Source: न्यूज़ भारती हिंदी15 Oct 2015 15:44:06

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से संबंधित पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जो 64 फाइलें सितंबर में सार्वजनिक की गई, उसमें यह पूरी तरह प्रमाणित हो गया कि नेताजी की मृत्यु 1945 में विमान दुर्घटना मे नहीं हुई। यद्यपि इस मामले मे सी.आई.डी. बहुत पहले साक्ष्य इकठ्ठा कर चुकी थी, पर 1972 से 1977 के मध्य पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्वार्थ शंकर रे द्वारा उक्त सभी फाइलें नष्ट करा दी गई थीं। उन्होंने ऐसा तत्कालिक प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर ऐसा किया था। श्रीमती इंदिरा गांधी को डर था कि यदि कभी विपक्ष सत्ता में आ गया तो नेहरू खानदान को इन फाइलों के चलते परेशानी हो सकती है। दूसरे यह बात भी अब पूरी तरह सिद्ध है कि नेताजी के परिवार और इंडियन नेशनल आर्मी की जासूसी सन 1968 तक पंडित जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सतत कराई गई। पंडित नेहरू ने तो 14 लोगों की एक टीम ही बना रखी थी जो नेताजी के परिवार के सदस्यों की जासूसी चौबीसों घंटे करती थी।

नेताजी के परिवार को जो पत्र आते थे वह पहले सी.आई.डी. द्वारा खोले जाते थे और थोड़ी शंका होने पर सरकारी फाइलों में रख लिए जाते थे। ऐसे ही एक स्विस पत्रकार जो जापान और चीन में भी काम कर चुका था। उसके द्वारा नेताजी के भाई शरद चन्द्र बोस को नेताजी के जीवित होने के संबंध में पत्र भेजा गया, पर यह पत्र शरद बोस तक नहीं पहुंचा। 11 मई, 1949 को नेताजी की पत्नी एमेली स्नेकी द्वारा शरद बोस को नेताजी के जीवित होने के बारे में लिखा गया, यह भी लिखा गया कि नेताजी जल्द ही वापस आएंगे, पर शरद बोस तक वह पत्र भी सरकार ने नहीं पहुंचने दिया। नेताजी के जीवित होने का एक बड़ा प्रमाण यह है कि कम्यूनिस्ट नेता सोमनाथ लाहिरी 1949 में नेताजी से मास्को मे मिले थे। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इन 64 फाइलों को सार्वजनिक किए जाने से यह प्रमाणित हो गया है कि पं. नेहरू और उनका खानदान सत्ता के प्रति कितना ज्यादा भूखा था। पं. नेहरू को यह अच्छी तरह पता था कि यदि नेताजी वापस आ गए तो वह ज्यादा दिन प्रधानमंत्री नही रह पाएंगे, क्योंकि नेताजी उनसे ज्यादा लोकप्रिय है। इसी के तहत वह चाहते थे कि नेताजी के परिवार से नेताजी से संबंधित कोई व्यक्ति संपर्क न बना पाए।

इस बीच ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने भी जनवरी 1966 में शास्त्री जी की हुई मृत्यु के नए सिरे से जांच की मांग की है। उनकी मृत्यु से संबंधित फाइलों को भी सार्वजनिक करने की मांग की है। हकीकत यह है कि शास्त्री जी के शव को जब भारत लाया गया तो उसे देखते ही उनकी मॉ ने कहा था ‘‘मेरे बिटवा को जहर दे दिया गया’’। लाख टके की बात यह कि देश के प्रधानमंत्री की मृत्यु विदेश दौरे के दौरान होती है, और उस बात पर सरकार चुप्पी साध लेती है, तो न जाने कितने सवाल मन में पैदा होने लगते हैं। आखिर शास्त्री जी को ताशकन्द में शहर से बीस कि.मी. दूर में क्यों रखा गया जहॉ इन्टरकॅाम तक की सुविधा नही थी। वह किसी से किसी किस्म का संपर्क नही कर सकते थे। क्या किसी प्रधानमंत्री के बारे में ऐसी कल्पना की जा सकती है? शास्त्री जी का पार्थिव शरीर जब भारत लाया गया तो नीला पड़ चुका था और शरीर पर कई निशान थे। दिल के दौरे के बाद शव के नीला होने की बात आज तक सामने नहीं आई है। शव नीला तभी होता है जब जहर से किसी की मौत होती है। इसका खुलासा पोस्टमार्टम से हो सकता था लेकिन न तो ताशकंद में और न भारत में ही उनका पोस्टमार्टम कराया गया। शास्त्री जी के परिवार के एक सदस्य ने दो वर्ष पूर्व जब आर.टी.आई. लगाकर जानकारी लेनी चाही तो उन्हे रहस्यात्मक यह जबाव मिला कि इससे अंतरराष्ट्रीय संबंध और सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इससे पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि शास्त्री जी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी।

गौर करने की बात यह है कि शास्त्री जी की आखिरी रात के दौरान उनके साथ दो लोग थे जिनको 1977 में संसदीय समिति के सामने अपने बयान भी दर्ज करवाने थे। पहले तो डॉ.आर.एन.चुग थे जो समिति के पास बयान देने जा रहे थे, लेकिन एक ट्रक से टक्कर में उनकी मौत हो गई। दूसरा गवाह शास्त्री जी का नौकर रामनाथ था। घटना के बाद जब पहली बार वह शास्त्री के घर गया तो उसने कहा ‘‘बहुत दिन का बोझ था अम्मा,आज सब बता देंगे’’। वह भी एक कार से टकरा गया, जिससे उसके दोनो पैर काटने पड़े बाद में उसकी याददाश्त जाती रही। उपरोक्त दोनो मौतें रहस्य को और गहरा करती हैं। भारतीय राजदूत टी.एन.कौल के निजी सहायक जान मोहम्मद ने शास्त्री जी को एक गिलास दूध दिया था। सर्वाधिक संदिग्ध होने के बावजूद सोवियत संघ और भारत में किसी ने उससे पूंछतांछ नहीं की।

कई लोग तो शास्त्री जी की मृत्यु को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े रहस्य से जोड़कर देखते हैं। शास्त्री जी के विश्वस्त और दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख रहे जगदीश कोदेशिया नेताजी के मृत्यु के मामले में जांच के लिए गठित खोसला आयोग के समय गवाह के रूप में मार्च 1971 में उपस्थित होकर कहा था कि शास्त्री जी को नेताजी की विमान दुर्घटना में हुई मृत्यु पर विश्वास नहीं था। प्रधानमंत्री बनने पर वह नेताजी के लापता होने के मामले की नई जांच कराने की दिशा में काम कर रहे थे। ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल यह है कि यदि शास्त्री जी की हत्या हुई तो शक की सुई किस ओर? इस मामले मे सामान्य सिद्वांत यह है कि लाभार्थी कौन? निस्संदेह इस मामले में लाभार्थी श्रीमती इंदिरा गांधी थीं, जिन्हे शास्त्री जी के बाद प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला। तो अदम्य सत्ताकांक्षा एवं नेताजी के लापता होने की निष्पक्ष जॉच को रोकना ही शास्त्री जी के हत्या के कारण हो सकते हैं। सोवियत रूस की इस मामले की भूमिका पूरी तरह संभावित है क्योंकि श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर भारत एक तरह से रूस का उपग्रह ही बन गया था।

इस तरह से हम पाते हैं कि नेताजी को देश में न आने देने के लिए और उनका शेष जीवन बदहाली में बिताने के लिए पंडित नेहरू और शास्त्री जी की आकस्मिक मृत्यु के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी गंभीर संदेहों के दायरे में है। लेकिन इतना भर नहीं जून 1953 में जनसंघ के तात्कालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी कश्मीर के निशातबाग में 23 जून, 1953 को जिन परिस्थितियों में मृत्यु हुई वह भी जानकार लोगों के अनुसार हत्या ही थी। तभी तो उनकी मां योगमाया ने पं.नेहरू को उच्चस्तरीय जांच के लिए कई पत्र लिखे, पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। इसी तरह से 11 फरवरी, 1967 को एकात्म मानवबाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुगलसराय के समीप स्पष्ट रूप से हत्या की गई थी, चूंकि उनके पास ऐसा कुछ नहीं था जो लुटाने लायक हो, इसलिए यह हत्या भी कहीं दूर संकेत करती है। 

हकीकत यह था कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय दोनों ही महान नेता अपने-अपने दौर में राजनीति का दूसरा ध्रुव बनने का सामर्थ्य रखते थे और उस दिशा मे उनके चरण बढ़ भी रहे थे। इसलिए ‘‘न रहेगा बॉस न बजेगी बांसुरी’’  के तर्ज पर इन्हें निबटा दिया गया। निस्संदेह, इस तरह से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लेकर गंभीर संदेह जहां पं.जवाहर लाल नेहरू पर है। वहीं लालबहादुर शास्त्री और पं.दीनदयाल उपाध्याय को लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी पर,इस तरह से कहीं-न-कही सच्चाई से परदा उठ रहा है। उम्मीद है कि इन सभी मामलों में मोदी सरकार आने वाले दिनों मे देश के सामने पूरा सच लाने का प्रयास करेगी।