प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 22 जनवरी को हरियाणा प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी पानीपत से 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का सन्देश पूरे देश को दिया।  पहली बार देश के किसी प्रधानमंत्री ने एक भिखारी बनकर बेटियों की जिन्दगी की भिक्षा मांगी है, इससे बढ़कर भला और क्या महानता हो सकती है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 22 जनवरी को हरियाणा प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी पानीपत से 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का सन्देश पूरे देश को दिया।  पहली बार देश के किसी प्रधानमंत्री ने एक भिखारी बनकर बेटियों की जिन्दगी की भिक्षा मांगी है, इससे बढ़कर भला और क्या महानता हो सकती है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेटियों के प्रति जिन शब्दों और संवेदनाओं के साथ अलख जगाई है, वह हर किसी की अंतर्रात्मा को झकझोर देनेवाली है। उनका एक-एक शब्द और एक-एक भाव देशवासियों को बेटियों की दशा और दिशा पर चिंतन करने के लिए बाध्य करता है। क्या देश में बेटियों के प्रति क्रूरता की हदें पार नहीं हो गई हैं? अठारहवीं सदी में बेटी पैदा होने के बाद कुछ क्षण तो सांस ले पाती थी, अपनी माँ का चेहर देख पाती थी और इस दुनिया का अहसास कर पाती थी। लेकिन, आज बेटियों को तो अपनी माँ का मुख तक नहीं देखने दिया जाता, दो पल उसे सांस भी नहीं लेने दिया जाता और उसे कोख में ही कत्ल कर दिया जाता है। भला इससे बढक़र और महापाप क्या होगा ? क्या इस कुकृत्य के चलते इक्कीसवीं सदी में होने का गर्व करना बेमानी नहीं है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेटियों की चिंताजनक हालत के लिए समाज की संकीर्ण मानसिकता को ठहराया। समाज में आज भी यह मानसिकता मौजूद है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से इस सामाजिक धारणाओं की बखियां उधेड़ी हैं, वह कटू सत्य हैं।

सचमुच, इससे बढक़र और गलतफहमी नहीं हो सकती। यदि बेटे बुढ़ापे में माँ-बाप का सहारा बने होते तो आज इतने बड़े पैमाने पर वृद्धाश्रम नहीं खुले हुए होते। आज देश में अनगिनत ऐसे उदाहरण हैं जिनमें बेटियों के होते हुए माँ-बाप सुखी हैं और सुखी बेटों के होते हुए माँ-बाप दु:खी हैं। प्रधानमंत्री का यह सटीक सवाल रहा कि यदि बेटी पैदा नहीं होंगी तो बहू कहां से लाओगे? इसके साथ ही उन्होंने समाज की दोहरी मानसिकता को भी उजागर किया। लोग बहू तो पढ़ी-लिखी चाहते हैं, लेकिन जब अपनी बेटी को पढ़ाने की बात आती है तो पचास बार सोचते हैं। आखिर यह दोगलापन और दोहरी मानसिकता कब तक चलेगी? मोदीजी ने समाज में बेटियों के साथ होनेवाले भेदभावों पर भी कड़े कटाक्ष किए और भोजन परोसने के दौरान बेटे-बेटी में अंतर करनेवाली माताओं को भी गलती का अहसास कराया।

प्रधानमंत्री ने समाज से बेटियों को पराया समझनेवाली संकीर्ण सोच को भी छोडऩे का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि बेटी तो दूसरों के घर को भी अपना बना लेती हैं और ससुराल में जाकर अपने श्रेष्ठ गुणों और संस्कार का श्रेय अपने माता-पिता को ही देती हैं। मोदी के इस तंज में गहरा मर्म महसूस होता है कि जिस धरती पर कल्पना चावला का जन्म हुआ हो और जिस पर पूरी दुनिया गर्व करती हो तो भला उस धरती पर कोख में पल रही कल्पना चावलाओं का कत्ल हो रहा हो तो भला हम दुनिया में क्या मुंह दिखा सकते हैं? उन्होंने दावा किया कि बेटियां बेटों से अधिक कमाती हैं और शिक्षा, खेल, विज्ञान, समाजसेवा आदि हर क्षेत्र में लडक़ों से रत्तीभर भी पीछे नहीं रहती हैं। प्रधानमंत्री का बेटी के जन्म पर पांच पौधे लगाने का आह्वान बहुद्देशीय है। उनकीं बेटा-बेटी के बीच भेदभाव की सोच से आगे निकलने की मार्मिक अपील दिल को छूनेवाली रही।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कन्या-भ्रूण हत्या मामलों में डॉक्टरों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उन्हें भला लगे या बुरा, डॉक्टर यह बताएं कि क्या पैसा कमाने के लिए यही क्षेत्र मिला? क्या पाप का यह सुखी पैसा उन्हें सुखी करेगी? उन्होंने डॉक्टरों को चेताते हुए कहा कि उन्हें समाज ने कन्याओं को कोख में कत्ल करने के लिए नहीं पढ़ाया है। उन्हें किसी की जिन्दगी को बचाने के लिए पढ़ाया गया है और किसी को पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए पढ़ाया गया है। इसलिए डॉक्टरों को समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाना चाहिए। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों की आत्मा को झकझोरने के लिए कहा कि खाना खाने से पहले थाली में रखी रोटियों को देखो, कहीं वे किसी निर्दोष बेटी के खून से तो नहीं रंगी हुई हैं?

प्रधानमंत्री की डॉक्टरों के प्रति प्रयोग की गई कठोर और बेलाग टिप्पणियां कन्या-भ्रूण हत्या के मामलों को घटाने में बड़ी अहम सिद्ध हो सकती हैं। ‘बेटा-बेटी एक समान’ का मोदी मंत्र पानीपत की धरती से देश के हर गांव, शहर, प्रदेश और समाज के लिए पानीपत की धरती से निकला है। प्रधानमंत्री ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के संकल्प के साथ-साथ कन्या-भ्रूण हत्या में किसी भी रूप में शामिल न होने की जो शपथ मंच से दिलाई, वह हर देशवासी के लिए है। पानीपत के हुडा मैदान से उन्होंने बेटियों के प्रति जो चिंता और चुनौती सबके सामने रखी और बेटियों को परिवार का गहना व राष्ट्र का सम्मान समझने का जो आह्वान किया वह पूरे देश व समाज से है। प्रधानमंत्री के मार्मिक, भावना-प्रधान एवं प्रेरणादायक सन्देश के बाद बेटे-बेटियों को दो पंख मानकर आसमान की उंचाइयों को छूने का सपना कितना साकार होनेवाला है, यह आनेवाला समय ही बताएगा।

पानीपत के मैदान से ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ की ब्राण्ड अम्बेसडर बनाई गई प्रख्यात अभिनेत्री श्रीमती माधुरी दीक्षित नेने ने दो कदम आगे बढक़र समाज से आह्वान किया कि सवाल सिर्फ लड़कियों को जन्म देने का नहीं है। इन्हें सही पोषण, सही शिक्षा और उचित अधिकार देने का ध्येय भी होना चाहिए। माधुरी ने गूढ़ सन्देश दिया कि घर हो, परिवार हो, समाज हो या फिर देश, प्रगति तभी करेगा जब उसकी औरतें शिक्षित और सशक्त होंगी। माँ जितनी शिक्षित होगी,  बच्चा भी उतना ही सभ्य, अक्लमंद और संस्कारी होगा। माधुरी ने समाज को चेताया कि अगर घरों में बेटियां ही नहीं होंगी तो अपने बेटों की शादी कहां से करोगे? बेटियों की कमी से ही अपराध, हिंसा और अत्याचार को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने समाज से अपनी संकीर्ण मानसिकता को बदलने का आह्वान करने के साथ-साथ ही बेहद मर्मस्पर्शी सवाल किए कि हम क्यों बेटियों को जन्म नहीं लेने दे रहे हैं? अगर जन्म दे भी रहे हैं तो क्यों उसे कुपोषित रखकर उसे उसके अधिकारों से वंचित रखकर अपने समाज और देश का बुरा कर रहे हैं? निz:सन्देह माधुरी के यह हृदयस्पर्शी सवाल बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य करते हैं। इनके साथ ही केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका संजय गांधी के चौंकानेवाले निष्कर्ष पूरे देश व समाज के लिए बेहद चिंता एवं चुनौती का विषय कहे जा सकते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अब हम उस मुकाम पर खड़े हैं, जहां महिलाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।

हमारे समाज में महिलाओं पर अत्याचार होता रहा है। परन्तु, पिछले कुछ सालों से सबसे बड़ा अत्याचार जो सामने आया है, वह कन्या-भ्रूण हत्या है। इसका नतीजा यह है कि महिलाओं की संख्या गिरते-गिरते यहां तक आ गई है कि हर 1000 लडक़ों के लिए औसतन 914 लड़कियां ही हैं। कुछ प्रदेशों में तो यह संख्या 840 और 900 ही है। इसका मतलब यह है कि करीबन 2000 लड़कियां रोज मारी जाती हैं। निःसंदेह यह किसी भी देश व समाज के लिए शर्म की बात है।

श्रीमती मेनका गांधी ने हरियाणा का जिक्र करते हुए रूह कंपानेवाले तथ्य पेश करते हुए बताया कि हरियाणा के जिलों में 1000 लड़कों के अनुपात में केवल 775 से 837 तक ही लड़कियां हैं, जिसका अर्थ है कि 1000 लड़कों के जन्म के साथ लगभग 150 से लेकर 225 लड़कियों की कोख में या फिर जन्म लेने के बाद हत्या कर दी जाती है। मेनका ने आगे और भी गम्भीर खुलासा करते हुए बताया कि हरियाणा में स्थिति इतनी गम्भीर है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 70 सालों से कई गांवों में कोई लड़की ही पैदा नहीं हुई है। कुछ गांवों में तो 1000 मर्दों के पीछे केवल 500 या कम महिलाएं ही हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी ने देश व समाज से आह्वान किया है कि देश व सरकार चाहे कितनी ही कोशिश करें, लेकिन यह मुहिम तभी सफल होगी, जब सब भारतवासी इस मुहिम से जुड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जिस दिन हम यह सोच लेंगे कि भगवान ने दो ही लिंग बनाए हैं और दोनों ही बराबर हैं तो उसी दिन हमारी मानसिकता में बदलाव आ जाएगा। मेनका गांधी ने सवाल उठाया कि ये कन्या-भ्रूण हत्याएं क्यों हो रही हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि गलती केवल पुरूष की नहीं होती। गलती परिवार के अन्य बड़े-बूढ़े भी करते हैं। ये उस माँ की भी गलती है, जो परिवार के दबाव में आकर भ्रूण हत्या के लिए राजी होती हैं। ये उन डॉक्टरों की भी गलती है, जो बिना सोचे समझे कानून तोड़कर माँ-बाप को लिंग परीक्षण करके ये बता देते हैं कि पेट में बेटा है या बेटी? मेनका गांधी ने समाज को चेताया कि जब समाज में महिलाएं कम हो जाती हैं तो उसका नुकसान सबको होता है। समाज में प्यार की कमी हो जाती है, हिंसा बढ़ जाती है और घरों में रूखापन आता है।

पानीपत की धरती से बेटियों को समर्पित सन्देश एवं संकल्प पूरे देश के लिए हैं। लड़कियों की दशा सुधारने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने प्रदेश के लिए ‘कन्या कल्याण कोष’ की भी घोषणा की। हरियाणा से शुरू हुई इस मुहिम में पूरा देश समर्पित भाव से जुड़ेगा और बेटियों सशक्त एवं उनकीं संख्या संतुलित बनाने की यह मुहिम जरूर रंग लाएगी, यही आशा की जा सकती है।