने को विवश होना पड़ा। वर्ष 2008 में 21,467, वर्ष 2009 में 21,397, वर्ष 2010 में 22,172, वर्ष 2011 में 24,206 और वर्ष 2012 में 24,923 लड़कियों और महिलाओं की इज्जत को वहशी दरिन्दों ने तार-तार किया। इसके अलावा वर्ष 2012 के दौरान देशभर में लड़कियों और महिलाओं के अपहरण के 38,262 मामले और छेडख़ानी के 45,351 मामले दर्ज हुए थे। विशेषज्ञों एवं समाजसेवियों का मानना है कि दर्ज होनेवाले मामले वास्तविक आंकड़ों का 50 फीसदी भी नहीं होते हैं। इसका मतलब आधे से अधिक मामले या तो दर्ज ही नहीं किए जाते या फिर अनेक कारणों के चलते दर्ज करवाए ही नहीं जाते। ऐसे में स्थिति की गंभीरता एवं भयावहता का सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है।

आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में हर बीस मिनट में एक महिला अपनी अस्मत गंवा रही है और हर 76 मिनट में एक नाबालिग से बलात्कार हो रहा है। इसके साथ ही हर 25 मिनट में एक महिला/लडक़ी छेड़छाड़ का शिकार हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले दर्ज हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश देश की राजधानी में भी हर 18 मिनट में एक बलात्कार की घटना घट रही है। सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि मात्र 26 प्रतिशत दुष्कर्म दोषियों को ही सजा मिल पा रही है। बेहद विडम्बना का विषय है कि वर्ष 2011 में टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाऊण्डेशन नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने अपनी शोध रिपोर्ट में सबसे असुरक्षित समझे जानेवाले देशों की सूची में भारत को चौथे स्थान पर रखा था। क्या यह स्थिति दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए बेहद शर्मनाक धब्बा नहीं है? वर्ष 2012 में दिल्ली में घटी 'दामिनी' की घटना के बाद जिस तरह से देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और जिस तरह से निवर्तमान केन्द्र की यूपीए सरकार संवेदनशील एवं गम्भीर दिखाई दी थी, उससे उम्मीद जगीं थी कि शायद अब भविष्य में अन्य किसी अबला को 'दामिनी' बनने को विवश नहीं होना पड़ेगा। लेकिन, देशभर में 'दामिनियों' की लंबी कतार ने सब उम्मीदों और संभावनाओं को धूल-धूसरित करके रख दिया है। देश की बहन-बेटियों के लिए अच्छे दिन आएंगे, इसकी आशा एक बार तब भी जाग उठी थी, जब चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने दो टूक कहा था कि 'देश में देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है'। चूंकि, नरेन्द्र मोदी अभूतपूर्व ऐतिहासिक बहुमत हासिल करके प्रधानमंत्री बन चुके हैं, ऐसे में यदि यह आशा, निराशा में न बदले तो बलात्कार का शिकार होनेवाली आधे से अधिक महिलाएं अपनी इज्जत को बचाने में सफल हो सकती हैं। पिछले दिनों भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा था कि भारत में ग्रामीण आबादी का तकरीबन 65 प्रतिशत खुले में शौच करता है और महिलाओं तथा लड़कियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शौच के लिए दिन निकलने से पहले और शाम ढ़लने के बाद ही जाएं।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि 'बलात्कार' या 'गैंगरेप' महिलाओं की अस्मत से जूड़ा मसला नहीं है, बल्कि यह किसी भी औरत की 'रूह' से जुड़ा मसला है। महिला या लडक़ी के साथ होनेवाला बलात्कार, उसकी रूह के साथ बलात्कार है। इसलिए, अब समय आ गया है कि नई केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को बलात्कार से जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसे कठोर कदम उठाने होंगे, जिनसे बलात्कारियों की भी 'रूह' कांप उठे। इसके साथ ही बलात्कार के मामलों के प्रति में लापरवाही, सवंदेनहीनता, गैर-जिम्मेदारी का प्रदर्शन करनेवाले हर व्यक्ति के खिलाफ, चाहे वह मंत्री हो या संतरी, सख्त से सख्त कदम उठाने का प्रावधान भी बनाना ही होगा।