Source: न्यूज़ भारती हिंदी27 Oct 2015 16:25:50

एक ईसाई दम्पत्ति के तलाक प्रकरण की सुनवाई करते हुए गत दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार से यह जानना चाहा कि क्या वह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की इच्छुक है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसके साथ यह भी कहा-‘‘हम लोगों को समान नागरिक संहिता पर काम करना चाहिए’’ इसको लेकर क्या हुआ? अगर सरकार इसे करना चाहती है तो आपको करना चाहिए। सरकार इसे बनाती क्यों नहीं है और लागू क्यों नहीं करती है? गत फरवरी महीने में ही सर्वोच्च न्यायालय ने एक अन्य प्रकरण में कहा था कि यह बहुत ही आवश्यक है कि सिविल कानूनों से धर्म को बाहर किया जाए। इतना ही नहीं एक और प्रकरण में 11 मई, 1995 को कामन सिविल कोड अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर जोर दिया था। शीर्ष अदालत का कहना था, इससे एक ओर जहां पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता और एकात्मता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है।

सर्वोच्च न्यायालय ने तो उस वक्त यहां तक कहा कि इस तरह के किसी समुदाय के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतीक हैं। आगे यह भी कहा गया कि जिन्होंने देश विभाजन के पश्चात भारत में रहना स्वीकार किया उन्हें अच्छी तरह पता होना चाहिए कि भारतीय नेताओं ने द्विराष्ट्र अथवा तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया। भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता। तत्संबंध में सर्वोच्च न्यायालय न्याय और कानून मंत्रालय को यह भी निर्देशित किया था कि वह जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करके बताए कि समान नागरिक संहिता के लिए न्यायालय के आदेश के परिप्रेक्ष्य में केन्द्र सरकार द्वारा क्या-क्या प्रयास किए गए? यह बात अलग है कि वर्ष 1995 से लेकर आज तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई और इस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः गत दिनों इस बात पर जोर दिया। कहने को तो वर्ष 1949 में हमारी संविधान सभा द्वारा जो संविधान बनाया गया, उसमें अनुच्छेद 44 में इस बात का प्रावधान किया गया कि देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता प्रयोज्य होगी। तथ्य यह है कि कई मुस्लिम देशों इजिप्ट, टर्की, यहां तक पाकिस्तान तक ने इस मामले में अपने कानूनों में सुधार किया है। कई मुस्लिम देशों ने मुस्लिम निजी कानूनों में परिवर्तन किया है, जिससे बहु-विवाहों पर रोक लगायी जा सके। इसमें सीरिया, मोरक्को और इरान जैसे देश शामिल हैं। पर पता नहीं भारत जो अपने को दुनिया को सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, वहां पर इसकी चर्चा छिड़ते ही कुछ ऐसा हंगामा बरपता है, जैसे मुसलमानों के अस्तित्व को मिटाने का प्रयास किया जा रहा हो।

देश में कामन सिविल कोड लागू नहीं होना चाहिए, इसके लिए तरह-तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं। इसको मुसलमानों के धर्म से तो जोड़ा ही जाता है। यह भी कहा जाता है कि जब इस देश में कई भाषाएं प्रचलित है, तो कोई कहता है जब संविधान में एस.सी., एस.टी. एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है तो फिर कामन सिविल कोड के लिए इतना आग्रह क्यों? कुल मिलाकर कुछ ऐसे तर्क कामन सिविल कोड के विरूद्ध दिए जा रहे हैं कि जब पांचों उगंलियां बराबर नहीं होती हैं तो समान कानून का आग्रह क्यों? इस तरह से इस भेदभाव युक्त कानून की पैरवी की जाती है। जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 15 में यह वर्णित है कि  राज्य-सम्प्रदाय, जाति, लिंग के आधार पर किसी भी नागरिक से कोई भेदभाव नहीं करेगा। वाबजूद मुस्लिमों के संदर्भ में निजी कानून लागू किए गए, जबकि संविधान निर्माण के वक्त मीनू मसानी, श्रीमती हंसा मेहता एवं राजकुमारी अमृत कौर द्वारा यह चेतावनी दी गई थी इस तरह से निजी कानूनों का अस्तित्व आगे चलकर राष्ट्रीयता के विकास में बाधक बनेगा।

निस्संदेह, इन नेताओं की यह चेतावनी कितनी यथार्थपरक थी यह विगत कई वर्षों से देखने को मिल रहा है। इसी भेदभाव पूर्ण कानून अथवा मुस्लिमों की पृथक पहचान के चलते जहां अमूमन मुस्लिम राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग-थलग है वहीं वह विकास की दौड़ में भी पीछे हो गए हैं। ऐसे विभाजक कानून ही ऐसी विभाजक मानसिकता बनाते हैं कि कश्मीर घाटी से लाखों हिंदुओं को पलायन करना पड़ता है, देश में जेहादी आतंकवाद का बोलबाला हो जाता है। ऐसे कानूनों के चलते ही देश में मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात बढ़ता जा रहा है जिसके चलते असम जैसे राज्यों को आने वाले वर्षों में कश्मीर की राह पर जाने का खतरा पैदा हो गया है। ऐसे विभाजक एवं तुष्टिकरण वाले कानूनों के चलते ही कश्मीर में पृथकतावादी धारा 370 लागू है, कई लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए देश में प्रवेश कर देश की जनसंख्यात्मक चरित्र बदल रहे हैं।

यद्यपि कानून मंत्री सदानंद गौड़ा का कहना है कि राष्ट्रीय एकता के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है, लेकिन इसे लाने के लिए व्यापक विचार विमर्श की आवश्यकता है। यह भी सच है कि भाजपा की अगुवाई में वर्तमान में केन्द्र सरकार काम कर रही है, और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने पर जोर दिया था। यह भी सच है कि समान नागरिक संहिता भाजपा का मूलभूत ध्येय रहा है। लेकिन समान नागरिक संहिता लागू करने में समस्या ही नहीं, बल्कि भयावह समस्या है। समस्या यह है कि इस देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां जो विशुद्ध मुस्लिम तुष्टीकरण एवं वोट बैंक की राजनीति करती हैं वह सर्वोच्च न्यायालय के कथनों के संदर्भ में अवमानना के डर से भले चुप रहें। पर जैसे ही केन्द्र सरकार इस दिशा में पहल करेगी, तो ये तत्व सिर पर आसमान उठा लेंगे। वह कहेंगे कि यह मुसलमानों की पहचान मिटाने का प्रयास है, यह उनके धर्म पर हमला है। इस तरह से मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है। वह उन्हें नेस्तनाबूत कर देना चाहती है।

वैसे भी यह तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी मुस्लिमों के बहाने मोदी सरकार पर हमले का बहाना ढूंढते रहते हैं तभी तो गौमांस-प्रकरण पर दादरी में जब एक मुसलमान की हत्या हो जाती है तो इसका जिम्मेदार भाजपा एवं मोदी सरकार को ठहराया जाता है। जबकि कानून एवं व्यवस्था का अधिकार पूरी तरह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है। पर मुद्दाविहीन विपक्षी पार्टियों के पास अब जातियता एवं साम्प्रदायिकता का औजार ही बचा है। तभी तो सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जब आरक्षण के समीक्षा की बात करते हैं, तो लालू यादव जैसे प्रमाणित भ्रष्ट नेता उसे भाजपा का आरक्षण समाप्त करने का प्रयास बताते हैं ताकि जातीय गोलबंदी की जा सके। इसी तरह से कामन सिविल कोड लाने के प्रयास में ये तत्व साम्प्रदायिक गोलबंदी कराने का भरपूर प्रयास करेंगे। कामन सिविल कोड के मामले मे सबसे बड़ी समस्या यही है- इसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय को भी पता होना चाहिए। इन सबके वाबजूद देश को इस बात के लिए आश्वस्त होना चाहिए कि आनेवाले समय में इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे-क्योंकि ‘‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’’ का एकमेव यही मार्ग है।