(11 दिसम्बर, जयंती पर विशेष) 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तृतीय सरसंघचालक श्री मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस ‘सामाजिक समरसता और सेवाकार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान’ के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं। बाल्यकाल से जीवन के अंतिम क्षण समाज में फैले कुरीतियों, विषमताओं और अभावों को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक योजनाएं बनाईं। उन योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए लोकशक्ति का निर्माण किया, समाज का प्रबोधन किया। यही कारण है कि बालासाहब समरसता के संवाहक माने जाते हैं। 1974 में पुणे में आयोजित ‘वसंत व्याख्यानमाला’ में उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता लाने और विषमता को दूर करने के लिए जो बातें कही थी, वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था, “हम सभी के मन में सामाजिक विषमता के उन्मूलन का ध्येय अवश्य होना चाहिए। हमें लोगों के सामने यह स्पष्ट रूप से रखना चाहिए कि विषमता के कारण हमारे समाज में किस प्रकार दुर्बलता आई और उसका विघटन हुआ। उसे दूर करने के उपाय बतलाने चाहिए तथा इस प्रयास में हर एक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिए।”
 
सामाजिक समरसता और वंचित, पीड़ित, दलित व शोषित समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों को देशभर में विस्तारित करने का लक्ष्य बनानेवाले बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर, 1915 में नागपुर में हुआ था। बालासाहब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के कुछ समय बाद ही संघ संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के सम्पर्क में आए। वे नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगनेवाली पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ से उनकी निकटता बढ़ती गई और डॉ. हेडगेवार की प्रेरणा से उन्होंने अपना पूरा जीवन संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाने का निश्चय किया। संघ की कार्यपद्धति के निर्माण तथा कार्यक्रमों के विकास में बालासाहब का विशेष योगदान रहा। गणवेश, शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रम और गणगीत आदि निश्चित करने में उनकी मुख्य भूमिका रही है।
 
विद्यार्थी जीवन  
कुशाग्र बुद्धि के धनी बालासाहब ने विद्यार्थी जीवन में सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्होंने अनाथ विद्यार्थी वसित गृह में दो वर्ष तक अध्यापन कार्य भी किया। इसी अवधि में इन्हें नागपुर के नगर कार्यवाह का दायित्व दिया गया। इस दायित्व को उन्होंने बखूबी से निर्वहन किया। उन्होंने शाखाओं के विस्तार के साथ ही शीत शिविर, वन विहार कार्यक्रम, सहभोज और स्वयंसेवकों में गुणात्मक वृद्धि के लिए नैपुण्य वर्ग की शुरूआत की।
 
बालासाहब बचपन से ही खुले विचारों के थे। उस समय प्रचलित छुआछूत, खानपान और जाति-भेद के वे प्रबल विरोधी थे। उनके घर पर उनके सभी जातियों के मित्र आते थे। वे सब मिलकर एक साथ भोजन करते थे। वे शाखा के स्वयंसेवकों को अपने साथ रसोई में भोजन कराते थे। उनके इस पहल का प्रारंभ में घर पर विरोध हुआ, डांट भी पड़ी किन्तु बाद में सब ठीक हो गया। उन्हें नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया। इसमें विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। बालासाहब खेल में बहुत निपुण थे। कबड्डी खेलना उन्हें बहुत अच्छा लगता था।
 
बालासाहब का प्रचारक जीवन  
बालासाहब देवरस तो बचपन से ही संघ के स्वयंसेवक रहे, पर उनका प्रचारक जीवन सन 1939 से प्रारंभ हुआ। प्रचारक बनाते ही वे सर्वप्रथम संघकार्य के विस्तार हेतु बंगाल गए। किन्तु सन 1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें नागपुर वापस बुला लिया गया। 1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया।
 
देशभर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे। नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया। नागपुर नगर से प्रचारकों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर पूरे देश में भेजने का श्रेय बाला साहब देवरस को ही जाता है। यही नहीं जिन प्रचारकों को देश के अन्य भागों में भेजा आया उनके घर की भी पूरी चिन्ता करने का काम बालासाहब ने किया। इसके अलावा जो भी प्रचारक 10 या पांच साल बाद प्रचारक जीवन से वापस आया उसकी भी हर प्रकार की नौकरी से लेकर व्यवसाय तक की पूरी चिन्ता उन्होंने की। नागपुर से जो प्रचारकों की खेप पूरे देश में भेजी गई उसमें स्वयं उनके भाई भाऊराव देवरस भी शामिल थे। भाऊराव देवरस को उत्तर प्रदेश भेजा गया था। भाऊराव ने लखनऊ में रहकर संघ कार्य को गति प्रदान की और एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों को संघ से जोड़ा।
 
1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। उस समय केन्द्र की नेहरू सरकार ने तत्कालीन संघ के सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरूजी) सहित तमाम पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को कारावास में डाल दिया। बालासाहब के कुशल नेतृत्व में इस अन्याय के विरूद्ध स्वयंसेवकों ने देशव्यापी सत्याग्रह किया। फलस्वरूप सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबन्ध हटाना पड़ा। सरकार व देश के प्रतिष्ठित महानुभावों से वार्ता की गई। फलस्वरूप संघ के संविधान की रचना हो सकी। संघ शिक्षा वर्गों तथा नागरिकों के कार्यक्रमों में प्रश्नोत्तर कार्यक्रम भी शुरू किया गया। इन सभी प्रक्रियाओं में बालासाहब की मुख्य भूमिका रही थी।
 
आपातकाल और सरसंघचालक रूप में बालासाहब देवरस का कार्य  
बालासाहब देवरस सन 1965 में सरकार्यवाह बनें तथा श्री गुरुजी के देहान्त के पश्चात् सन 1973 में वे सरसंघचालक बनें। इसके पश्चात संघ कार्य को गति देने के उद्देश्य देशभर में प्रवास किया। दो वर्ष के पश्चात ही इन्दिर गांधी की घृणित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में 04 जुलाई, 1975 को संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। संघ पर लगे इस प्रतिबन्ध का उन्होंने बड़े धैर्य से सामना किया। बालासाहब को 21 महीने (पुणे) जेल में बन्दी बनाकर रखा गया। जेल में उनके उदार विचारों तथा व्यवहार ने बन्दी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को संघ के निकट लाया। उन्हीं की प्रेरणा से कांग्रेस व साम्यवादियों को छोड़कर अन्य सभी सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों ने मिलकर आपातकाल के विरूद्ध देशव्यापी जबरदस्त सत्याग्रह किया। परिणामस्वरूप संघ से प्रतिबन्ध हटाया गया और 1977 के चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय हुई। स्वयं इंदिरा गांधी तथा उनके पुत्र संजय गांधी चुनाव में बुरी तरह से पराजित हुए।  
 
सन 1983 में मीनाक्षीपुरम (तमिलनाडु) के हिन्दुओं का इस्लाम पंथ में सामूहिक मतांतरण हुआ। इस घटना ने पूरे देश के हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया। इस चुनौती का सामना करने के लिए बालासाहब देवरस के मार्गदर्शन में देशभर में एकात्मता यात्रा निकाली गई। इस यात्रा के माध्यम से देश में अभूतपूर्व जनजागरण हुआ। 

श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन और बालासाहब
यह सर्वविदित है कि श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन में हिन्दू शक्ति का भव्य रूप प्रगट हुआ। इस आन्दोलन में देश के लगभग सभी सामाजिक और धार्मिक संगठनों से शामिल हुए। आन्दोलनकारियों ने 06 दिसम्बर, 1992 को श्रीराम जन्मभूमि पर विवादित ढ़ांचे का विध्वंस कर दिया। इसके बाद देश और दुनिया में इस आन्दोलन को लेकर तथाकथित सेकुलर दल और मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हाय तौबा मचाई। आज भी राजनीतिक लाभ के लिए तोड़े गए विवादित ढांचे का मातम मनाते दिखाई देते हैं। पर उस समय सरसंघचालक बालासाब देवरस ने बड़ी प्रखरता और तठस्थता के साथ कहा था कि जब श्रीराम जन्मभूमि पर एक विवादित ढांचे को गिराया गया तो दुनियाभर के मुस्लिम लोग हाय तौबा मचा रहे हैं, पर जब हिन्दुओं के अनगिनत मंदिरों और मठों को नष्ट किया गया, वहां की सम्पत्ति लूटी गई तो हिन्दुओं को कितनी पीड़ा हुई होगी? क्या मुस्लिम समाज ने कभी इसपर विचार किया?  
 
उस समय संघ चाहता तो मंदिर का निर्माण भी कर सकता था लेकिन बालासाहब का मानना था कि अगर श्रीराम मन्दिर बना दिया गया तो कहीं लोगों को यह न लगने लगे कि यह मन्दिर संघ या विहिप का है। उनका मानना था कि अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के निर्माण में सभी की भागीदारी होनी चाहिए। उनका मानना था कि देश में रहनेवाला हर व्यक्ति और हर राजनीतिक दल को श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए आगे आना चाहिए।
 
संघ कार्य का विस्तार
सरसंघचालक रहते हुए बालासाहब ने संघकार्य में अनेक नए आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है निर्धन बस्तियों में चलनेवाले सेवाकार्य। इससे वहां चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गई थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। बालासाहब देवरस के ही कार्यकाल में संघ का विस्तार देशभर में तहसील स्तर तक पहुंचा। देशभर में एक ओर जहां शाखाओं का व्यापक स्तर पर विस्तार हुआ वहीं उनके 21 वर्षों के कालखण्ड में अपने सहयोगी संगठनों की शक्ति में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।
 
सन 1988-89 में संघ संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ.हेडगेवार का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस अवसर पर डॉ. हेडगेवार का साहित्य गांव-गांव पहुंचाया गया। इस कालखण्ड में सर्वाधिक प्रचारक संघ कार्य के निमित्त निकले। बालासाहब ने ‘हिन्दू जगे तो विश्व जगेगा’ तथा ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का उद्घोष किया। उन्हीं के कार्यकाल में देशभर में हजारों सेवा कार्य प्रारम्भ हुए।
 
उल्लेखनीय है कि बालासाहब देवरस ने कारंजा (बालाघाट) के अपने पैतृक संपत्ति को बेचकर उससे प्राप्त धनराशि से नागपुर-वर्धा मार्ग पर स्थित खापरी में 20 एकड़ भूमि खरीदी। 1970 में उन्होंने इस 20 एकड़ कृषि भूमि को भारतीय उत्कर्ष मंडल को दान कर दिया। ज्ञातव्य है कि खापरी स्थित इस भूमि पर ग्रामीण बालक-बालिकाओं के लिए भारतीय उत्कर्ष मंदिर (विद्यालय), गोशाला और स्वामी विवेकानन्द मेडिकल मिशन नामक अस्पताल ग्रामवासियों के सेवार्थ कार्यरत है। बालासाहब की प्रेरणा से ही “भारतीय उत्कर्ष ट्रस्ट” की स्थापना की गई।     
त्याग का अनुपम उदाहरण
मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक सरसंघचालक के रूप में उन्होंने दायित्व निभाया। जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तब उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व श्री रज्जू भैया को सौंप कर पद त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं सन 1996 में अपना शरीर छोड़ने के पूर्व ही उन्होंने निर्देश दिया कि उनका दाह संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति सार्वजनिक स्थल पर किया जाए। इसके पीछे उद्देश्य था कि उनकी स्मृति में किसी स्मारक का निर्माण न हो। अपने जीवित रहते हुए ही उन्होंने जो पत्र लिखा था उसमें दो बातें प्रमुख थी। एक कि उनके नाम पर कहीं भी स्मारक का निर्माण न कराया जाए और दूसरा यह कि आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी के अलावा अन्य किसी सरसंघचालक का चित्र नहीं लगाया जाएगा।
 
17 जून, 1996 में बालासाहब इस संसार से विदा हो गए। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार रेशिमबाग की बजाय नागपुर में सामान्य नागरिकों के शमशान घाट में किया गया।