Source: न्यूज़ भारती हिंदी18 Nov 2015 11:06:25

बिहार चुनाव में जद (यू), राजद एवं कांग्रेस की इतनी बड़ी जीत एवं भाजपा गठजोड़ की ऐसी पराजय की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। चुनाव एवं उसके बाद अपनी जीत का दावा करने वाले नीतीश कुमार एवं लालू प्रसाद यादव को भी वाकई ऐसी जीत का आभास था या नहीं कहना कठिन है। कारण, जिस ढंग की टक्कर भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों ने दिया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं चुनाव आरंभ होने के पूर्व 26 जनसभाए कीं, चुनाव के पूर्व चार परिवर्तन रैलियां की उन सबमें जितनी भारी संख्या में लोग आए और उनकी मोदी के भाषणों पर जो प्रतिक्रियाएं थीं वो लगभग वैसी ही थी जो हम लोकसभा चुनाव में देख रहे थे। इसमें भले कुछ विश्लेषक यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि विजय तो जद(यू), राजद एवं कांग्रेस गठबंधन की होगी इसे लेकर आश्वस्त होना कठिन था। वैसे भी लगभग 10 वर्ष शासन करने और उसमें साढ़े सात वर्ष भाजपा के साथ सरकार चलाने के बाद उसे छोड़ देने के खिलाफ एक वर्ग का गुस्सा तो उनके प्रति था जो कि लोकसभा चुनाव में परिणामों के रूप में प्रदर्शित हुआ। भाजपा ने कुल 850 सभाएं कीं और उनके गठबंधन के नेताओं राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा और उनके दूसरे साथी अरुण कुमार, चिराग पासवान आदि ने भी भारी संख्या में सभाएं कीं, अथक परिश्रम किया। लोकसभा चुनाव में कुल 39 प्रतिशत मत तथा 31 स्थान जीतने वाले राजग को विधानसभा में उतनी नहीं तो उसके आसपास की सफलता की उम्मीद अवश्य थी। परिणाम ने साबित कर दिया कि उनकी उम्मीद सही नहीं थी। तो कैसे देखा जाए इस परिणाम को? आखिर नीतीश लालू की विजय का क्या कारण माना जाए?

विरोधी इसका सीधे अर्थ निकाल रहे हैं कि मोदी की लोकप्रियता न्यूनतम स्तर पर आ गई है, सरकार के काम से जनता नाखुश है, उनकी ओर आकर्षण कम हुआ है, देश में कथित बढ़ती असहिष्णुता को लेकर जो माहौल बना उसने भी भाजपा को नुकसान पहुंचाया तथा दालों की महंगाई ने उसे अनुत्तरित किया। कहा जाता है कि एक सफलता आपकी अनके भूलों को ढंग देतीं हैं और एक विफलता आपकी अनके खूबियों और सफलताओं को भी ढंग देतीं हैं। वास्तव में इस परिणाम से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मोदी की लोकप्रियता न्यूनतम बिन्दू पर आ गई है, उनके प्रति आकर्षण खत्म हुआ है, देश में सरकार विरोधी वातावरण बन चुका है और इसका लाभ नीतीश लालू को मिला है। नीतीश के लिए यह बहुत बड़ी सफलता अवश्य है। अगर आप मई 2014 में लोकसभा पराजय के बाद पार्टी में उनके खिलाफ उभरे असंतोष को याद करें और आज से तुलना करें तो आपको जमीन आसमान का अंतर आएगा। एक व्यक्ति जिसे विद्रोह के कारण मुख्यमंत्री पद त्यागना पड़ा वह आज स्वयं चुनाव जीतकर पुनः उस पद की शपथ लेगा। यहां तक कि जीतन राम मांझी को अपमानित करके हटाने के बाद जिस तरह उनके पक्ष में दलित स्वाभिमान का माहौल बना था उसमें लग रहा था कि विधानसभा चुनाव कहीं लोकसभा चुनाव की तरह एकतरफा न हो जाए। नीतीश कुमार को अपनी सरकार बचाने के लिए राजद को तोड़ना पड़ा और उसके विरुद्ध लालू यादव सड़क पर उतरे। यानी उनको बहुमत के लिए कई ऐसे काम करने पड़े जो उनकी स्वच्छ छवि पर दाग हैं। तो पूरे विरोधी वातावरण को खत्म कर फिर से जनता की लोकप्रियता पा लेना सामान्य उपलब्धि नहीं है।

यह चमत्कार यूं ही नहीं हुआ। लेकिन इसमें ही भाजपा और राजग की विफलता है कि उनने आंदोलनों, अभियानों से उस माहौल को मजबूत न कर केवल मीडिया में बयान देकर अपने कर्तव्यों की इति श्री समझी और इस बीच नीतीश को फिर से अपने को मजबूत करने का मौका मिल गया। नीतीश के सामने अपने अस्तित्व बचाने का संकट था तो लालू के सामने करो या मरो की। इसमें दोनों के बीच एकता हो गई तथा नीतीश ने समय को भांपकर पिछले विधानसभा में जीती हुई सीटों से भी कम पर लालू के साथ बराबरी का समझौता किया एवं कांग्रेस को उसकी उम्मीद से ज्यादा 40 सीटें दे दीं। इससे गठजोड़ के अंदर किसी प्रकार के खटपट की संभावना खत्म हो गई। इसके साथ नीतीश कुमार ने चुनावी रणनीति में वो सारे हथियार अपनाए जो नरेन्द्र मोदी के यूएसपी माने जाते थे। मतलब अपनी आलोचना को प्रदेश की अस्मिता का प्रश्न बना देना और उसे परवान चढ़ाना कि देखो, मोदी तो बिहार के लोगों का अपमान कर रहे हैं। दूसरे, सोशल मीडिया का अधिकतम उपयोग। इस मामले में भाजपा बिहार में नीतीश से पिछड़ी लग रही थी। तीसरे, गूगल विज्ञापन में भाजपा को पीछे छोड़ना। हालांकि यह सब तो चुनावी रणनीति के लिए मूल वस्त्र के ऊपर आभूषण मात्र हैं, पर इनसे युवा मतदाताओं पर असर तो पड़ता है। नीतीश ने आरंभ में मोदी की रैलियों के पत्रकार वार्ता करके जिस व्यवस्थित तरीके से एक-एक विन्दू का अपने अनुकूल उत्तर दिया उससे चुनाव मोदी बनाम नीतीश में परिणत करने की उनकी रणनीति सफल हो गई। यहीं से उनका ग्राफ उठा। दूसरी ओर भाजपा ने स्वयं एवं उनके सहयोगियों ने भी टिकटों के चयन में गलतियां की। वैसे लोग टिकट से वंचित रहे जो वाकई हकदार थे। उनमें से कई बागी बनकर खड़े हुए और उनने भी पराजय में भूमिका निभाई।

मोदी ने आरंभ में नीतीश का ही संज्ञान लिया और नीतीश बनाम मोदी का द्वंद्व चुनाव का प्रमुख आकर्षण बना था। प्रधानमंत्री ने पहले चरण तक तो लालू का संज्ञान ही नहीं लिया। लेकिन लालू यादव ने इस तरह अपनी शैली से मोदी एवं भाजपा को निशाना बनाया कि प्रधानमंत्री ने उनका संज्ञान लेना आरंभ कर दिया। यह एक रणनीति चूक थी। प्रधानमंत्री मोदी के सलाहकारों ने बिहार के संदर्भ में उनको कई गलत सुझाव दिए जिसका उनने पालन किया। लालू यादव ने जिस ढंग से यादवों का नाम लेकर पहले गोलबंदी करने की रणनीति अपनाई, उसके बाद कहा कि लड़ाई सवर्णों और पिछड़ों के बीच है फिर बीफ हिन्दू नहीं खाता है क्या और ऐसे कई तरीकों से मुस्लिम ध्रुवीकरण के बयान दिए उन सबका जवाब देने के लिए आपको उनके स्तर पर जाने की आवश्यकता पड़ी जिससे लाभ लालू को ही हुआ। सबसे पहले तो वे यह संदेश देने में सफल रहे कि चुनाव में उनका वजूद है तभी तो प्रधानमंत्री मोदी उनपर इतना हमला कर रहे हैं। यहीं से लालू के समर्थकों में उनका ग्राफ बढ़ा और वे उत्साहित होकर काम करने लगे। यादव और मुसलमान समीकरण का उनका पांसा ठीक बैठने लगा। नीतीश कुमार ने बड़ी बुद्धिमता से स्वयं ऐसे मुद्दे नहीं उठाए क्योंकि इसके लिए लालू पर्याप्त थे और अपनी एक जिम्मेवार वक्तव्य वाले नेता की छवि बनाई। मोदी के सामने दो व्यक्तित्व हो गए जब दोनों के सामने एक। 

सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण के बयान का जिस ढंग से लालू और नीतीश दोनों ने गलत व्याख्या करके यह संदेश दिया कि वे पिछड़ों का आरक्षण छीनना चाहते हैं उनका जवाब देने में भाजपा आवश्यकता से ज्यादा रक्षात्मक हुई। प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि हमें बाबा साहब ने जो आरक्षण दिया है उसे कभी खत्म नहीं करेंगे। यहां तक जाने की आवश्यकता नहीं थी। मोहन भागवत का एक तार्किक बयान था भाजपा को उसकी सही व्याख्या प्रस्तुत कर जनता की समझदारी पर विश्वास करना चाहिए था। यही नहीं मोदी से लोग जाति से ऊपर उठकर राजनीति की अपेक्षा करते हैं। उनको लोकसभा में समर्थन का मूल कारण ही यही था कि लोग जाति और संप्रदाय की राजनीति तथा वोट के लिए इनके तुष्टिकरण से आजीज आ गए थे। इसमें यदि आप स्वयं को अति पिछड़ा का बताते हैं तो आपके नेताओं को लगता है कि चलो नीतीश एवं लालू के पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण का उत्तर मिल गया, लेकिन आपके बहुत बड़े समर्थक वर्ग को यह पसंद नहीं आता। वे आपको मजबूरी में मत तो देंगे लेकिन उत्साह से काम नहीं करेंगे। संभव है बिहार में यह हुआ हो।

एक बार प्रधानमंत्री ने विकास को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया। भागलपुर की परिवर्तन रैली में उनने सारे मुद्दों को छोड़कर उपस्थित जन समुदाय से यही प्रश्न किया कि क्या चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं होना चाहिए? क्या चुनाव यहां से नवजवानों के पढ़ाई और रोजगार के लिए पलायन रोकने के मुद्दे पर नहीं होना चाहिए? क्या हमारी माताओं-बहनों की सुरक्षा के नाम पर चुनाव नहीं लड़ा जाना चाहिए? किसानों के खेत को सिंचाई मिले, सबको बिजली मिले, स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा घर के आसपास हो...इन सब मुद्दों पर चुनाव नहीं लड़ा जाना चाहिए? लोगों ने जवाब दिया लड़ा जाना चाहिए। उसके बाद नीतीश और लालू चाहे कुछ भी बोले प्रधानमंत्री एवं पूरी भाजपा को इस पर सख्ती से अड़े रहना चाहिए था। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री या अन्य नेताओं ने विकास का मुद्दा छोड़ा, लेकिन अन्य मुद्दों जाति, आरक्षण पर सफाई, तंत्र-मंत्र, मुंह में शैतान...आदि का जवाब देने के कारण भावनाओं के स्तर पर ये मुद्दे गौण हो गए। इसका खामियाजा पार्टी और गठबंधन को भुगतना पड़ा है।