Source: न्यूज़ भारती हिंदी18 Nov 2015 12:43:06

सीरिया, इराक, यमन और अफगानिस्तान में गृहयुद्ध के चलते शरणार्थियों का रेला यूरोपीय देशों की ओर सतत् बढ़ रहा है। यूरोपियन यूनियन के देश यह चर्चा करने को बाध्य हो रहे हैं कि वह इन देशों के कितने शरणार्थियों को जगह देने मे सक्षम हैं। नि:संदेह इन शरणार्थियों की वजह से यूरोपीय देश गंभीर और बड़ी समस्या से घिर गए हैं। जिसके चलते सिर्फ वित्तीय कठिनाईयां ही नहीं कानून-व्यवस्था के साथ आधारभूत संरचना में भी बहुत बड़ी मात्रा में दबाव पड़ रहा है। इस भयावह शरणार्थी समस्या के चलते पश्चिमी देशों की जनसंख्या का अनुपात तो बदल ही रहा है बल्कि शरणार्थियों के माध्यम से जेहादियों के प्रवेश का खतरा उत्पन्न हो गया है। बड़ी बात यह कि इस समस्या के चलते रूस एवं अमेरिका में भी संघर्ष की संभावना उत्पन्न हो गई है।

अब-जब अधिकांश यूरोपीय देश इन शरणार्थियों को जगह दे रहे हैं वहीं पड़ोसी इस्लामी देश इनकी ऐसी दशा के बावजूद इन्हें अपने देश मे शरण देने से कतई अनिच्छुक हैं। अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और रूस सभी आईएसआईएस के ऊपर हवाई हमले करने के बावजूद अभी तक उसे अप्रभावी नहीं कर पाए हैं। शरणार्थी समस्या आगे अफ्रीकी देशों में भी भयावह हो सकती है क्योंकि आईएसआईएस एक छोर से और बोकोहरम दूसरे छोर से सक्रिय हैं। इस तरह से विभिन्न शाखाओं में पाकिस्तान से लेकर यमन तक संपूर्ण मध्य-पूर्व में संघर्ष चल रहा है। सत्ता-संघर्ष में इन समुदायों के झगड़े और बढ़ जाते हैं, जिसके तत्कालिक उदाहरण सीरिया और यमन में गृहयुद्ध हैं। अब अकेले सीरिया में आईएसआईएस और अलकायदा के कत्लेआम के चलते विगत चार वर्षों में 2.5 लाख लोग मारे जा चुके हैं और 45 लाख लोग 8 यूरोपीय समेत दूसरे देशों मे शरण ले चुके हैं। आईएसआईएस वहां के राष्ट्रपति बसर अलसद्र को राष्ट्रपति की कुर्सी से किसी भी कीमत पर हटाना चाहता है, क्योंकि वह शिया समुदाय से संबंधित हैं। इराक में सुन्नी जो अल्पमत में हैं, उनकी निष्ठा आईएसआईएस के प्रति है, ये बहुमत वाले शिया समुदाय के विरूद्ध हैं।

आईएसआईएस इराक के दो प्रमुख शहरों मोसुल और रामादी पर कब्जा किए हुए हैं। इनके द्वारा यजीदी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की कई खबरें आ चुकी हैं। इस एक दशक में इराक में दस लाख लोग निर्दयता पूर्वक मारे जा चुके हैं। 1980 से इराक और ईरान के बीच 1988 तक युद्व चला और जिसमें दस लाख लोग मारे गए, उसका भी बड़ा कारण सुन्नी सद्दाम हुसैन और ईरान शिया देश था। इसी तरह से यमन में होदी जो एक शिया आतंकी संगठन है, वह कतिपय कारणों से वहां के सुन्नी राष्ट्रपति को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यमन राष्ट्रपति के पक्ष में सुन्नी साउदी अरेबिया यमन पर रोजाना हवाई हमले कर रहा है, जिसमें हजारों लोग तो मारे ही जा रहे हैं, महिलाएं और बच्चे भी मारे जा रहे हैं। अफगानिस्तान में विगत कई वर्षों का संघर्ष सुन्नी बनाम शिया ही है। बहुत कुछ सुन्नी  तालिबान ने हजारा वर्ग के शिया लोगों को निशाना बनाया। अलकायदा और तालिबान ने विगत एक दशक में जहां 2.5 लाख लोगों का अफगानिस्तान में कत्ल किया। पूरी दुनिया मे मुस्लिम मुख्यतः सुन्नी और शिया समुदायों में विभाजित हैं। पूरे विश्व में सुन्नियों की संख्या जहां 87 से 90 प्रतिशत तक है, वहीं शिया 10 से 13 प्रतिशत हैं। 68 से 80 प्रतिशत शिया मुख्यतः चार देशों में रहते हैं- अजरबेजान, ईरान, इराक और बहरीन। वस्तुतः मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद ही सुन्नी और शिया में संघर्ष की शुरूआत हुई। जिसमें खलीफा के पद पर बैठे याजीद द्वारा कर्बला में हसन, हुसैन और उनके परिवार जनों का कत्ल किया गया और इस्लाम दो हिस्सों मे बंट गया। यद्यपि कुरान को दोनों ही समुदाय पवित्र मानते हैं, पर हदीस की व्याख्या को लेकर दोनों में मतभेद है।

पाकिस्तान में मुस्लमानों का एक वर्ग अहमदिया को तो पाकिस्तान में मुसलमान माना ही नहीं जाता, इस नाते वह सतत् अत्याचारों के शिकार होते रहे हैं। लेकिन शिया मुस्लिम भी समय-समय पर शिकार होते रहे हैं। 22 अक्टूबर, 2015 को कराची में एक शिया मस्जिद पर हमला कर दस लोगों को मार डाला गया। अकेले पाकिस्तान में हर साल सैकड़ों शियाओं की सामूहिक हत्याएं हुई हैं क्योंकि सुन्नियों की नजर में वह काफ़िर हैं। विगत 10 जून को आईएसआईएस ने इराक के मोसुल में एक कैदखाने पर हमला कर 679 सभी शिया कैदियों को ट्रकों में भरा और एक सुनसान जगह पर ले जाकर उन्हें गोली मार दी। बड़ी समस्या यह कि शियाओं की हत्याएं करने वाले उन्हें गैर-मुस्लिम कहकर ये हत्याएं कर रहे हैं। अर्थात किसी का गैर-मुस्लिम होना उसे मार डालने का पर्याय और उचित कारण है। क्या यह दुनिया के सभी गैर-मुसलमानों के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। क्योंकि ये दुर्दांत आतंकी कहते हैं- काफिरों को मार डालना उनका अधिकार और कर्तव्य है और ऐसा करके वह इस्लामी उसूलों का पालन कर रहे हैं। इसलिए हमें इस नासमझी में नहीं रहना चाहिए कि शियाओं की हत्याएं मुसलमानों की आपसी हत्याएं हैं। ये आपसी तब होती जब सुन्नी संगठन व सिद्धांतकार पहले शियाओं को मुस्लिम मानते।

इसलिए उन्हें और हमें सबसे पहले विचार करना चाहिए कि गैर-मुसलमानों को मारना, खत्म करना किस विचारधारा के तहत होता है? चाहे मारे जाने वाले शिया, यजीदी हों या कोई गैर-मुसलमान। एकओर इस्लाम के विरूद्ध कुछ भी होने पर हमारे मुस्लिम प्रवक्ता, वामपंथी, सेक्युलर, उदारवादी किस तरह से आवेशित होते हैं? लेकिन आश्चर्यजनक यह कि शिया संहारों पर वह कुछ नहीं बोलते। जबकि कई क्षेत्रों में शियाओं के पूर्ण संहार का खतरा मड़रा रहा है। क्वेटा के शिया अपने घरों-बस्तियों मे बंद से रहते हैं- बाहर आए नहीं कि मारे जाने का खतरा। बलूचिस्तान के शिया नेता सैयद दाउद आगा कहते हैं- हम लोग तो बस कब्र खोदने वाले समुदाय बन गए हैं, वे हमारी मस्जिदों के सामने आकर मार डालो के आह्वान करते रहते हैं।

यदि यह तथ्य सभी हिंदुओं, बौद्धों, सेकुलर वामपंथी, दलितवादी हिंदुओं के लिए रोंगटे खडे़ करने वाली बात नहीं तो और क्या इसका अर्थ यह कि प्रतिनिधि इस्लाम और उसको मानने वाले विश्वव्यापी समूह आमतौर पर गैर-मुसलमानों को मार डालने योग्य मानते हों? शियाओं के नियमित संहार पर आम मुस्लिम मौन का, इसके सिवाय कोई और अर्थ नहीं। इस तरह से सवाल उठता है कि क्या जानवरों की तरह सालाना मारे जाने वाले सैकड़ों शियाओं का जीवन एक सुन्नी आतंकी से भी सस्ता है? इन संहारों को अंग्रेजी मीडिया भ्रमवश सुन्नी-शिया प्रतिद्वंदता बताता है जो गलत है, क्योंकि कभी शियाओं द्वारा सुन्नियों के संहार की खबर बहुत ही अपवाद स्वरूप ही आती है। हकीकत यह भी है कि जिन देशों में शिया बहुमत में हैं वहां भी जुल्म शियाओं पर ही होते रहे हैं- जैसे इराक और बहरीन। इराक में सद्दाम हुसैन का शासन सुन्नी राज था और शिया दूसरे दर्जे के नागरिक थे। बहरीन में शिया बहुमत पर सुन्नी खलीफा का कठोर शासन है। वहां लोकतंत्र की मांग करने पर कई शियाओं पर गोलियां चलीं और कईयों को मृत्यु दंड दे दिया गया। अतः लब्बो-लुआव यह कि विशुद्ध इस्लामी सुन्नी विचारधारा ईसाइयों, हिंदुओं, बौद्धों, तो क्या भिन्न मताबलंवी मुसलमानों तक को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। उनका सुन्नियों से बराबरी का राजनीतिक अधिकार मांगना भी कई मुस्लिम देशों में अकल्पनीय है। स्वयं साउदी में कानूनी तौर पर शिया हीन दर्जे के नागरिक हैं।

साउदी अरब के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अब्दुल रहमान अलबराक का कहना है- यदि किसी सुन्नी बहुल देश में शिया अपने विश्वासों का खुले रूप से पालन करने की जिद करे तो सुन्नी राज्य के पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं कि वह शियाओं के विरूद्ध युद्ध छेड़ दे। इस सहज इस्लामी विचार का निहतार्थ दुनिया के सभी गैर-मुस्लिमों को ठंडे दिमाग से समझने की जरूरत है। खासकर भारत जो 800 वर्षों तक ऐसी स्थिति को भुगत चुका है। उसे ऐसी स्थित से ही नहीं इस मनोवृत्ति से भी बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। खासतौर से जब आईएसआईएस अपने नक्शे में भारत को खुरासान घोषित कर भविष्य में कब्जाने की घोषणा कर रखी है। एक चीनी कहावत के अनुसार जब सामने वाला आपके गाल पर थप्पड़ मारता है तो यह उसकी गलती है, लेकिन अगर वह दूसरा थप्पड़ मारता है तो वह आपकी गलती है। पर फिर भी लगता है कि इस देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। अब 14 नवम्बर को फ्रांस के पेरिस में आईएसआईएस के दुर्दान्तों द्वारा अपने पेरिस स्थिति सजातीयों के सहयोग से जिस तरह से मुम्बई के 8/11 की तर्ज पर 150 से ज्यादा लोगों की हत्या की गई और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। इससे यह स्पष्ट है कि यह मामला मुस्लिम बनाम मुस्लिम का नहीं, बल्कि मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम का ही है।