Source: न्यूज़ भारती हिंदी03 Nov 2015 11:37:40

राजधानी दिल्ली में आयोजित भारत-अफ्रीका फोरम के शिखर सम्मेलन ने इस महाद्वीप के साथ हमारे रिश्ते को न केवल मजबूती प्रदान की है, बल्कि इसका प्रभाव आने वाले समय में वैश्विक परिदृश्य पर भी दिखना चाहिए। इस सम्मेलन का संबंधित पक्षों की पारस्परिकता पर ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया पर भविष्य में दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। भारत की लभगभ सवा अरब और अफ्रीकी देशों की कुल इतनी ही जनसंख्या को मिला दिया जाए तो यह समूची दुनिया की एक तिहाई आबादी होती है। 

इस सिलसिले की शुरुआत 2008 में पहले शिखर सम्मेलन के साथ हुई थी, मगर हाल के वर्षों में अमेरिका और चीन के साथ कनाडा जैसे देशों का भी ध्यान अफ्रीका की ओर गया है। दिसंबर में तो चीन और अफ्रीका का शिखर सम्मेलन भी होने जा रहा है। यही नहीं, महज पंद्रह वर्षों में चीन और अफ्रीका का द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। वहीं भारत और अफ्रीका के बीच अभी महज 72 अरब डॉलर का व्यापार होता है। अफ्रीकी देश अपने खनिजों और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों का बहुत ही समृद्ध भंडार रखते हैं, सो भारत के साथ बेहतर सहयोग और पारस्परिक तालमेल से विकास के कुछ ऐसे नए आयाम बन सकते हैं जो दुनिया का पलड़ा अपनी ओर झुका सकते हैं। वैसे भी दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के बहुत घनिष्ठ और पुराने संबंध रहे हैं। 

राष्ट्रपिता गांधी की निर्माण भूमि रहा है। इसी तरह समूचे अफ्रीकी महाद्वीप के महानतम नेता नेल्सन मंडेला को भारत भी बड़े आदर-सम्मान के साथ बराबर याद करता है। लेकिन यह हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि दो पक्षों के बीच घनिष्ठता और पारस्परिकता का विकास सिर्फ ठोस जमीन पर एक-दूसरे के सहयोग और मदद पर ही निर्भर होता है। इस सम्मेलन से निश्चय ही द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने में मदद मिलेगी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ्रीकी देशों के लिए अगले पांच वर्ष में दस अरब डॉलर के कर्ज और 1.2 अरब डॉलर के अनुदान के साथ ही शिक्षा, चिकित्सा और कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की पेशकश की है। 

अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बेहद समृद्ध है, तो भारत के पास आईटी जैसे क्षेत्र में कौशल हासिल है। अफ्रीका के तीन करोड़ वर्ग किमी में फैली सोने, लोहे, तांबे, एल्यूमिनियम, तेल और गैस की खदानें उसे विश्व का सबसे बड़ा शक्ति-केंद्र बनाता है। अफ्रीका से निकाले गए कच्चे माल से भारत खुद को दक्षिण एशिया ही नहीं, विश्व की महाशक्ति बना सकता है। अपने गैस और तेल की जरुरत के लिए वह पश्चिम एशिया पर अपनी निर्भरता समाप्त कर सकता है। भारत में बनी सस्ती और बढ़िया चीजों से वह अफ्रीकी बाजारों को पाट सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों पक्षों की चिंताओं में भी बहुत कुछ साझा है, फिर वह कुपोषण से मुक्ति हो या फिर इबोला, मलेरिया और एचआईवी-एड्स जैसी बीमारियों से लड़ाई। हैरानी की बात है कि जिस अफ्रीका के पास दुनिया को खाद्य सुरक्षा देने की क्षमता है, वहां के कई देशों में भुखमरी और गरीबी है। भारत की तरह अफ्रीका को आतंकवाद से भी जूझना पड़ रहा है। जाहिर है, अफ्रीका से रिश्ता सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं हो सकता, इसका फलक बहुत व्यापक है।