Source: न्यूज़ भारती हिंदी16 Nov 2015 13:38:18

डॉ.भागवत का कथन पिछड़े और दलितों के विरोध में नहीं, बल्कि सचमुच उनके पक्ष में था। खासकर वर्तमान दौर में जब आरक्षण की कतार में घुसने के लिए कई संपन्न और ताकतवर जातियां पूरी तरह प्रयासरत हैं। वह चाहे महाराष्ट्र में मराठा हो, हरियाणा में जाट हों, एवं जिसका सबसे ताजा उदाहरण गुजरात में पटेल समुदाय का है।

- वीरेन्द्र सिंह परिहार

बिहार विधानसभा चुनाव भाजपा अथवा एनडीए क्यों इतनी बुरी तरह से हारा? इसको लेकर तरह-तरह की बाते हो रही हैं। लेकिन इसमें एक प्रमुख कारण यह बताया जा रहा है कि चुनाव से पहले सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की यह बात कि आरक्षण का स्वरूप राजनीतिक हो गया है, इसलिए निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक लोगों की एक समिति द्वारा इसकी नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए कि किसे आरक्षण मिलना चाहिए और किसे नहीं। इस बात को प्रमुख रूप से भाजपा की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि डॉ.भागवत के उपरोक्त कथन के चलते पिछड़ी और दलित जातियों मे यह संदेश गया कि चूंकि संघ का भाजपा पर बहुत प्रभाव है, इसलिए उनका आरक्षण समाप्त हो सकता है। फलतः पिछड़ी और दलित जातियां लालू-नीतीश के पक्ष में और भाजपा अथवा एनडीए के विरोध में गोलबंद हो गईं। जिसका नतीजा यह हुआ कि एनडीए मुकाबले में ही नहीं रहा और मात्र 57 सीटों पर सिमट गया। 

अब गौर करने का विषय यह है कि क्या डॉ.भागवत का कथन सचमुच में कुछ ऐसा था जिसे पिछड़े और दलितों के विरोध में कहा जा सके। जबकि हकीकत यही है कि श्री भागवत का कथन पिछड़े और दलितों के विरोध में नहीं, बल्कि सचमुच उनके पक्ष में था। खासकर वर्तमान दौर में जब आरक्षण की कतार में घुसने के लिए कई संपन्न और ताकतवर जातियां पूरी तरह प्रयासरत हैं। वह चाहे महाराष्ट्र में मराठा हो, हरियाणा में जाट हों, एवं जिसका सबसे ताजा उदाहरण गुजरात में पटेल समुदाय का है। स्वाभाविक है कि विकास की धारा पर सबसे आगे खड़ी इन जातियों को आरक्षण दिया गया तो सचमुच की पिछड़ी जातियों का हित बुनियादी रूप से प्रभावित होगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार आरक्षण की सीमा किसी भी कीमत पर पचास प्रतिशत से ऊपर नहीं बढ़ाई जा सकती। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय कई बार मलाईदार लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर कहने को कहकर स्वतः आरक्षण की समीक्षा की बात कर चुका है। ऐसी स्थिति में श्री भागवत यदि यह कहते हैं कि आरक्षण का लाभ सचमुच की पिछड़ी जातियों को मिलना नहीं मिलना चाहिए (उनका समीक्षा से आशय यही सही होता है) तो वह एक तरह से सर्वोच्च न्यायालय के मंतब्य को ही पुष्ट कर रहे हैं। ऐसे ही नीतीश कुमार बिहार में आरक्षण का बंटवारा पिछड़े और अति पिछड़े तथा दलित और महादलित मे करते हैं तो यह आरक्षण की समीक्षा नहीं तो और क्या है? 

गौर करने की बात यह है कि इस आरक्षण के पक्षधर सविधान निर्माताओं को खास तौर पर डॉ.भीमराव अंबेडकर की दुहाई देते हैं कि उनके दिए हुए आरक्षण को कोई नहीं समाप्त कर सकता। पर वह यह सच नहीं बताते कि बाबा साहब ने इसका प्रावधान दस वर्ष के लिए ही किया था। कम-से-कम स्थायी व्यवस्था बतौर इसे संविधान का हिस्सा नहीं बनाया था। दूसरे संविधान निर्माताओं का आशय सचमुच के पिछड़ों को आरक्षण का लाभ देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने से था न कि आरक्षण के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने से। स्वतंत्र भारत का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि यहां पर धर्मनिरपेक्षता और आरक्षण दोनों ही वोट बैंक की राजनीति के शिकार हो गए हैं। जिसके चलते स्थिति यहां तक आन पहुंची है कि आखिर में ‘‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे।’’ ऐसी स्थिति में यदि श्री भागवत इसकी समीक्षा की जरूरत महसूस करते हैं तो इस पर एक राष्ट्रव्यापी स्वरूप के बहस की जरूरत है न कि इसे क्षुद्र राजनीति का शिकार बनाने की। आखिर में यह सवाल तो पूंछा ही जा सकता है कि आरक्षण का लाभ लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे लोगों को क्यों मिलना चाहिए? नि:संदेह आरक्षण का जो वर्तमान ढांचा है उसका लाभ तथाकथित पिछड़ी जातियों के साधन-संपन्न लोग एवं दबंग तथा संगठित किस्म की जातियां ही ले रही हैं, इसलिए श्री भागवत के विचार सामयिक ही नहीं, स्वागत योग्य भी हैं। रहा सवाल श्री भागवत के कथन का बिहार विधानसभा चुनाव में प्रभाव पड़ने का तो यह सभी को पता होना चाहिए कि श्री भागवत के उपरोक्त कथन के दौरान ही कांग्रेस पार्टी द्वारा सिर्फ आरक्षण के समीक्षा की ही बात नहीं की गई बल्कि उसे आर्थिक आधार पर देने की बात भी की गई। बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी को बिहार विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के साथ होने के चलते 40 मे 27 सीटें मिलीं।

स्पष्ट है कि बिहार विधानसभा चुनावों मे भाजपा की पराजय के पीछे अन्य कारण हैं। नि:संदेह इसका बड़ा कारण तो नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि थी जिसकी कोई तोड़ एनडीए के पास नहीं थी। इसके बाद लालू यादव के जनाधार (जातीय ही सही) और नीतीश की छाई ने महागठबंधन को बढ़त दिला दी। इसके साथ प्रधानमंत्री मोदी की भाषा को लेकर भी कहीं-न-कहीं इन चुनावों पर असर पड़ा। नि:संदेह लोगों ने यह महसूस किया कि प्रधानमंत्री मोदी भी भाषा स्तरीय नहीं रही। इसके अलावा अमित शाह के पाकिस्तान में पटाखे फूटने वाले बयान को भी लोगों ने पसंद नहीं किया। रही-सही कसर द्वितीय और तृतीय श्रेणी के नेताओं ने अपने गैर जिम्मेदाराना बयानों से पूरी कर दीं। यह कहने में कोई झिझक नहीं कि भाजपा के प्रचार का एजेंडा विकास के मुद्दे से भटक गया, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। इसी दौर में दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने भी चुनाव को प्रभावित किया। बड़ी बात यह कि आज के दौर का मतदाता अब आंख बंद कर किसी एक नेता के पीछे चलने को तैयार नहीं है। यदि केन्द्र के लिए नरेन्द्र मोदी मतदाताओं की पसंद थे, तो राज्यों मे वह राज्य के नेतृत्व  कौन करेगा? इसका भी परीक्षण करता है। दिल्ली विधानसभा और बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम इसके बहुत बड़े प्रमाण है। ऐसी स्थित में जिन राज्यों में विपक्ष के पास मजबूत और लोकप्रिय नेतृत्व है, जैसे ओड़िशा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उनकी तोड़ निकालना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

भाजपा की इस बुरी पराजय को लेकर भाजपा के अंदर से ही समीक्षा करने एवं जबावदेही तय करने की मांग उठ रही है। नि:संदेह इसमें कई ऐसे लोग हैं जो भाजपा में महत्व न मिलने से हताश और निराश हैं। फिर भी यदि भाजपा में ऐसा हो रही है तो यह इस बात का सबूत है कि वह एक व्यक्ति या खानदान की पार्टी नहीं वरन एक लोकतांत्रिक पार्टी है जिसमें असहमति के सुरों की भी गुंजाइश है। बड़ी बात यह कि बिहार विधानसभा चुनावो को लेकर आत्म-मंथन तो भाजपा करे, पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि वह सामाजिक समीकरण के नाम पर अनावश्यक और अवसरवादी नेताओं को लादने की नीति पर भी उसे गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसके अलावा उसे अपने एजेंडे और नीतियों से भटकने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दूरगामी दृष्टि से उसके नतीजे बेहतर होंगे।