Source: न्यूज़ भारती हिंदी29 Oct 2015 15:36:10

साहित्य अकादमी ने एक हजार से ज्यादा लोगों को पुरस्कार दिया हुआ है जिसमें से केवल 25 ने वापस करने का ऐलान किया है। हो सकता है दो चार और कर दें। साहित्य अकादमी को आराम से इनका पुरस्कार ले लेना चाहिए। जो राशि नहीं लौटा रहे हैं उनसे राशि भी मांग लेनी चाहिए और उनसे दूसरे को पुरस्कृत करना चाहिए। ये इसी के पात्र हैं, क्योंकि इनका पूरा रवैया फासीवादी है। फासिस्ट मनोवृत्ति वाले ये रचनाकार दुनिया में देश का सम्मान गिरा रहे हैं। 

- अवधेश कुमार

कोयम्बटूर से एक अपरिचित व्यक्ति का फोन आया। वहां के अखबार में मेरा नंबर देखकर उन्होंने फोन किया। बोले, सर मैं आपको कुछ कहना चाहता हूं। ये जो लेखक लोग समाज के इतने बड़े हैं, इज्जत है इनकी, ये सम्मान क्यों लौटा रहे हैं? अगर कोई हत्या दादरी में हुई या हुबली में हुई तो उसमें मोदी का क्या दोष है? सर, हमें तो लगता है कि जो लोग पुरस्कार वापस कर रहा है वो इसके योग्य नहीं थे। फिर बोले कि सर मैं बहुत पढ़ा लिखा नहीं हूं छोटा-काम करके पेट पालता हूं, इसलिए बोलने में कोई भूल हुई हो तो माफ करना, लेकिन ये सब छोटा आदमी है, इनको पुरस्कार मिलना नहीं चाहिए था। मैंने पूछा आपका नाम क्या है? सुदर्शन मंडल। सर मैं बिहार के दरभंगा जिला का रहने वाला हूं। हमारे साथ और लोग हैं सबको गुस्सा आ रहा है कि मोदी ने भारत का जितना इज्जत बढ़ाया है ये सब उसे गिरा रहे हैं। ये आम जनता के बीच से आने वाली प्रतिक्रियाओं की एक बानगी है। ऐसी ढ़ेरों प्रतिक्रियाएं प्रतिदिन आतीं हैं। वास्तव में आम जनता, जो किसी पार्टी ने नहीं जुड़ी, जिसका सीधा राजनीति या बौद्धिक समुदाय से लेना-देना नहीं उसकी यही आवाज है। कहने का तात्पर्य यह कि पुरस्कार लौटाने और इसे बड़ा मुद्दा बनाने वालों के प्रति अगर समर्थन है तो केवल समाज के उस तबके के अंदर जो मोदी, भाजपा या संघ परिवार का विरोधी है। हालांकि व्यक्तिगत बातचीत में उनमें से भी काफी लोग पुरस्कार लौटाने की होड़ को उचित नहीं मानते हैं।

आखिर सम्मान लौटाने के पीछे कोई भी एक नैतिक या व्यावहारिक तर्क तो हो। पुरस्कार लौटाने वाले कुछ लेखकों ने कहा है कि यह कदम केवल हत्या के विरुद्ध नहीं बने हुए माहौल के खिलाफ है। इनका तर्क है कि एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद अगर साहित्य अकादमी ने चुप्पी नहीं साधी होती या उसे उठाया होता तो ये नौबत नहीं आती। जाहिर है, यह अगर कारण होता तो पुरस्कार पहले लौटाए जाते। चूंकि पुरस्कार लौटाने का जन समर्थन नहीं मिल रहा है, संदेश यह जा रहा है कि ये लोग मोदी, भाजपा एवं संघ परिवार के पैदाइशी वैरी हैं, इनके न चाहते हुए भी मोदी प्रधानमंत्री बन गए, कोई ऐसा काम हो नहीं रहा था जिससे ये सरकार को कठघरे में खड़ा करे, इसलिए अब जानबूझकर ये केन्द्र सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं, इसलिए उसे सही ठहराने के लिए यह तर्क गढ़ा गया है। जरा, सच देखिए। साहित्य अकादमी के वेबसाईट पर जाइए तो आपको वहां कलबुर्गी की हत्या पर उसकी प्रतिक्रिया है।  साहित्य अकादमी द्वारा 30 सितंबर को बेगलूरु में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का जिक्र है। यानी कलबुर्गी को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम अकादमी ने आयोजित किया। इस प्रकार इनका आरोप सरासर झूठ है। 23 अक्टूबर को साहित्य अकादमी ने कार्यकारी परिषद की बैठक बुलाई है जिसमें इस मामले पर विचार होगा।

कलबुर्गी की हत्या कर्नाटक में हुई जहां कांग्रेस की सरकार है। हत्या कानून व्यवस्था का मामला है जो राज्यों का विषय है। किसी एक व्यक्ति ने कलबुर्गी की हत्या का समर्थन नहीं किया। उनके लेखन से अपने को आहत महसूस करने वालों की बड़ी संख्या थी और उनका विरोध भी होता था। उनके खिलाफ प्रदर्शन होते थे। सरकार ने उनको सुरक्षा दी थी जिसे उन्होंने बाद में वापस कर दिया था। पुलिस की जांच में हत्या का कारण विचारधारा का विरोध स्पष्ट तक नहीं हुआ है। संपत्ति विवाद का भी मामला सामने आ रहा है। हो सकता है कि उनके लेखन से रुष्ट किसी ने मारी हो, लेकिन इसका कानून के राज में रास्ता क्या है? निष्पक्ष और निर्भीक जांच हो, दोषी को सजा मिले तथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो ऐसी व्यवस्था की जाए। उसके लिए तो प्रदेश सरकार पर दबाव बढ़ाया जाना चाहिए। इसमें केन्द्र सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश करके अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ा है। इसी तरह दादरी की घटना प्रदेश सरकार की कानून व्यवस्था की विफलता है। आखिर कोई उन्मादित भीड़ इस तरह कैसे किसी की दिनदहाड़े हत्या कर सकता है? इसमें साहित्य अकादमी या केन्द्र सरकार कहां से आ गई। नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या 2013 में हुई तब किसी ने पुरस्कार वापस नहीं किया। तब भी नहीं जब इसके लिए कोई आरोपी नहीं पकड़ा गया। गोविन्द पंसारे की हत्या भी कांग्रेस राकांपा के शासनकाल हुई। उसमें भी प्रदेश सरकार किसी को पकड़ने मे नाकामयाब रही। पर किसी ने पुरस्कार वापस किया न कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन इन रचनाकारों ने किया। अगर कोई पकड़ा गया है तो महाराष्ट्र सरकार के वर्तमान कार्यकाल मेे। इसकी प्रशंसा की बजाय आप ऐसा माहौल बना रहे हैं मानो देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही गला घोट दिया गया है। मजे की बात देखिए कि ये रचनाकार स्वयं पुरस्कार वापस करते तथा केन्द्र सरकार के विरोध में लिखते बोलते पूरी तरह सुरक्षित हैं। 

यही स्थिति यह साबित करता है कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। हां, इतना अंतर आया है कि पहले भारत के आम मानस को चोट पहुंचाने वाले लेखन और वाचन पर आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं मिलती थी, अब मिलने लगी है और थोड़ी ज्यादा संख्या में। सोशल नेटवर्किंग साइट से लेकर मीडिया में भी ऐसी टिप्पणियां आने लगीं हैं। यह स्वाभाविक है। यानी समाज का वह तबका, जो सहिष्णुता के दबाव में दब्बु संस्कार का बन चुका था वह मुखर हो रहा है। इसकी मुखरता और बढ़ेगी। अब आपको अपने लिखने बोलने में उन लोगों की भावनाओं का भी ध्यान रखना होगा जिनका आप नहीं रखते थे। यह बदलाव किसी सरकार के कारण नहीं आया है, बल्कि इस बदलाव के कारण केन्द्र में मोदी की सरकार आई है। यह शायद इन्हें नागवार गुजरता है। जिस तरह सोशल मीडिया में इन लेखकों की लानत मलानत होती है उनकी भाषा से मैं स्वयं सहमत नहीं होता, कई बार उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर देता हूं, पर सोचने पर निष्कर्ष यह आता है कि हिन्दू समाज अपनी अस्मिता की पहचान के लिए सक्रिय सजग हो रहा है। इसी की परिणति है कि इन लेखकों को पुरस्कार वापसी में विरोध ज्यादा मिल रहा है, इनको गालियां ज्यादा मिल रही हैं और प्रशंसा के स्वर कम। इनके चेहरे पर पड़े आवरण को हटाया जा रहा है।

आइए इनके असली चेहरे को पहचानिए। अगस्त 2007 में तसलीमा नसरीन को हैदराबाद प्रेस क्लब में एआईएएमएम द्वारा बेइज्जत किया गया। उनके साड़ी खींचे गए, घसीटा गया। उससे ज्यादा हिंसक अपमान शायद ही किसी लेखक या लेखिका का हुआ हो। तब किसी को पुरस्कार वापस करने की याद न आई। सलमान रुश्दी को जयपुर साहित्य मेले में नहीं आने दिया गया। इसका इनमें से कितने लेखकों ने विरोध किया। उसके पहले वीडी शर्मा के तो कपड़े तक फाड़ दिए गए। तब भी किसी ने पुरस्कार वापस नहीं किया। 2013 में असम का दंगा हुआ, फिर मुजफ्फरनगर दंगा हुआ...इनमें से कोई लेखक शायद वहां किसी का हालचाल लेने भी नहीं गया, पुरस्कार वापसी की बात तो छोड़िए। सांप्रदायिक दंगों की बात करें तो गृहमंत्रालय का रिकॉर्ड देखिए, 2009 से 2015 के बीच छोटे-बड़े 4346 दंगों का आंकड़ा है। आज कौन सी बुरी स्थिति हो गई कि इन साहित्यकारों को समस्या हो गई? कश्मीरी पंडितों को अपना घर द्वारा छोड़ना पड़ा। अपने ही देश में वे बेगाने हो गए, पर इनके से किसी लेखक ने उस पर उफ तक नहं की। उनके लिए वह सेक्यूलरवाद या सांप्रदायिकता का मामला नहीं था। नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई तब भी इनको पुरस्कार वापसी की याद नहीं आई। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे नेहरु जी की भांजी नयनातार सहगल को 1986 में पुरस्कार मिला। याद करिए, 1984 के सिख्ख नरसंहार से करीब डेढ़ वर्ष बाद ही उन्होंने पुरस्कार स्वीकार कर लिया। पिछले  29 वषों तक उनने कभी पुरस्कार नहीं लौटाया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी इन्होंने वापस नहीं किया।

प्रश्न है कि आज ये ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसका उत्तर सीधा है, वर्तमान राजनीतिक बदलाव के बाद साहित्य जगत से अनेक की महंथगिरी खत्म हो रही है, बौद्धिक क्षेत्र से भी दबदबा कम रहा है, अपने प्रभाव के बल पर साहित्य ही नहीं दूसरे क्षेत्रों में भी ये पद और पुरस्कार देकर जिस तरह लोगों को उपकृत कर देते थे वह स्थिति नहीं रही। इसे झेलना इन्हें गवारा नहीं हो रहा है। साहित्य की राजनीति में ये कमजोर पड़ रहे हैं जिसका इन्हें भान नहीं था। मजे की बात देखिए कि 35 साहित्यकारों ने पुरस्कार वापसी का ऐलान किया, जिनमें से केवल 9 ने साहित्य अकादमी को पत्र लिखा है। बाकी ने केवल मीडिया के माध्यम से ऐसा कह दिया है। दूसरे इनको पुरस्कार में एक लाख की राशि मिलती है उसे केवल 5 लोगों ने चेक द्वारा वापस किया है। जिनको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलता है उनकी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद होता है। इनमें से किसी ने नहीं लिखा है कि साहित्य अकादमी उनकी पुस्तकें अनुवाद न कराए या करा चुकी है तो वापस कर ले। उन्हें अकादमी के माध्यम से पुस्तकों का प्रचार और प्रसार नहीं चाहिए। तो ये यहां भी पाखंड कर रहे हैं। वैसे भी अकादमी ने एक हजार से ज्यादा लोगों को पुरस्कार दिया हुआ है जिसमें से केवल 25 ने वापस करने का ऐलान किया है। हो सकता है दो चार और कर दें। इससे भी इनके अल्पसंख्यक होने का पता चल जाता है। साहित्य अकादमी को आराम से इनका पुरस्कार ले लेना चाहिए। जो राशि नहीं लौटा रहे हैं उनसे राशि भी मांग लेनी चाहिए और उनसे दूसरे को पुरस्कृत करना चाहिए। ये इसी के पात्र हैं, क्योंकि इनका पूरा रवैया फासीवादी है। फासिस्ट मनोवृत्ति वाले ये रचनाकार दुनिया में देश का सम्मान गिरा रहे हैं।