Source: न्यूज़ भारती हिंदी05 Oct 2015 16:38:44

- वीरेन्द्र सिंह परिहार

सितम्बर के अंतिम सप्ताह में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका की यात्रा पर गए और वहां अपनी मां की याद कर रोए, तो कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया थी कि मोदी स्वतः तो अपनी मां के सम्मान एवं उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान नहीं रखते नहीं, और इस तरह से मां के नाम पर रोने का नाटक करते हैं। कांग्रेस पार्टी का कहना था कि मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उस समय समारोह में मां को नहीं बुलाया यानी कि मां का सम्मान नहीं किया। इसी तरह से कांग्रेस पार्टी का कहना था कि मां कि सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपने पास प्रधानमंत्री निवास में रखना चाहिए। कुल मिलाकर इस तरह से जैसे कांग्रेस पार्टी यह कहना चाहती रही हो कि मोदी मां के प्रति संवेदनशील नहीं हैं और उनके नाम पर रोने का नाटक करते हैं।

अब तक यह बात तो सर्वविदित है कि जब तक मोदी राष्ट्रीय परिदृश्य में नहीं आए, यानी कि भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बने, तब तक देश के लोगों को उनके भाईयों के बारे में यह पता ही नहीं था कि वह नरेन्द्र मोदी के भाई हैं। जबकि इस दौरान मोदी करीब 14 वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। इससे यह पता चलता है कि भाई-भतीजावाद जो हमारे राजनीतिक परिवेश की प्रमुख प्रवृत्ति है, उसमें मोदी का रंच-मात्र भी संबंध नहीं था और न है। मोदी को मां के संबंधों को लेकर भी इसी परिपेक्ष्य में देखने की जरूरत है। विवेकानन्द ने एक बार कहा था- “मैं अपनी मां की चिंता करूं कि भारत मां की चिंता करूं।” मोदी भी भारतमाता को यशस्वी और वैभव संपन्न बनाने के लिए निजी संबंधों को पूरी तरह किनारे कर चुके हैं। इसलिए न तो वह मां को अपने शपथ-ग्रहण समारोह में बुलाते न साथ में रखते हैं। उन्हें अच्छी तरह से पता है कि यदि एक बार ऐसी शुरूआत हो गई तो यह सिलसिला कहां तक जाएगा, कहा भी नहीं जा सकता। वस्तुतः जो लोग मां के संबंधों को लेकर उन पर उंगली उठाते हैं, उनकी पूरी सोच ही नही पूरा जीवन ही मेरे-तेरे के दृष्टिगत रखकर बीता है। इसी का नतीजा है कि देश में सत्ता का भयावह दुरुपयोग ही नहीं हुआ, बल्कि अपने कहे जाने वालों के लिए इस देश की खुली लूट हुई। जिसके चलते चंद लोग तो अथाह संपत्ति के मालिक हो गए और अधिसंख्य जनसंख्या भूख, गरीबी, अन्याय और उत्पीड़न झेलती रही। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो उसे तो वंशवाद और भाई-भतीजावाद का पर्याय ही कहा जा सकता है। फलतः उसे यह समझ में ही नहीं आता कि मोदी पूरी कठोरता के साथ राजधर्म का पालन करने के चलते वह सब नहीं कर पाते जिसकी अपेक्षा एक सामान्य व्यक्ति से की जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि मोदी के अंतःकरण में भावनाएं नहीं है, संवेदनाएं सूख गई हैं या संबंधों की तड़प नहीं है। तभी तो उस मां की याद कर उनके आंसू निकल आते हैं, जिसने दूसरों के घरों में काम कर उन्हें पाला-पोसा। रामायण में श्री राम कहते हैं-

स्नेहं सखा च यदि जानकीउपि, आराधनाय लोकस्य मुच्यते नास्ति मे व्यथा।

यानी कि लोक अराधना के लिए, जनकल्याण के लिए- मैं सभी कुछ-यहां तक कि सीता को भी छोड़ने के लिए तैयार हूं। वस्तुतः मोदी का रास्ता भी यही है कि वह लोक-अराधना के लिए, आमजन की प्रतिबद्धता के चलते अपने निजी संबंधों को कहीं भी नहीं जीते। पश्चिम के महान विचारक इम्युनल कांट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को कैसी भी विपरीत परिस्थितियों में ऐसा करने का अधिकार नहीं है, जिससे गलत पंरपराओं की शुरूआत न हो जाए। यह कौन नहीं जानता कि राम ने जब इतनी कठोरता से राजधर्म का पालन किया तभी तो उसके प्रतिफल में रामराज्य आया था, जिसको देश में लाने का सपना महात्मा गांधी का भी था। नरेन्द्र मोदी भी इस दिशा में पूरी तरह से प्रयासरत हैं और उन्हें पता है कि देश में रामराज्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सर्वप्रथम देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना पडे़गा, जैसा कि उन्होंने बहुत कुछ गुजरात में कर दिखाया। प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभालते हुए भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए। सर्वप्रथम उन्होंने सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को कार्यालय में सही समय पर आने और उपस्थित रहने के लिए बायोमीट्रिक प्रणाली की शुरूआत किया। सभी मंत्रियों और सांसदों से संपत्ति का ब्यौरा लिया गया। यहां तक कि सांसदों को अपने रिश्तेदारों को अपना निज सचिव बनाने की परंपरा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। सभी सरकारी अधिकारियों को अपनी संपत्ति आनलाइन करने के लिए आदेशित किया गया। भ्रष्टाचार के मामलों मे ऐसी व्यवस्था की गई कि अभियोजन हेतु केन्द्र और राज्य सरकारें तीन सप्ताह के भीतर अनुमति देंगी। इस अवधि में यदि अनुमति नहीं दी गई तो अनुमति मान ली जाएगी। कालेधन को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए। परिणाम में अपेक्षा के अनुरूप कालाधन भले न घोषित हुआ हो लेकिन कम-से-कम कालेधन का प्रवाह देश से विदेश की ओर प्रायः बंद हो गया।    

भ्रष्टाचार को जड़-मूल से उखाड़ने की दिशा में मोदी सरकार द्वारा अभी हाल में कई बड़े कदम उठाए गए। अब जो भी अधिकारी एवं कर्मचारी भ्रष्टाचार के आरोपों से पूरी तरह मुक्त होंगे, उन्हें ही पेंडिंग प्रमोशन और सुविधाएं दी जाएगी। इतना ही नहीं 50 साल की उम्र पूरी करने के बाद अधिकारियों का परफार्मेंश रिव्यू किया जाएगा। नोटिस के मुताबिक सलाना अप्रेजल में फेल होने पर अधिकारियों को तीन महीने की नोटिस देकर रिटायर कर दिया जाएगा। बड़ी बात यह है कि मोदी सरकार करीब सवा दो सौ भ्रष्ट एवं निकम्मे अधिकारियों की पहचान कर उन्हें सेवा मुक्त भी करने जा रही है।

इन्हीं सब कठोर कदमों का नतीजा है कि देश का राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। स्थिति यह है कि विदेशी निवेश आकर्षित करने में भारत ने अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ दिया है, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है। इस छमाही तक भारत को 31 अरब डालर का विदेशी निवेश मिला जबकि चीन को 28 अरब डालर का और अमेरिका को 27 अरब डालर की एफ.डी.आई. ही मिल पाई, जबकि 2014 में भारत इस मामले में पांचवे स्थान पर था। यह तब है जब वैश्विक स्तर पर विदेशी पूंजी निवेश में 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। देश की विकास दर जो यू.पी.ए. सरकार के अंतिम कार्यकाल में 4.5 प्रतिशत तक गिर गई थी, उसको इस वर्ष 8 प्रतिशत जाने की उम्मीद है। इतना ही नहीं प्रतिस्पर्धा अर्थव्यवस्था वाले देशों के सूचकांक में भारत के 16 स्थान ऊपर चढ़ने से यह बात स्पष्ट है कि मोदी सरकार आर्थिक माहौल का निर्माण करने की सही दिशा में है। नि:संदेह यदि कांग्रेस पार्टी ने संसद को बाधित कर और अपने ही जी.एस.टी.बिल और श्रम सुधारों की दिशा में असहयोग न किया होता तो अब तक देश का आर्थिक परिदृश्य और चमकदार बन गया होता।

राजनीतिक परिदृश्य पर भी मूलभूत अंतर देखने को मिल रहा है। अब चीनी सेनाओं को भारत की सीमाओं पर घुसपैठ सुनने  को नहीं मिलती, यदि कभी अपवादस्वरूप ऐसा होता है तो हमारी सेनाएं और अर्धसैनिक बल उसका पूरी ताकत से प्रतिरोध करते हैं। चीन की सीमाओं पर उसकी आपत्ति के बावजूद मोदी सरकार सड़क निर्माण कराना शुरू कर दिया है, जबकि मनमोहन सरकार ऐसा सोच भी नहीं सकती थी। पाकिस्तान भी सीमाओं पर अब अमूमन गोलीबारी की हिम्मत नहीं करता और यदि करता है तो ईट का जवाब पत्थर से दिया जाता है। बड़ी बात यह है कि देश में कानून का शासन दिखाई देने लगा हैं, जिन्होंने देश को चारागाह समझा और बेरहमी से लूटा वह क्रमशः-क्रमशः कठघरे में खड़े हो रहे हैं। भले ही ऐसे लोग इसे बदले की भावना से की गई कार्यवाही कह कर चिल्ल-पों-मचाएं। विश्व रंगमंच पर भारत की प्रतिष्ठा में गुणात्मक बदलाव आया है। आतंकवाद के मामलों में पाकिस्तान अकेला पड़ता जा रहा है। भारत की बात गंभीरता से पूरी दुनिया सुन रही है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भारत को मिले-इस दिशा में बात आगे बढ़ रही है, जबकि पहले ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था। कश्मीर घाटी में भारत विरोधी नारे अब जहॉ धीमे पडे़ हैं, वहीं पाक अधिकृत कश्मीर में ही पाकिस्तान के प्रति भारी विरोध और भारत के प्रति समर्थन देखने को मिल रहा है। नि:संदेह यह सब मोदी सरकार के सुशासन का नतीजा और प्रभाव है।

नि:संदेह देश को मंजिल पाने में अभी वक्त लगेगा। फिर भी इतने कम समय में जो हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि देश की स्वतंत्रता के लिए कुर्बानी देने वालों ने जो सपना देखा था वह आने वाले दिनों में जरूर फलीभूत होगा। राहुल गांधी भले ही कहें कि देश में मात्र एक व्यक्ति की सुनी जाती है पर असलियत में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री की भी अपनी सीमाएं हैं। संघवाद के चलते वह राज्य सरकारों पर प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकते। राज्यसभा में बहुमत का अभाव और कभी-कभी न्यायपालिका की ओर से भी बाधाएं आती हैं। बावजूद इन सबके देश का विश्वास मोदी पर पूर्ववत कायम है और मोदी सरकार के समुचित परीक्षण के लिए और समय देना उचित होगा। कुल मिलाकर इतना तो कहा जा सकता है कि हम सही रास्ते की ओर चल पड़े हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा का घोषणा-पत्र जारी करते हुए मोदी ने कहा था कि वह अपने लिए कुछ नहीं करेंगे, उन्होंने यह कई बार कहा है कि उनके जीवन का एक-एक क्षण देश के लिए है। वस्तुतः यह सब उसी का प्रतिफलन है।