Source: न्यूज़ भारती हिंदी20 Oct 2015 11:02:09

सुधीन्द्र कुलकर्णी इस समय कुछ लोगों के हीरो बन गए हैं। वे कालीख पुते चेहरे से ही पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद मसूद कसूरी के साथ पत्रकार वार्ता करने आए और शिवसेना पर पूरा हमला किया। एक उदारवादी विचारधारा वाले व्यक्ति की भाषा में उन्होंने शिवसेना के बारे में वो सब कुछ कहा जो आम तौर पर उसके विरोधी कहते रहे हैं। निस्संदेह, हम किसी को कालिख पोतने का समर्थन नहीं कर सकते। यह विरोध का विकृत और अमान्य तरीका है। हर संगठन एवं संस्था को किसी कार्यकम, व्यक्ति, विचार आदि का विरोध का अधिकार है, पर वह मान्य एवं सभ्य तरीके से होना चाहिए। लोकतांत्रिक समाज का यही लक्षण है। किसी की निजी बेइज्जती लोकतांत्रिक विरोध का लक्षण नहीं है। इस नाते शिवसेना के इस रवैये का विरोध लाजिमी है। लेकिन इसके अलावा जिन अन्य पहलुओं के आधार पर उसकी निंदा हो रही है उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता। आखिर सुधीन्द्र कुलकर्णी वहां ऐसा कौन सा काम करने गए थे जो देश के हित में था, या ऐसा क्रांतिकारी था जिसका समर्थन देश को करना चाहिए या जिसका विरोध नहीं होना चाहिए? अगर इस प्रश्न का तटस्थता और संतुलन से उत्तर तलाशेंगे तो कुलकर्णी के रवैये के पीछे कोई ऐसी सोच नहीं दिखाई देगी जिससे उनका समर्थन किया जा सके?

पता नहीं कुलकर्णी को खुर्शीद महमूद कसूरी में एवं उनकी पुस्तक ‘नाइदर अ हॉक, नॉर अ डव’ में ऐसा क्या दिखा कि पहले उन्होंने उसका राजधानी दिल्ली में विमोचन कराया, फिर मुंबई में। जिस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वे अध्यक्ष हैं। शिवसेना के विरोध के विपरीत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने किताब के विमोचन के लिए पूरी सुरक्षा दी और वह शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। किंतु, इससे प्राप्त क्या होगा? किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कुलकर्णी और भाजपा से जुड़ी अतीत की कुछ बातों का उल्लेख यहां आवश्यक है। यह कुलकर्णी ही थे जो लालकृष्ण आडवाणी की जून, 2005 की पाकिस्तान यात्रा में उनके मुख्य थिंक टैंक की भूमिका निभा रहे थे। आडवाणी ने जब जिन्ना की प्रशंसा की तो कुलकर्णी बांसो उंछल रहे थे। तब सुषमा स्वराज ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि सुधीन्द्र कुलकर्णी ने उन्हें फोन पर बताया कि आडवाणी जी के जिन्ना संबंधी बयान का यहां बहुत ही अच्छा असर है। सुषमा का कहना था कि उन्होंने जवाब दिया कि कुलकर्णी जी हमें राजनीति भारत में करनी है या पाकिस्तान में? हमें चुनाव भारत में लड़ना है पाकिस्तान में नहीं। उसके ठीक बाद कुलकर्णी ने भोपाल चिंतन में एक प्रपत्र प्रस्तुत किया था तथा तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को पत्र लिखा था जिसमें साफ कहा गया था कि भाजपा को संघ एवं विहिप से पूरी तरह पिण्ड छुड़ा लेना चाहिए तथा हिन्दुत्व आदि पुरानी विचारधारा को त्यागकर एक उदारवादी लोकतांत्रिक पार्टी बन जाना चाहिए। उसके बाद पार्टी और पूरे संघ परिवार में इतना बावेला मचा कि अंततः आडवाणी को न चाहते हुए उनको पार्टी सचिव पद से हटाना पड़ा।

ध्यान रखिए कि कुलकर्णी अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच पर पीछे बैठते थे। जाहिर है, वे कम से कम सरकार के कुछ मामले में थिंक टैंक तो हो ही चुके थे। आडवाणी ने सितंबर 2005 में अध्यक्ष पद त्यागते हुए चेन्नई कार्यकारिणी में जो भाषण दिया उसमें कहा कि संघ को अपना काम करना चाहिए और भाजपा को अपनी भूमिका के लिए मुक्त कर देना चाहिए। यह दो महीने पहले लिखे गए कुलकर्णी के पत्र की प्रतिध्वनि ही तो थी। कहने का तात्पर्य यह कि कुलकर्णी भाजपा में दोनों शीर्ष नेताओं के विश्वस्त सलाहकार बन चुके थे और वे पार्टी की विचारधारा को बदलने के लिए प्रयासरत थे, जिसमें उनको सफलताएं भी मिलीं, पर समय ने उनका साथ नहीं दिया और फिर आडवाणी को संगठन परिवार के सामने सार्वजनिक तौर पर झुकना पड़ा। किंतु पाकिस्तान के संदर्भ में कुलकर्णी का विचार वही है जो 2005 में आडवाणी के मुंह से प्रकट हुआ था। आखिर खुर्शीद महमूद कसूरी ने भारत पाकिस्तान संबंधों के बेहतर होने के लिए ऐसा कौन सा कार्य किया है कि उनके लिए इस तरह कुलकर्णी पलक पांवरे बिछाए हुए हैं?

यह बात ठीक है कि जनरल परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में कसूरी विदेश मंत्री थे। मुशर्रफ 2002 के बाद काफी बदले थे एवं भारत से संबंध बेहतर करने के लिए वाजपेयी के साथ मिलकर कई कदम उठाए। हालांकि आजकल वो जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं उसमें वे कारगिल वाले मुशर्रफ नजर आने लगे हैं। कसूरी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत के मुसलमानों के प्रति उनकी सहानुभूति है, पर भारत में उनकी दशा तभी ठीक होगी जब पाकिस्तान भारत के संबंध ठीक होंगे। पाकिस्तान भारत से संबंध ठीक होने से उनका क्या तात्पर्य है इसे उन्होंने स्पष्ट नहीं किया। कुलकर्णी कहते हैं कि कसूरी साहब के पिताजी मुंबई में थे और उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था जिस पर इन्हें गर्व है। आज पाकिस्तान में बसे अनेक मुसलमान परिवार के पूर्वजों ने भारत की आजादी के आंदोलन में भाग लिया था, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के बाद पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ने के बाद समस्या उत्पन्न हुई। जो लोग पाकिस्तान गए उनमें कुछ ही मजबूरीवश गए होंगे, अन्यथा सब देश विभाजन का समर्थन करनेवाले थे। जिसे पाकिस्तान मंजूर नहीं था वह वहां क्यों जाता? फिर हमें वर्तमान भी तो देखना है। इस समय पाकिस्तान की सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर कश्मीर का मामला उठाती है, युद्वविराम का बार-बार उल्लंघन कर रही है, शांति के प्रयासों को धक्का देने के लिए उसने आईएसआई के भारत विरोधी गतिविधियों को नकारा है तथा इसके समानांतर रॉ की मनगढंत कहानियां बनाकर डोजिएर तैयार कर लिया है। क्या कुलकर्णी इसे कसूरी के माध्यम से बदलवा देंगे?

कुलकर्णी कहते हैं कि इतिहास से दोनों देशों को निकलना होगा। जब वे ऐसा कहते हैं तो भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही तराजू में रखते हैं। यह उनकी सोच की समस्या है। भारत कब इतिहास में बंधे रहता चाहता है? बस लेकर तो वाजपेयी जी लाहौर गए थे। कारगिल किसने कर दिया?  मुम्बई 1 और दो किसने किया? उफा में नवाज शरीफ के साथ बैठक की पहल किसने की? उसके बाद आतंकवाद पर बातचीत से किसने इन्कार किया? आज पाकिस्तान की ओर से आतंकवादी जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करके हिंसा फैला रहे हैं। भारत तो ऐसा नहीं कर रहा। कुछ लोगों की मानसिक समस्या है तो उसका इलाज नहीं। कसूरी पाकिस्तान की सोच से बाहर निकलने वाले नेता न थे न हैं। कश्मीर पर उनका वही रुख है जो पाकिस्तान के नेताओं एवं सेना का है। इसमें कहां से कसूरी शांतिदूत हो गए। शिवसेना द्वारा कालिख पोतने की हम आप जितनी निंदा कर दीजिए, लेकिन देश के आम लोगों की प्रतिक्रिया सुधीन्द्र कुलकर्णी के विरुद्ध है। अभी तक इसका जो जवाब कुलकर्णी ने दिया है उससे देश संतुष्ट नहीं है। किसी दृष्टि से कुलकर्णी का कसूरी की किताब के प्रचार के लिए इतना उतावला होना समझ से परे है। वैसे जिनने उस किताब को पढ़ा है उनका कहना है कि उसमें कुछ खास बात है भी नहीं। हां, कुलकर्णी को चेहरे पर कालिख पोते जाने से इस किताब का जितना प्रचार हो गया उससे लगता है कि इसकी बिक्री बढ़ जाएगी एवं कसूरी को धन की आय काफी होगी जितनी शायद उनने सोची नहीं होगी।