नागपुर, अक्टूबर 5, लखेश्वर चंद्रवंशी : वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा नागपुर में आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय कार्यकर्ता सम्मलेन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा कि इस देश के बिखरे हुए वनवासी कल्याण आश्रम ने वनवासियों के अंतःकरण में आत्मविश्वास को जाग्रत किया। उन्होंने कहा कि वनवासी क्षेत्रों में अनेक विदेशी शक्तियों के द्वारा भ्रामक प्रचार के बीच कल्याण आश्रम ने वनवासियों की अस्मिता को जाग्रत कर उनमें एकात्मभाव का निर्माण किया। विकास के अभाव के बावजूद वनवासियों का साहस प्रेरणादायी है। आज समूची दुनिया में क्लाइमेट चेंज की समस्या से निजात पाने के लिए गंभीरता से विमर्श चल रहा है। दुनिया के प्रबुद्धजन शाश्वत विकास की परम्परा और प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण की बात बोल रहे हैं। पर वास्तविकता यह है कि वनवासियों ने ही शाश्वत विकास की परम्परा और प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण किया है।

फडनवीस ने कहा कि उनकी सरकार वनवासियों के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है। शाश्‍वत विकास क्या होता है, यदि यह समझना है तो वनवासी समाज के बीच जाना होगा। मुख्यमंत्री इस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। रेशीमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में संपन्न हुए इस समारोह की अध्यक्षता वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय अध्यक्ष जगदेवराम उरांव ने की। इस अवसर पर केंद्रीय उर्वरक राज्यमंत्री हंसराज अहिर, केंद्रीय ग्राम विकास राज्यमंत्री सुदर्शन भगत, प्रमुख अतिथि डॉ. कन्ना मडावी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख सुहास हिरेमठ, उद्योगपति अशोक गोयल, वनवासी कल्याण आश्रम के महामंत्री चंद्रकांत देव, उपाध्यक्ष द्वय नीलिमा पट्टे व कृपाप्रसाद सिंह तथा कल्याण आश्रम (विदर्भ) के अध्यक्ष डॉ. शरदचंद्र सालफले व्यासपीठ पर उपस्थित थे।

अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने कहा कि वनवासी बंधुओं को एक महान इतिहास और परम्परा विरासत में मिली है। उन्हें केवल अवसर दिए जाने की जरुरत है। पर शाश्वत विकास की शिक्षा हमें उनसे ही लेने की आवश्यकता है। वास्तव में वनवासियों को ही प्रकृति का बोध है। उन्होंने निसर्ग के माध्यम से अपना जीवनयापन किया है। उन्होंने प्राकृतिक संपदाओं का शोषण नहीं नहीं किया, बल्कि आवश्यक जितना उतना ही दोहन किया और उसी पर अपना जीवन चलाया। पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन कैसा किया जा सकता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वनवासी समाज है। वनवासी समाज प्रकृति के संरक्षक हैं, पहारेदार हैं। ऊँच-नीच का भाव उनमें नहीं रहता। शहरीकरण से मुक्त इसी समाज ने महिलाओं को उचित न्याय दिया। देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में अनगिनत वनवासी वीरों ने अंग्रेजों को अपने वीरता से अचंभित किया और राष्ट्र की बलिवेदी में वीर वनवासियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार प्रतिवर्ष 25 हजार वनवासी बच्चों को राज्य की प्रतिष्ठित विद्यालय में शिक्षार्जन की सुविधा उपलब्ध कराएगी। मुख्यमंत्री के अनुसार इस समय 20 हजार विद्यार्थी इस योजना से लाभान्वित हो रहे हैं।  

केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत ने कहा कि वनवासी अत्यंत परिशारामी और निष्ठावान होते हैं, इसके बावजूद उन्हें उपेक्षा का दंश झेलना पड़ता है। उनकी परम्पराओं की उपेक्षा की जाती है। इसी कारण माओवाद व नक्सलवाद बढ़ता है। दुष्ट विचारवाले लोग भोले-भले वनवासियों को बरगलाने की कोशिश करते हैं। अभाव के चलते यह समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में वनवासी कल्याण आश्रम ने उनके स्वाभिमान को जगाए रखा और स्वावलंबन की शिक्षा देकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। इसी प्रयास के कारण आज वनवासी समाज विकास के पथ पर अग्रसर है।

सुहास हिरेमठ ने कहा कि आज हमें अपने कार्य को अधिक गतिमान करने की आवश्यकता है। वनवासियों ने अत्यंत विपरीत परिस्थिति में अपने जीवनमूल्यों का संरक्षण किया है। इसलिए अपने कार्य में शिथिलता नहीं आनी चाहिए। हमें एकसाथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करना चाहिए। परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकना है। यदि किसी के मन में आत्महत्या का विचार आया और यदि वह ऐसे सम्मलेन में आता है, तो उसका आत्महत्या का विचार समाप्त हो जाएगा और उसमें एक नई ऊर्जा का संचार होगा। हिरेमठजी ने अपने भाषण में अनेक उदाहरण देते हुए कहा कि वनवासियों के विकास में हमारा भी सहयोग होना चाहिए।

डॉ. कन्ना मडावी ने कहा कि हम कहां हैं, हम भारत के नागरिक हैं या नहीं, ऐसा प्रश्‍न कई बार हमारे मन में उठता है। क्योंकि शहरों में हम वनवासियों को बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। परन्तु वनवासी कल्याण आश्रम के अनथक परिश्रम से उनकी स्थिति में परिवर्तन तो रहा है। हमपर कोई उपकार न जताए, वरन हमें अपना माने। अपने दिमाग से जाति-पाति के भेदभाव को निकाल बाहर करें। वनवासी बंधुओं ने अपने भीतर के हीनभाव को दूर कर स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। हमारा भविष्य उज्जवल है। हमें परस्पर सहयोग से एक-दूसरे की मदद करनी है। इस दौरान अशोक गोयल ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय अध्यक्ष जगदेवराम उरांव ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “इस सम्मलेन में घनी व बिरले वनवासियों के प्रतिनिधि के रूप में भारत के लघुरूप का दर्शन हो रहा है। अपनी संस्कृति व परम्परा की रक्षा का व्रत लेकर सभी अपने-अपने क्षेत्र में जाएंगे और वनवासी समाज में नई ऊर्जा का संचार करेंगे। जगदेवरामजी ने अपने भाषण में अनेक पौराणिक व ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख किया।  

कार्यक्रमाच्या के पहले सभी अतिथियों ने डॉ. हेडगेवार व श्रीगुरुजी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की। वनवासी लोकनृत्य के माध्यम से अतिथियों का स्वागत किया। अरुणाचल के गारो वनवासी बंधु-भगिनियों ने दीप प्रज्वलन के दौरान “दोनी-पोलो” भगवान की प्रार्थना की। दीप प्रज्वलन के पश्चात् विष्णुकांत ने सभी का परिचय दिया। स्वागत के पश्चात् छत्तीसगढ़ की मीरा बहन तथा आंध्र प्रदेश की अचाम्बा बहन ने geet प्रस्तुत किया। कार्यक्रमाचे का संचालन अतुल जोग ने किया तथा नीलिमा पट्टे ने आभार प्रगट किया।

उल्लेखनीय है कि इस सम्मलेन में संपूर्ण भारत तथा नेपाल से कुल 1469 पुरुष व 288 महिला प्रतिनिधि उपस्थित थे। भारत के 236 जनजातियों के प्रतिनिधि इस सम्मलेन में सहभागी हुए। समापन समारोह में नगर के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। समापन समारोह के पश्चात् “सियावर रामचंद्र की जय” नामक नाटक स्थानीय कलाकारों ने प्रस्तुत किए।