Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Nov 2015 12:46:09

गत दिनों कर्नाटक सरकार द्वारा दीवाली के अवसर पर टीपू सुल्तान की 266वीं जयन्ती मनाई गई। इस अवसर पर विश्व हिंदु परिषद, कैथोलिक ईसाईयों और कई लोगों द्वारा इस आयोजन का कटु विरोध किया गया। यहां तक कि कर्नाटक बंद का आयोजन किया गया जिसमें कुछ लोगों की जानें तक चली गईं। इस अवसर पर कर्नाटक सरकार के प्रख्यात साहित्यकार गिरीश कर्नाड द्वारा टीपू सुल्तान की पक्षधरता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर टीपू सुल्तान हिंदू होते तो उनका भी कद मराठा शासक छत्रपति शिवाजी की तरह होता। उन्होंने बंगलुरु एयरपोर्ट का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखने की मांग भी की। दूसरी तरफ हिंदू एवं कैथोलिक संगठनों का कहना है कि टीपू एक धर्मान्ध एवं कट्टर शासक था। उसने हजारों हिंदुओं को इस्लाम में मतान्तरित किया। सिर्फ पुरुषों को ही नहीं पता कितने बच्चों और महिलाओं की हत्या कराई। इस संबंध में इलाकुलम कुंजन पिल्लई लिखते हैं- टीपू सुल्तान के मालाबार आक्रमण के समय दो हजार ब्राम्हणों की हत्या करा दी गई, हजारों ब्राम्हण जंगलों में भाग गए। 1 हजार हिंदुओं को मतान्तरण के लिए श्री रंगपट्टम के किले में कैद रखा गया जो अंग्रेजों द्वारा 1793 में टीपू सुल्तान के मारे जाने के बाद ही मुक्त हो सके। कुर्ग राज परिवार की एक कन्या को जबरिया मुसलमान बनाकर टीपू ने उससे निकाह किया। विदेशी लेखकों ने भी टीपू सुल्तान की धर्मान्धता पर लिखा है।

फुलाटॉन ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि सन 1783 में पालघाट के किले पर विजय के दौरान टीपू ने हजारों निहत्थे ब्राम्हणों की हत्या की। विलियम लोमने ने मालाबार मैन्युयल में टीपू द्वारा तोडे गए मंदिरों की संख्या सैकडों मे बताई है। राज वर्मा ने केरल में संस्कृत साहित्य के इतिहास मे लिखा है कि टीपू ने हिंदू देवी-देवताओं की असंख्य मूर्तियों को तोड़ा व पशुओं के सिर काटकर मंदिरों को अपवित्र किया। उसने सभी प्रमख शहरों के नाम बदल दिए थे। जैसे मंगलौर को जलालाबाद, मैसूर को नजाराबाद, धारवाड़ को कुशैद-शबाद, डिंडीगुल को खालिदाबाद, कोझीकोड को इस्लामाबाद इत्यादि। टीपू की मृत्यु के बाद इन नगरों का पुनः मूल नाम रखा गया। टीपू की सहष्णुता और उदारता को लेकर यह यशोगान किया जाता है कि वह श्री रंगपट्टनम मंदिर और श्रंगेरी मठ को दान दिया करता था। श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य से उसका पत्र-व्यवहार भी होता था। तत्संबंध में डॉ.एम.गंगाधरन का कहना है कि टीपू का विश्वास भूत-पिशाचों में था और उनके दुष्प्रभाव से बचने के लिए तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए वह पुजारियों को दान देता था। श्री रंगपट्टनम के पुजारियों ने टीपू को बताया था कि विशेष अनुष्ठान से वह दक्षिण भारत का सुल्तान बन जाएगा और उसी विशेष अनुष्ठान के लिए धन दिया जाता था। टीपू के हिंदू विरोध की हद यह थी कि राज्य के 65 बड़े अधिकारियों में एक भी हिंदू नहीं था।

इतिहासकार एम.एस.गोपालन के अनुसार, अनपढ़ और अशिक्षित मुसलमानों को महत्व के पदों पर रखा गया था। बावजूद इन सबके टीपू के पैरोकारों की कमी नहीं। एक लेखक का कहना है कि टीपू के नकारात्मक पक्ष को न देखकर मात्र सकारात्मक पक्ष को देखना चाहिए। आखिर में वह धनवानों से धन लेकर गरीबों की मदद करता था। कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि वह अंग्रजों से बहादुरी पूर्वक लड़ते हुए मारा गया इसलिए उसे महान स्वतंत्रता संग्रामी कहना चाहिए। अब पता नहीं ऐसे लेाग को सकारात्मकता का उपदेश सिर्फ हिंदू-विरोधियों के लिए ही क्यों प्रासांगिक होते हैं। यहां तक कि छत्रपति शिवाजी का मूल्यांकन तक करने में वह बेहद अनुदार हो जाते हैं। उन्हें पहाड़ी चूहा और विश्वासघाती (अफजल खान के प्रसंग में) तक कह देते हैं। वैसे जहां तक अच्छाई और बुराई का प्रश्न है वह तो सभी में कमोवेश रहती है। घोर हिंदू विरोधी औरंगजेब में भी कुछ अच्छाइयां थी। वह मितव्ययी था। कई मंदिरों को गिराने के बावजूद उसने कुछ मंदिरों को दान भी दिया था। कुछ हिंदू उसके शासन में बड़े पदों पर भी थे। तो क्या हम औरंगजेब की अभ्यर्थना कर सकते हैं और उसको आदर्श मान सकते हैं?

दूसरी तरफ जहां शिवाजी का प्रश्न है उनका सख्त आदेश रहता था कि युद्ध के दौरान औरतों और बच्चों को कतई निशाना न बनाया जाए और उनके सम्मान की पूरी तरह रक्षा की जाए। कल्याण के मुस्लिम सूबेदार की बहू का प्रसंग इस संदर्भ में एक ज्योति-स्तम्भ की भांति है। शिवाजी ने सम्प्रदाय या मजहब के आधार पर किसी को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने कोई मस्जिद नहीं तोड़ी, उन्होंने किसी मुसलमान या अन्य मताबलंबी को धर्मान्तरित नहीं किया। वह पूरी तरह न्याय के पक्षधर थे। यहां तक कि पुत्र सम्भाजी को भी एक अपराध में प्रतापगढ़ किले में कैद करवा दिया था। छत्रपति शिवाजी का सख्त निर्देश था कि सैनिकों अपने वेतन से ही जरूरत का सामान खरीदें, कहीं लूट-पाट यहां तक की बेगार की शिकायत नहीं आनी चाहिए। सेना के मार्च के दौरान किसानों की खड़ी फसल कतई नष्ट नहीं होनी चाहिए।

एक बार छत्रपति को जब नौसेना की दृष्टि से जहाजों के निर्माण हेतु सागौन एवं आम के लकड़ी की आवश्यकता हुई जो उनके राज्य में पर्याप्त थी। पर जब उन्हें पता चला कि इसका उपयोग किसान कृषि कार्यों में करते हैं तो उन्होंने अपने राज्य से उपरोक्त लकड़ी न कटवाकर क्रय कर राज्य के बाहर से बुलवाई। शिवाजी का स्पष्ट आदेश था कि दुश्मनों के क्षेत्र में अमीर व ताकतवर मुसलमानों के अलावा किसी भी गरीब मुसलमान से धन न वसूलें। शिवाजी के प्रशासन में ही नहीं सैन्य अधिकारियों के पद पर भी कई मुसलमान थे। इनमें दौलत खान, नूर खान बेग, सिद्दी हिलाल और मुल्ला हैदर के नाम उल्लेखनीय हैं।

सूरत विजय के समय फ्रांसिस बर्नियर लिखता है- एक डच क्रिशचयन का प्रमुख मर गया था, इसलिए शिवाजी ने उसकी विधवा पत्नी व परिवार की अन्य महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया, उनकी सुरक्षा में सैनिक लगाए। शिवाजी के राज्य में भ्रष्टाचार कतई अस्वीकार्य था। यहां तक कि सौतेले मामा मोहिते द्वारा रिश्वत लिए जाने की जानकारी मिलने पर शिवाजी ने उन्हें कारागार में डाल दिया था। औरंगजेब ने एक बार अपने एक शहजादे को संबोधित करते हुए लिखा था-‘‘शहजादे, शिवाजी दुश्मन के मजहब, मस्जिद, औरत, मजहबी कलाम और फकीरों की इज्जत करता है। तभी तो उसकी इज्जत और शोहरत बुलंद मीनार की तरह बिना सिर झुकाए आसमान को छू रही है। शहजादे हुकूमत करनी है तो शिवाजी का चलन सीखों’’। वस्तुतः शिवाजी सुशासन के आइकान थे। पचासों किलों के स्वामी होते हुए भी उन्होन अपने परिवार से या किसी रिश्तेदार केा किलेदार नहीं बनाया। ताकि वह परिवारवाद से मुक्त होकर स्वच्छ और सख्त प्रशासन दे सकें। पुर्तगाली वायसराय काल द सेंट व्हिंसेंट ने शिवाजी की तुलना सिकंदर और सीजर से की है।

शिवाजी व मराठा इतिहास के प्रसिद्व लेखक व नाट्यकार बाबासाहेब पुरंदरे लिखते हैं- शिवाजी महाराज की राजनीति और राज्यनीति मानो अमृत और संजीवनी दोनों ही हैं। उनकी शासन व्यवस्था सप्रयोग सिद्व किया हुआ एक महाप्रकल्प ही है। एक बड़ी बात यह  कि टीपू के बारे में जैसा कहा जाता है कि उसने अपने पिता हैदर अली के विशाल राज्य को खो दिया। जबकि छत्रपति शिवाजी एक साधारण जागीरदार के पुत्र होकर इतना विशाल सशक्त मराठा साम्राज्य कायम किए-जिसका औरंगजेब जैसा सम्राट भी कुछ खास नहीं बिगाड़ सका और आनेवाले वर्षों में मराठा साम्राज्य पूरे देश में प्रभावी हुआ। भला ऐसे छत्रपति का मुकाबला किससे हो सकता है? टीपू जैसे असहिष्णु, कट्टर और धर्मान्ध से तो कतई नहीं। शिवाजी जैसे शासक के बारे में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी- ‘‘न भूतो न भविष्यति’’।