राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस विजयादशमी को अर्थात 22 अक्टूबर, 2015 को 90 वर्ष का हो गया। संघ के इस 90 वर्ष के संगठनात्मक उपलब्धि और विस्तार की चर्चा करना इस समय बेहद प्रासंगिक है। प्रासंगिक इसलिए भी क्योंकि यह भारत ही नहीं वरन संसार की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन है। इसलिए यह सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करनेवालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करनेवाला संगठन भी है। विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितम्बर, 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में हुआ। केवल 20-22 तरुणों की शाखा से प्रारंभ हुए इस संगठन की वर्तमान शक्ति, सामर्थ्य और विस्तार सज्जनों को संतोष प्रदान करनेवाला है। लेकिन पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोध पग-पग पर कांटें बोते रहे पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए।

आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ.हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।  

डॉ. हेडगेवार ने 13 अक्टूबर, 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि,“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इस पर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है,जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है। हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा “Sarvival of the fittest” इस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।”

डॉ. हेडगेवार के इस आहवान को स्वीकार कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया, जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभावों प्रमुख थे। इन सभी के अनथक प्रयत्नों से संघ संख्यात्मक, गुणात्मक और संगठनात्मक दृष्टि से बढ़ता ही गया। संघ के संगठन संरचना में अधिकारी के निर्देशों का स्वयंसेवकों द्वारा अक्षरशः पालन करने की अदभुत अनुशासित परम्परा है। संघ के प्रचारक राष्ट्र पुनरुत्थान के संकल्प को जीते हैं और अपने आचरण व व्यवहार से अपने सम्पर्क में आनेवाले लोगों को राष्ट्रोत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्र को समर्पित प्रचारकों व स्वयंसेवकों के व्यवहार और चरित्र के बल पर संघ आज देश के प्रत्येक क्षेत्र में हरेक तबकों में कार्यरत है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अन्य देशों में भी संघ का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के रूप में संघ का कार्य चलता है।   

संघ में संगठनात्मक संरचना में सरसंघचालक का स्थान सर्वोपरि है, जो पूरे संघ की कार्य योजनाओं को दिशा प्रदान करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति पूर्व सरसंघचालक के मनोनय से होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अगले सरसंघचालक के नाम की घोषणा करते हैं। संघ के संस्थापक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टरजी (1925-1940) ने माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी (1940-1973) को नियुक्त किया था, तत्पश्चात श्रीगुरुजी ने चिट्ठी लिखकर मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (1973-1993) को अगले सरसंघचालक होने की बात कही थी। इसके बाद बालासाहेब देवरस ने प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया (1993-2000) को नियुक्त किया, और रज्जू भैया ने कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी (2000-2009) के नाम की घोषणा की। सुदर्शनजी ने 2009 में डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत को सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 

संघ की नींव है शाखा

संघ की रचनात्मक व्यवस्था क्रमशः – केंद्र, क्षेत्र, प्रान्त, विभाग, जिला, तालुका, नगर, मण्डल, शाखा के रूप में संचालित होती है। किसी मैदान या सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिए स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण होता है। इसे शाखा कहते हैं। शाखा में प्रार्थना, योग-व्यायाम, खेल और गीत जैसे रोचक माध्यमों की बड़ी भूमिका होती है जो स्वयंसेवकों के अंतःकरण में अनुशासन, आज्ञापालन, राष्ट्रभक्ति, नेतृत्व कौशल व समर्पण जैसे जीवन मूल्यों को सिंचित व पोषित करता है। शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता है।

व्यवस्था की दृष्टि से शाखाओं के भी कुछ प्रकार हैं, - प्रभात शाखा, सायं शाखा, रात्रि शाखा। इसके अतिरिक्त जो स्वयंसेवक प्रतिदिन नहीं आ पाते उनके लिए सप्ताह में एक या दो बार शाखा लगती है, इसे “मिलन” कहते हैं। इसी तरह महीने में एक या दो बार लगनेवाली शाखा हो “संघ-मण्डली” कहते हैं। वस्तुतः शाखा ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव है। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है। वर्तमान में सम्पूर्ण देश के कुल 32,222 स्थानों पर संघ की कुल 51,330 शाखाएं दैनिक रूप से लगती हैं। देशभर में कुल 12,847 साप्ताहिक मिलन तथा कुल 9008 संघ मंडली हैं। संघ की शाखा ने ही संघ को शक्तिसंपन्न बनाया, इसलिए यह कहना अधिक योग्य है कि शाखा ही संघ शक्ति का मूल है। जबतक शाखा चलती रहेगी स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ती रहेगी और स्वयंसेवकों के गुणों में श्रीवृद्धि होगी।     

डॉक्टरजी का सन्देश शाखा के लिए वरदान 

डॉ.हेडगेवार शाखा को बहुत महत्त्व देते थे। निरंतरता, प्रमाणिकता और समाज के प्रति प्रेम को वे प्राथमिकता देते थे। उनका मानना था कि नियमित शाखाओं में जानेवाले व्यक्ति के अन्दर सात्विक प्रेम, दायित्व का बोध और कर्तव्य की भावना दृढ़ होती है। डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को प्रेम का महत्त्व बताया था। उन्होंने कहा था कि “लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यह हमारे पास आए, बैठे, बातचीत करें। ऐसा नहीं कि आपको देखकर लोग दौड़े, छिपते फिरें। लोगों को आप प्रेम से देखें, तो लोग भी आपको प्रेम से देखेंगे। प्रेम से प्रेम की वृद्धि होती है।”

उन्होंने कहा कि, “मेरा सन्देश यही है कि आप ऐसे प्रेम और आदर्श की मूर्ति बनें कि लोग आपकी ओर खींचे आए। आपके हाथ के साथ किसी का हाथ भी लगे, आपके साथ कोई बात भी कर ले फिर वह आपको न भूल सके। ऐसी आपकी वाणी में मिठास हो। किसी पुरुष के आप सदगुण ग्रहण करें, साथ ही अपने प्रभाव से उसके दुर्गुण दूर करें।”

डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को आत्मपरीक्षण की सलाह देते हुए कहते हैं कि, “आप कभी भी अपनेआप को सर्वगुणसम्पन्न मत समझो, नहीं तो आपके सब गुण निरर्थक हो जाएंगे। आप रात को सोते समय विचार करें कि दिनभर मैंने क्या किया, क्या गलती की है, आगे क्या करना है। ऐसा सोचने से तथा करने से आप समाज के नेता बनेंगे और जाति का काम बहुत बढ़ा सकेंगे।” 

डॉ. हेडगेवार राष्ट्र से जितना प्रेम करते थे, उतना ही प्रेम वे समाज व स्वयंसेवकों से करते थे। उनमें मनुष्य को देशकार्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देने का अदभुत कौशल था। वे स्वयंसेवकों को मातृवत स्नेह करते थे, सलाह देते थे, प्रेरित करते थे। उनकी वाणी, चरित्र और कार्य में इतना सामर्थ्य था कि उन्होंने जिसके कन्धों पर हाथ रखा वे उनके साथ चलने लगे। उन्होंने जिसे पुकारा वे उनके हो गए। उन्होंने जिनको संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाया, उन सभी ने अपने ही तरह सैंकड़ों को तैयार किया, सैंकड़ों ने हजारों को तैयार किया, हजारों ने लाखों स्वयंसेवकों का जीवन गढ़ा। अब स्वयंसेवकों की तादात करोड़ों में हो गई है और ये स्वयंसेवक देश और दुनिया में समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों के माध्यम से अपना कर्तव्य कर रहे हैं। आज संघ के ही एक स्वयंसेवक व प्रचारक श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके ही प्रस्ताव को मानकर हाल ही में 21 जून, 2015 को दुनियाभर में “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” मनाया गया। यह संघ के स्वयंसेवक के प्रस्ताव की वैश्विक मान्यता का अनुपम उदाहरण है। इन सभी उपलब्धियों में समाया है डॉ.हेडगेवार का सन्देश, सभी सरसंघचालकों की प्रेरणा और देशभर में अनथक प्रयत्न करनेवाले स्वयंसेवकों की शाखारूपी साधना।