Source: न्यूज़ भारती हिंदी10 Dec 2015 12:24:56

नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस का रवैया हैरान करनेवाला है। आखिर सोनिया और राहुल गांधी अपने ऊपर लगे करोड़ों की संपत्ति हड़पने के आरोपों को लेकर न्यायपालिका का सामना करने से बचना क्यों चाहते हैं? दरअसल, निचली अदालत ने गत वर्ष इस मामले में उन्हें कोर्ट में पेश होने के लिए समन जारी किया था, लेकिन उन्होंने इसे खारिज कराने के लिए हाईकोर्ट में अपील थी। दोनों कोर्ट में व्यक्तिगत पेशी से छूट चाहते थे, लेकिन हाईकोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिल पाई है।

अब उन्हें पेश होना पड़ेगा। वैसे भी आरोपी की कोर्ट में पेशी एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया है, जिसे न्यायव्यवस्था में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति पालन करता, लेकिन कांग्रेस इस मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश करती दिख रही है। जबकि कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना है कि इस केस की सुनवाई होनी चाहिए। यदि उसे नेशनल हेराल्ड केस में गड़बड़ियां नहीं दिखाई देतीं तो उन्हें पेश होने का आदेश नहीं देती बल्कि इसे खारिज कर देती।

ये मामला नेशनल हेरल्ड अख़बार से जुड़ा है जिसकी स्थापना 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने की थी। उस समय से यह अख़बार कांग्रेस का मुखपत्र माना जाता रहा। अख़बार का मालिकाना हक़ एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड यानी 'एजेएल' के पास था जो दो और अख़बार भी छापा करती थी। हिंदी में 'नवजीवन' और उर्दू में 'क़ौमी आवाज़'। आज़ादी के बाद 1956 में एसोसिएटेड जर्नल को अव्यवसायिक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया और कंपनी एक्ट धारा 25 के अंतर्गत इसे कर मुक्त भी कर दिया गया।

वर्ष 2008 में 'एजेएल' के सभी प्रकाशनों को निलंबित कर दिया गया और कंपनी पर 90 करोड़ रुपए का क़र्ज़ भी चढ़ गया। फिर कांग्रेस नेतृत्व ने 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' नाम की एक नई अव्यवसायिक कंपनी बनाई जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और सैम पित्रोदा को निदेशक बनाया गया। इस नई कंपनी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास 76 प्रतिशत शेयर थे जबकि बाकी के 24 प्रतिशत शेयर अन्य निदेशकों के पास थे। कांग्रेस पार्टी ने इस कंपनी को 90 करोड़ रुपए बतौर ऋण भी दे दिया। इस कंपनी ने 'एजेएल' का अधिग्रहण कर लिया।

भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने वर्ष 2012 में एक याचिका दायर कर कांग्रेस के नेताओं पर 'धोखाधड़ी' का आरोप लगाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' ने सिर्फ 50 लाख रुपयों में 90.25 करोड़ रुपए वसूलने का उपाय निकाला जो 'नियमों के ख़िलाफ़' है। याचिका में आरोप है कि 50 लाख रुपए में नई कंपनी बनाकर 'एजेएल' की 2000 करोड़ रुपए कि सम्पत्ति को 'अपना बनाने की चाल' चली गई। दिल्ली की एक अदालत ने मामले में चार गवाहों के बयान दर्ज किए और 26 जून, 2014 को अदालत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित नई कंपनी में निदेशक बनाए गए सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा को पेश होने का समन भेज दिया। 

ऐसा लगता है कि अपने को फंसता देख ही सोनिया व राहुल गांधी इसे जानबूझकर राजनीतिक साजिश बताने की कोशिश कर रहे हैं। जब यह कोर्ट का मामला है, तो कांग्रेस को कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए। अपना पक्ष रखना चाहिए। इसे लेकर केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने और संसद को बाधित करने का कोई औचित्य ही नजर नहीं आता। वह भी ऐसे समय में जब वहां सूखे पर किसानों की समस्याओं पर चर्चा हो रही हो। दरअसल, मोदी सरकार के प्रति कांग्रेस की सोच कुछ-कुछ साफ होती दिख रही है। उसका रवैया है कि सरकार को कामकाज नहीं करने दो, संसद को ठप करो, ताकि कोई विधायी काम नहीं हो सके।

इस प्रकार जब पांच साल पूरे हो जाएं तो वे देश से कह सकें कि मोदी सरकार अपने वादे पूरे नहीं कर पाई। वह काम नहीं कर रही है। कांग्रेस इसलिए भी बौखलाई हुई दिख रही है क्योंकि रॉबर्ट वाड्रा पर हरियाणा में जांच चल रही है। अनुमान है कि जून तक आयोग की रिपोर्ट आ जाएगी। उसका भी कांग्रेस को सामना करना पड़ेगा। यही वजह है कि अभी से ही एक माहौल बनाया जा रहा है जिससे लोगों में यह धारणा बनाई जा सके कि मोदी सरकार विपक्ष पर बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। जबकि हकीकत इससे जुदा है। जिस मामले में समन जारी हुआ है उससे सरकार का कोई लेना देना नहीं है। सुब्रमण्यम स्वामी की एक याचिका पर केस चल रहा है। वे बेशक भाजपा के नेता हैं, लेकिन किसी गड़बड़ी को कानून के संज्ञान में लाने का हर किसी को अधिकार है। वहीं हम जानते हैं कि अदालत का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। देश में न्यायपालिका स्वतंत्र होकर फैसला करती है। ऐसे में कांग्रेस का यह व्यवहार लोगों की समझ से बाहर है। अभी देश के सामने जो ज्वलंत मुद्दे हैं उस पर सरकार से सवाल पूछने की बजाय वह हो हल्ला मचाकर देश को गुमराह करती दिख रही है।