Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Oct 2015 12:24:11

बाला साहब देवरस ने कहा कि यदि समाज में अस्पृश्यता पाप नहीं है, तो कुछ भी पाप नहीं है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी पिछले वर्ष विजयदशमी कार्यक्रम में सामाजिक समरसता के लिए समान अधिकार की बात की।  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 90 साल पूरे हो गए हैं। नौ दशक के सफर में संघ ने एक संगठन के तौर पर दो बड़ी उपलब्धियां हासिल की, पहली यह कि यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बना और दूसरी कि यह अकेला ऐसा भारतीय संगठन है, जिसके समर्थकों और आलोचकों, दोनों की संख्या काफी ज्यादा है। समर्थक वर्ग इसलिए सबसे बड़ा है, क्योंकि इसके संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 की विजयदशमी को जब संघ की स्थापना की, तो उन्होंने उसी ‘सनातन हिन्दुत्व’ के मूल विचार को आधार बनाकर समाज को संगठित करने की कल्पना की जिसे कालांतर में सिख गुरुओं, आधुनिक काल के संतों एवं समाज सुधारकों - समर्थ गुरु रामदास, दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, महात्मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, डॉ.आंबेडकर व महर्षि अरविन्द ने समाजोत्थान के लिए आवश्यक माना था। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा इससे प्रेरित अनेक संगठन हिंदू एकता एवं हिंदू समाज के पुनरुत्थान के लिए सामाजिक समानता पर जोर दे रहे है।

हिन्दुत्व और राष्ट्रभक्ति का यह भाव एक मंत्रयुक्त शक्ति लेकर प्रकट हुआ और डॉ. हेडगेवार के जादुई संगठन तंत्र ने इसे न केवल राष्ट्रीय, बल्कि आज अन्तरराष्ट्रीय ख्याति का संगठन बना दिया। दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी, वह भी बिना किसी आधार के। संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है। कोई शक नहीं कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं। हालांकि ख़ुद नेहरू को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक अवसर तब मिल गया था, जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था। तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को।

सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी,  सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता। जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”

मूल समाज की चिंता करने वाले संगठन और विचार के कारण ही संघ को समाज में व्यापक समर्थन मिला है। संघ की ख्याति के साथ-साथ इसकी कार्यपद्धति को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां पैदा होती रही हैं। अर्ध सैन्य शाखा पद्यति, अनुशासित संगठन और हिन्दुत्व के विचार के कारण इस पर फासिस्ट, साम्प्रदायिक और जातिवादी होने के आरोप लगे। लेकिन, जो लोग संघ के नजदीक आते गए, वे वास्तविकता को समझते गए। संघ पर अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप लगता है, किन्तु संघ ने स्थापना के समय ही यह भी स्पष्ट कर दिया था कि हम हिन्दू समर्थक हैं, किसी के विरोधी नहीं। आरएसएस के बारे में कई तरह के भ्रम फैलाए गए हैं, इनमें एक यह भी है कि यह जातिवादी संगठन है। जबकि, शाखा में शामिल होने या कार्यक्रम में आनेवाले किसी भी व्यक्ति से यह कभी नहीं पूछा जाता कि उसकी जाति कौन-सी है।

संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवसर कहते थे कि ‘यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो इस संसार में अन्य दूसरा कोई पाप हो ही नहीं सकता। वर्तमान दलित समुदाय जो अभी भी हिंदू है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, किंतु विदेशी शासकों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं किया। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी पिछले वर्ष विजयदशमी कार्यक्रम में सामाजिक समरसता के लिए समान अधिकार की बात की। उन्होंने पूजा, पानी और श्मशान में किसी भी तरह का भेदभाव समाप्त करने और इन पर हर हिन्दू का समान अधिकार होने का संदेश दिया। डॉ. भागवत का संदेश सम्पूर्ण हिन्दू समाज की एकता के लिए सर्वोत्कृष्ट है।

संघ को दूर से देखने और मीडिया की नजर से समझने वाले लोग इसकी उपलब्धियों को राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखते हैं। राजनीतिक परिवर्तन और सफलता संघ का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। मेरा मानना है कि हिंदुत्व के सहारे ही समाज में एक जन-जागरण शुरू किया जा सकता है। जिसमें हिंदू अपने संकीर्ण मतभेदों से ऊपर उठकर स्वयं को विराट्-अखंड हिंदुस्तानी समाज के रूप में संगठित कर भारत को एक महान राष्ट्र बना सकते हैं। एक दशक बाद संघ के एक सौ साल पूरे हो जाएंगे। इस दशक में भी संघ के सामने चुनौती हिन्दू समाज का संगठन ही है।