Source: न्यूज़ भारती हिंदी30 Nov 2015 17:47:48

जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द द्वारा एक साथ 75 शहरों में आईएसआईएस और आतंकवाद के खिलाफ किए गए प्रदर्शन का हर विवेकशील व्यक्ति स्वागत करेगा। यह पहली बार है जब किसी मुस्लिम संगठन ने इस प्रकार खुलकर आईएसआईएस एवं आतंकवाद के खिलाफ इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शन किया है।   

जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द द्वारा एक साथ 75 शहरों में आईएसआईएस और आतंकवाद के खिलाफ किए गए प्रदर्शन का हर विवेकशील व्यक्ति स्वागत करेगा। यह पहली बार है जब किसी मुस्लिम संगठन ने इस प्रकार खुलकर आईएसआईएस एवं आतंकवाद के खिलाफ इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शन किया है। यह प्रदर्शन अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस कथन के ठीक एक दिन बाद हुआ जिसमें उन्होंने कहा था कि मुस्लिम समाज को आतंकवाद के खिलाफ जितना व्यापक स्तर पर खड़ा होना चाहिए था नहीं हुआ। हालांकि जमीयत अमेरिका का विरोध करता है, लेकिन यहां उसने आतंकवाद का विरोध कर यह संदेश दिया कि मुस्लिम समाज का बड़ा वर्ग भी आईएसआईएस और उसके जैसे संगठनों की जघन्य हिंसा के खिलाफ हैं। जिस तरह से प्रदर्शन में शामिल मुसलमान आईएसआईएस मुर्दाबाद, आतंकवाद मुर्दाबाद का नारा लगा रहे थे उसके पहले ऐसी हिम्मत किसी संगठन ने नहीं दिखाई थी। कहा जा सकता है कि पेरिस हमले के बाद विश्वभर में वातावरण बना है उसने जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द को इसके लिए प्रेरित किया कि अब बहुत हो चुका। अगर हम आतंकवाद के खिलाफ हैं तो हमें आगे आना चाहिए। संभव है इसका असर दूसरे मुस्लिम संगठनों पर भी हो और वे भी सामने आएं। जमीयत के विरोध प्रदर्शन का मुस्लिम युवाओं पर एक सकारात्मक असर यह भी हो सकता है कि वे आतंकवाद को गैर इस्लामिक मानें।

कहा जा सकता है कि यह एक शुरुआत है। अभी तक भारतीय मुस्लिम संगठन या धर्मगुरु प्रश्न आने पर आतंकवाद की आलोचना तो करते थे, विरोध भी करते थे, कुछ जगहों से फतवा भी जारी हुआ लेकिन कभी सामूहिक स्तर पर खुलकर आईएसआईएस तथा जेहाद के नाम पर जारी इस आतंकवाद के विरुद्ध प्रदर्शन करने का साहस नहीं दिखाया था। भारत में भी आईएसआईएस के समर्थक सामने आए हैं। यहां से इराक और सीरिया जाकर लड़ने वाले भी हैं, हैदराबाद से लेकर मुंबई तक वहां जाते पकड़े गए मुस्लिम नवजवान भी हैं तो आईएस के लिए सोशल नेटवर्क पर अभियान चलाने वाला गिरफ्तार इंजीनियर भी है। इस समय भारत की सुरक्षा एजेंसिया दक्षिण भारत के ऐसे 150 युवकों पर निगरानी रख रहीं हैं जो कि आाईएस के सम्पर्क में हैं। जो संख्या सुरक्षा एजेंसियों के पास हैं उनके अनुसार 23 युवक इराक-सीरिया के आईएस कब्जे वाले क्षेत्र में संघर्ष करने गए हैं। उनमें से 6 मारे गए एवं एक मुंबई के कल्याण का युवक वापस आया। जिन 30 अन्य भारतीयों को आईएस में लगभग शामिल कर ही लिया गया था उनको भी एजेंसियां बता रहीं हैं कि बाहर जाने से रोक दिया गया है। यानी आईएसआईएस का हमला भारत को नहीं झेलना पड़ा लेकिन उसके लिए काम करने वाले भारतीय हैं और यहां उसकी ओर आकर्षित होने वाले हैं यह एक भयानक सच है। आईएस ने अपनी खिलाफत साम्राज्य का जो नक्शा पेश किया है उसमें भारत का एक बड़ा भाग है तथा इस क्षेत्र के लिए कमांडर की नियुक्ति की खबरें भी आ गईं हैं।

आईएस अगर अफगानिस्तान में पहुंच गया तथा वहां तालिबान से, अल कायदा से संघर्ष कर उसका स्थानापन्न करने की कोशिश कर रहा है तो फिर कल वह भारत में दस्तक नहीं देगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। कश्मीर घाटी में हम कई महीनों से जुम्मे के दिन आईएस का झंडा लहराते युवकों की तस्वीरें देख रहे हैं। उनका संबंध आईएस से प्रत्यक्ष नहीं भी हो तो उनके आकर्षण का केन्द्र तो माना ही जाएगा। यह खतरनाक स्थिति है। भारत भले मुस्लिम देश नहीं है लेकिन यहां दुनिया के देशों की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी बसती है। इस कारण जेहाद के नाम पर आतंकवाद का खूनी खेल खेलने वालों को लगता है कि भारत को आज न कल आसानी से अपने दायरे में लाया जा सकता है। इसमें जमीयत के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का यह कहना भी सुकून देनेवाला है कि भारतीय मुसलमानों के रहने के लिए भारत सबसे बेहतर जगह है। यह हमारा देश है। हमें यही रहना है। देखना है जमीयत के बाद कोई और संगठन ऐसा करने आता है या नहीं? स्वयं जमीयत इससे आगे जाता है या नहीं यह भी देखना होगा। भारत में जमायत-ए-इस्लामी जैसे संगठन है जिनका दर्शन जमीयत से बिल्कुल अलग है। अन्य संगठन भी हैं जो अभी तक सामूहिक रूप से मौन साधे हुए हैं।

कहा जा सकता है कि देर से ही सही किसी संगठन ने एक शुरुआत तो की। कोई अहिंसक संगठन आखिर विरोध ही तो कर सकता है। आईएस के खिलाफ इस समय किसी का सामने आना आसान थोड़े ही है। किंतु इसका दूसरा पहलू भी है। आप किसी प्रदर्शन भर से आईएस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। न उसकी ओर आकर्षित हो रहे युवकों को रोक सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने सही कहा था कि मुस्लिम समुदाय अपने बच्चों पर ध्यान रखें कि वे आतंकवाद की ओर आकर्षित न हो पाएं। यह बहुत जरुरी है। ओबामा के दोनों बयानों की मुस्लिम संगठनों ने काफी आलोचना की और उसका विरोध भी किया है। जितनी प्रखरता से ये अमेरिका और पश्चिमी देशों का विरोध करते हैं उतनी प्रखरता से इनकी आवाज एक स्वर में आतंकवादी समूहों के खिलाफ नहीं आती है। ओबामा ने गलत कुछ नहीं कहा था। हम अमेरिका की कई नीतियों से असहमत हो सकते हैं। किंतु आतंकवाद के खात्मे की बात हो, आईएसआईएस, बोको हरम, अल कायदा, तालिबान आदि के समूल नाश की बात हो तो इसके लिए सीधे अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों पर इसका आरोप मढ़ने का सिलसिला आरंभ हो जाता है। यह कब तक चलेगा? अफगानिस्तान में सोवियत संघ के अंत के लिए मुजाहिद्दीन को मदद करने का तर्क आखिर कब तक दिया जाएगा? 2014 में 32 हजार, 685 लोग विश्वभर में आतंकवादी हमलों के शिकार हो चुके हैं। इनमें 51 प्रतिशत की मौत का जिम्मेवार केवल आईएस और बोको हरम है। अगर जेहाद के नाम पर संघर्ष का इतिहास देखें तो जब अमेरिका विश्व पटल पर नहीं था तब भी यह जारी था। 1850 में सउदी अरब ने कर्बला पर जेहाद के नाम पर ही हमला करके चुन-चुनकर एक-एक लोगों का मार दिया था एवं उंटों पर लादकर सोने लाया था। पाकिस्तान ने 1970-71 में पश्चिमी पाकिस्तान यानी आज के बंगलादेश में जेहाद के नाम पर ही तो लाखों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा एवं हर प्रकार के अत्याचार किए।

वास्तव में अगर दुनिया भर की आतंकवादी घटनाओं में मुसलमान शामिल हैं तो इसके अंत में सबसे बड़ी भूमिका मुस्लिम समाज की ही हो सकती है। जेहाद का जो दर्शन है उस पर सैनिक कार्रवाई से या गैर मुस्लिम विचारकों द्वारा चोट कामयाब नहीं होगा। अगर नवजवानों को यह बताया जाएगा कि तुम्हारी असली जिन्दगी तो मौत के बाद शुरु होती है यह तो जिन्दगी है ही नहीं तो वह क्या करेगा? अगर उसे यह बताया जाएगा कि यहां तुम्हारा कुछ नहीं है जब जेहाद करके शहीद होगे तो जन्नत में तुमको हुरें मिलेंगी और सारे सुख के साधन मिलेंगे तो फिर उसके अंदर आत्मघाती बनने की प्रेरणा ही मिलेगी और हर प्रकार की क्रूरता से किसी को मारने की भी। उसे यह समझाया जाएगा कि जो हम बता रहे हैं केवल वही इस्लाम पाक है और बाकी नापाक तो फिर वह इस्लाम के दूसरे पंथों को निशाना बनाएगा ही। अगर उसके दिमाग में यह भरा दिया जाएगा कि जेहाद का मतलब ज्यादा से ज्यादा लोगों और जगहों को अपने इस्लाम के दायरे में लाना है तो फिर वह क्या करेगा? तो जेहादी आतंकवाद का कारण उसके दर्शन में है, विचार में है। उस पर चोट करने, उसे गलत साबित करने का प्रखर अभियान चलाना होगा। इस्लामी विद्वान, इस्लामी समूह...ही सम्पूर्ण इस्लामी जगत में इसका प्रचार कर सकते हैं कि जेहाद का अर्थ यह नहीं जो बताया जा रहा है। नवजवानों को उनकी ओर जाने से हतोत्साहित करने का दायित्व इन्हें ही लेना होगा। ये ऐसा नहीं कर सके तो फिर जेहाद के नाम पर आतंकवादी पूरी दुनिया की सभ्यता को नष्ट कर देंगे। वैसे भी सबसे ज्यादा तो ये मुसलमानों को ही मार रहे हैं। जमीयत ने एक शुरुआत की है लेकिन यह अत्यंत छोटी शुरुआत है। जेहाद के नाम पर आतंकवाद इतना भयानक विस्तार कर चुका है कि उसके समानांतर भारत के साथ दुनियाभर के मुस्लिम देशों में उसी शक्ति से अहिंसक वैचारिक अभियान चलाना होगा। उसमें अनेक लोगों की बलि चढ़ सकती है। इसके लिए तैयार होना होगा।