Source: न्यूज़ भारती हिंदी08 Oct 2015 14:56:04

वैसे तो दादरी बिसहाड़ा की दिल दलहाने वाली घटना पर जैसी घिनौनी राजनीति हो रही है उससे देशभर में विवेकशील लोगों के अंदर क्षोभ पैदा हो रहा है। किंतु, उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री आजम खान ने तो सारी सीमाओं को ही तोड़ दिया है। देश के किसी भी व्यक्ति ने कल्पना नहीं की होगी कि दादरी बिसहाड़ा की घटना को इस तरह का खतरनाक सांप्रदायिक मोड़ दिया जा सकता है। आजम खान ने उसे लगभग वैसी ही तस्वीर के रूप में पेश करने की कोशिश की है जो आजादी के पहले मुस्लिम लीग करती थी। यानी यहां हिन्दुओं का बहुमत मुसलमानों पर जुल्म ढाता है और आगे भी ढाएगा।  

एक उन्मादित भीड़ द्वारा की गई जघन्य हत्या, जिसकी सभी ने निंदा की है, उसे आजम खान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाने का ऐलान किया है। उनने प्रेस को बाजाब्ता वह पत्र जारी किया जो उनके अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून को सौपा जाएगा। एक अपराध को उसी राज्य सरकार का मंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने का ऐलान करे वह भी यह कहते हुए कि वो महासचिव बान की मून से बात करेंगे कि यहां केन्द्र सरकार के तहत मुसलमानों की किस तरह सरेआम हत्या की जा रही है तो इसे किस तरह लिया जाए! ठीक इसके कुछ दिनों पहले 10 सितंबर को बरेली के फरीदपुर थाने के दारोगा की पशु तस्करों ने इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि वह उनके ट्रक को घेरकर थाना ले जाना चाहता था। उसका नाम मनोज मिश्रा था। उसकी हत्या पर आजम खान तो छोड़िए किसी एक नेता की आंसू न निकली, न यह मुद्दा बना। मारने वाले मुसलमान थे, जिनमें से कुछ गिरफ्तार भी किए गए हैं। वह देशव्यापी तो छोड़िए स्थानीय मुद्दा भी नहीं बन सका। किसी हिन्दू ने नहीं कहा कि मुसलमान हिन्दुओं पर जुल्म ढा रहे हैं? 

यह उदाहरण इसलिए देना जरुरी है कि आजम खान और असदुद्दीन ओवैसी जैसे सांप्रदायिक तत्वों ने ऐसा माहौल बनाया है मानो इस देश के हिन्दू मुसलमानों को सरेआम मार डालते हैं और उनका कुछ नहीं होता। यह सच नहीं है। एक महीने के अंदर इसी उत्तर प्रदेश की ये दो घटनाएं इसकी गवाह हैं। एक व्यक्ति की गोमांस खाने के आरोप में भीड़ ने पीट-पीट कर मार दिया एवं उसके बेटे को अधमरा कर दिया उसका किसी नेता या पार्टी ने समर्थन नहीं। कोई सिरफिरा, उन्मादी ही इस तरह मारने को उचित ठहरा सकता है। अगर उसके घर में गोमांस था भी तो उसे पुलिस के हवाले करना चाहिए था तथा पुलिस पर उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनना चाहिए था। मृतक इखलाक के घर से मांस निकला जो फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। किसी भी सूरत में समूह को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके जो भी अपराधी हैं उनको सजा मिलनी चाहिए। आजम खान स्वयं उस सरकार के भाग हैं जिनके जिम्मे कानून व्यवस्था बनाए रखना है। उनने स्वयं उस परिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलवाया तथा 45 लाख का मुआवजा दिलवाया है। एक ओर उनकी पुलिस जांच कर रही है, दूसरी ओर परिवार को इतनी बड़ी रकम का मुआवजा मिला तो फिर किसी न्यायसंगत राज्य में इससे ज्यादा क्या हो सकता है?  

वास्तव में आजम खान अपनी फितरत के अनुसार ही मामले को सांप्रदायिकता के चरम पर ले जाने की भूमिका निभा रहे है। उन्होंने जो कुछ किया है उसमें एक साथ मुसलमानों के अंदर भय पैदा कर उनका नेता बनने, उनके अंदर हिन्दुओं के विरुद्ध उत्तेजना पैदा करने के साथ देश विरोधी गतिविधि के तत्व भी निहित है। यह बोलकर कि हम मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाएंगे और राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री गोलमेज सम्मेलन बुलाएं ताकि यह पता चले कि देश को कहां ले जाना चाहते हैं वास्तव में मुसलमानों में संदेश देना चाहते हैं कि वे उनके मामले को देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्था तक ले जाने का माद्दा भी रखते हैं। आजम खान की फितरत ऐसी है कि उनको बॉर्न कम्युनल यानी पैदाइशी सांप्रदायिक कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं है। जो कुछ वो बोलते हैं, कई बार करते हैं ओर आज कर रहे हैं वह कोई भी गैर सांप्रदायिक व्यक्ति नहीं कर सकता। देश की एकता अखंडता एवं सांप्रदायिक सद्भाव में विश्वास करने वाला व्यक्ति तो ऐसा सोच भी नहीं सकता। वह आग में पानी डालेगा। यह आग में केवल पेट्रौल डालना नहीं है, जहां आग नहीं हो वहां भी आग लगाना है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अपने छात्र जीवन से वे यही कर रहे हैं।

आश्चर्य की बात है कि आजम खान की ऐसी सांप्रदायिक एवं देश विरोधी हरकत पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव स्वयं, उनकी सरकार या समाजवादी पार्टी या तो मौन धारण किए हुए हैं या फिर उनके कथन को उचित ठहराने की कोशिश कर रही है। यह खतरनाक रवैया है। मुस्लिम वोट के लिए इस ढंग से किसी को सीमा का उल्लंघन करने देना देश के लिए ही नहीं स्वयं समाजवादी पार्टी के लिए भी आत्मघाती हो सकता है। देश के एक अपराध को, जिसे सबने जघन्य अपराध माना है, संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की घोषणा और प्रेस को पत्र जारी करना हर दृष्टि से भारत विरोधी कदम है। भारतीय संविधान के तहत शपथ लिया हुआ मंत्री ऐसा करता है तो यह संविधान का उल्लंघन नहीं तो और क्या है? क्या उसे अपने देश के संविधान, उसके तहत कायम न्यायपालिका और कार्यपालिका पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। ऐसा है तो उसे सरकार से अलग हो जाना चाहिए। वैसे संयुक्त राष्ट्र में किसी देश के ऐसे अंदरुनी मामले में हस्तक्षेप का कोई प्रावधान भी नहीं है। किन्तु भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहली घटना है जब कोई नेता एक हत्या के मामले को संयुक्त राष्ट्र में जाने का ऐलान कर रहा हो। उसकी भाषा ऐसी हो मानो वर्तमान केन्द्र सरकार ऐसा राज कायम कर रही है जिसमें मुसलमानों का या तो कत्लेआम होगा या उन्हें देश छोड़ना होगा या फिर उन्हें मजहब बदलना होगा। यह दुनिया में देश की छवि को उससे कहीं ज्यादा कलंकित करना है जितना उस घटना से हुआ है।

प्रश्न है कि ऐसी हरकत का राजनीति, कानून और संविधान के तहत क्या उत्तर हो सकता है। अगर आजम खान की जगह दूसरा होता तो अब तक उस पर देशद्रोह, सांप्रदायिकता भड़काने, देश की एकता अखंडता पर चोट पहुंचाने के प्रयास, भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का मुकदमा दर्ज हो चुका होता और संभव है वह जेल के अंदर होता। यही व्यवहार आजम खान के साथ क्यों नहीं होना चाहिए? अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो आजम जैसे दूसरे सांप्रदायिक तत्वों का मनोबल बढ़ेगा और वे इससे भी खतरनाक हरकत कर सकते हैं। आजम खान देश के नए नक्शे की बावत पूछ रहे हैं। इसका अर्थ क्या है? क्या वे मुसलमानों के लिए अगल भौगोलिक क्षेत्र की ओर इशारा कर रहे हैं ऐसे बिल्कुल मुस्लिम लीग की भाषा में बात करने वाले व्यक्ति की हरकत की अनदेखी कैसे की जा सकती है? कानूनी एजेंसियां यहां अपना काम क्यों नहीं कर रहीं हैं? मुख्यमंत्री के नाते अखिलेश यादव को भी इस पर कठोर रुख अपनाना चाहिए था।

ऐसा लगता है दादरी में असदुद्दीन ओवैसी के जाने के बाद आजम खान को उ.प्र. के सबसे बड़ा मुस्लिम नेता होने की जो अपने मन में बनाई हुई छवि है उस पर खतरा दिखने लगा। इसलिए उनने सोचा कि आवैसी से ज्यादा और इतना आगे बढ़ जाओ कि देश का कोई मुस्लिम नेता उस सीमा तक जाने की सोचे ही नहीं। इससे वे सबसे बड़े मुसलमान नेता के तौर पर माने जाएंगे और फिर उनकी बादशाहत पर कोई खतरा नहीं होगा। एक ओर ओवैसी बंधु हैं जो सांप्रदायिकता की आग फैला रहे हैं दूसरी ओर आजम खान हैं जो उसकी प्रतिक्रिया में देश के एक अपराध के मामले को बाहर ले जाने की बांग भर रहे हैं। आखिर इनको जवाब तो देना पड़ेगा। वर्तमान वोट की लालच से घिरी वर्तमान राजनीति जवाब नहीं दे सकती। अगर सरकार और कानूनी एजेंसिया भी जवाब नहीं देतीं तो क्या हो सकता है? वह जवाब यह नहीं हो सकता कि दूसरे लोग उनकी भाषा में प्रत्युत्तर दें। उनका मान्य कानूनी सीमाओं में जगह-जगह विरोध तो होना चाहिए। जनता के दबाव से ही सरकारें कार्रवाई करतीं हैं। मांग एक ही हो कि आजम खान को मंत्रिमंडल से बरखास्त किया जाए और उन पर मुकदमा दर्ज हो।

जरा सोचिए किसी हिन्दू नेता ने इस तरह का बयान दिया होता तो इस समय उसकी क्या दशा होती? उसका जीना हराम हो गया होता और मीडिया के लिए बहस का सबसे बड़ा विषय कई दिनों तक। साक्षी महाराज से लेकर साध्वी प्राची या अन्य ऐसे कुछ हिन्दू नेता कम से कम ऐसा खतरनाक कदम तो नहीं उठाते, पर उनका जो बयान अस्वीकार्य होता है उस पर पूरा देश और मीडिया उनके विरुद्व खड़ा हो जाता है। आजम खान के विरुद्ध ऐसा क्यों नहीं हो रहा है यह प्रश्न अवश्य विचारणीय है।