Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Nov 2015 12:40:06

सोमवार शाम एक निजी अखबार समूह के पुरस्कार समारोह में मशहूर अभिनेता आमिर खान ने कुंद पड़ चुके असहिष्णुता के मुद्दे को पुनः धार दे दी। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी; फिल्म निर्मात्री किरण राव देश में बढ़ रही असहिष्णुता से घबराती हैं और एक बार उनसे देश छोड़ने को कह चुकी हैं। इससे पूर्व अभिनेता शाहरुख़ खान भी दो नवंबर को देश में बढ़ रही असहिष्णुता पर अपने विचारों से सवालों के घेरे में आ गए थे। आमिर खान के बयानों के बाद उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर बाकायदा अभियान सा चलने लगा है। राजनीतिक हस्तियों के बेवकूफाना बयानों को परे हटा दें तो आमिर का बॉलीवुड में भी जमकर विरोध हो रहा है। कुल मिलाकर आमिर खान ने एक ऐसे मुद्दे को जिंदा किया है जिसकी वजह से देश की काफी छीछालेदर हो चुकी है और देश के ही अंदर दो ऐसे गुट बन गए हैं जिनका संघर्ष किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। आमिर खान ने जो भी कुछ कहा, वह पूरे होशो-हवास में कहा जिससे यह साबित होता है कि गोधरा दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक आलोचना करने वाले आमिर का मन आज भी मोदी को लेकर साफ़ नहीं है। दरअसल, आमिर ने कांग्रेस को संजीवनी देते हुए कहा है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि को लेकर कहा कि हर बार उनका उदाहरण देकर बहस के रुख को नहीं बदला जा सकता। आखिर आमिर कौन सी बहस चाहते हैं और किससे? क्या आमिर को हिंदुत्व से खतरा है, जिसकी गलत व्याख्या राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के लिए करते हैं?

हिंदुत्‍व की विशिष्‍टता को भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति स्‍वर्गीय सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन ने अपनी पुस्‍तक 'हिंदू व्‍यू ऑफ लाइफ' में व्‍यक्‍त किया है- "हिंदुत्‍व अथवा हिन्‍दुइज्‍म एक जीवन पद्धति है। यह चिंतन और विचार के मामले में सबको पूरी छूट देती है परंतु आचरण के मामले में यह सबको उस आचार-संहिता में बांधती है जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है। कोई आस्तिक हो या नास्तिक, कोई संदेहवादी हो या पलायनवादी, यदि वे उस संस्‍कृति और जीवन पद्धति को अपनाते हैं, तो वे सभी हिंदू हैं। हिन्‍दुइज्‍म मजहबी एकात्‍मकता पर बल न देकर आध्‍यात्मिकता और नैतिक अथवा धार्मिक आचरण पर बल देता है। इसका आग्रह किसी विशेष पूजा-पद्धति या मतवाद पर न होकर श्रेष्‍ठ व्‍यवहार और नैतिक मूल्‍यों पर है। 'सत्‍यंवद, धर्मंचर' का उपदेश इसी सत्‍य का द्योतक है। वे सभी लोग जो उन नैतिक मूल्‍यों से (जो हिंदू धर्म की विशेषताएं हैं) को अपनाने को तैयार हों, हिन्‍दुइज्‍म की इस परिधि में आ सकते हैं। हिन्‍दुइज्‍म कोई एक संप्रदाय या पंथ न होकर उन सब व्‍यक्तियों और पंथों का समाहार है जो ठीक मार्ग को अपनाते और सत्‍य को ग्रहण करने को उद्यत हों।"

यहां यह गौर करना होगा कि हिन्‍दुइज्‍म इस्‍लामी और ईसाई जगत द्वारा मान्‍य मतवाद और मजहब के संबंध में यह मानकर चलता है कि मजहब मन और आध्‍यात्मिक अनुभव के मामले में मतभेद और विभिन्‍न अनुभवों का होना स्‍वाभाविक है। हिन्‍दुइज्‍म इस बात को मानता है कि परमात्‍मा किसी का शत्रु नहीं अत: हिन्‍दुइज्‍म सभी प्रकार की पूजा-पद्धतियों और मतों को अपने अंदर समाहित करता हुआ उनको ऊपर उठाने का प्रयत्‍न करता है। यह किसी विश्‍वास को जो उससे मेल नहीं खाता, तलवार के बल पर खत्‍म करने के बजाय उसे ज्ञान के प्रकाश से सुधारने का पक्षधर है। जरा सोचिए, जब हिंदुत्‍व की थोड़ी सी व्‍याख्‍या में ही इसका इतना सुंदर चित्रण हुआ है तो यह माना जा सकता है कि वृहदता में हिंदुत्‍व के विचार का कोई सानी नहीं है। यहां कहीं भी मुसलमानों पर आक्रमण या उनके विरोध के विषय में नहीं कहा गया है किंतु वर्तमान में हिंदुत्‍व की जिस परिभाषा से संघ और भाजपा सरकारों को मुसलमान विरोधी साबित करने की होड़ मची रहती है, वह राजनीति करने वालों की देन है।

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2012, 2013 और 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की क्रमशः 668, 823 और 644 घटनाएं हुईं , जिनमें क्रमशः 39, 77 और 26 लोगों की जाने गईं। यह सब तत्कालीन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के शासनकाल में हुआ। मैं न सिर्फ आमिर खान से बल्कि शाहरुख़ खान से भी पूछना चाहता हूं कि आपको तब देश असहिष्णु नहीं लगा? या फिर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश असहिष्णु हो गया? हाल ही में जो कोशिश साहित्यकारों ने की, उसी को आगे बढ़ाने का काम आमिर-शाहरुख़ कर रहे हैं। हालांकि ऐसा करते समय वे यह भूल जाते हैं कि यह देश की जनता ही है जो बिना धर्म, जात-पात देखे, दोनों को सर-आंखों पर बैठाती है। जिस अतुल्य भारत का विज्ञापन आमिर खान करते हैं, उस अतुल्य भारत को यही जनता सहिष्णु बनाती है। ऐसे में बताइए; कहां है असहिष्णुता, किस फिजा में घुला हुआ है मजहबी जहर? आमिर खान जब असहिष्णुता पर भाषण दे रहे थे, तब उन्हें किसी ने नहीं रोका, क्या यह सहिष्णुता नहीं है। आमिर आगे भी फिल्में बनाते रहेंगे, विज्ञापनों में नजर आते रहेंगे, आगे भी देश की जनता उन्हें रुपयों से लादती रहेगी, आगे भी वे ऐसे भाषण देते रहेंगे लेकिन मजाल है कि उनकी या उनके परिवार की सेहत पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े। यह है इस देश की सहिष्णुता जिसका बेजा इस्तेमाल करने में लगे हैं आमिर खान।

आमिर की बयानबाजी ने पाकिस्तान को मौका दे दिया कि वह भी भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दागदार कर सके और चूंकि इस देश ने, यहां की जनता ने आमिर को वह औकात दी है जिसकी दम पर उनका कद इस बार देश की इज्जत कम करवा सकता है। आमिर-शाहरुख़ का क्या? इनकी बयानबाजी से इनके घरों पर पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है और मुफ्त की पब्लिसिटी मिल रही है, वह अलग। इनकी फिल्में भी चल ही जाएंगी। फिलहाल तो आपकी बयानबाजी एक पुरानी कहावत याद आ रही है- ''जिस थाली में खाते हो, उसी में छेद करते हो।'' आमिर और शाहरुख़, आप सच में इस देश के लायक नहीं हैं, यदि वास्तव में आपको भारत में रहने से डर लगता है तो आप कहीं भी जाने को स्वतंत्र हैं। वैसे भी पाकिस्तान से आपको बुलावा आ ही रहा है। जाकर रहिए और फिर दुनिया को बताइएगा की पाकिस्तान या अन्य कोई मुल्क है इतना सहिष्णु, जितना की भारत।