Source: न्यूज़ भारती हिंदी11 Dec 2015 14:21:11

नेशनल हेराल्ड मुकदमे के फैसले पर केवल सोनिया और राहुल गांधी परिवार का ही नहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व निर्भर है। आखिर कांग्रेस आज जो कुछ भी पार्टी के रूप में शेष है उसकी एकता और उम्मीद के ये दोनों ही आधार हैं। इनपर दाग का मतलब पूरी कांग्रेस पार्टी पर दाग। इसलिए पूरी कांग्रेस हर हाल में दोनों को बचाने में लगी है।      

नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के लिए तत्काल राहत की बात इतनी ही है कि उन्हें अब 19 दिसंबर को पेश होना है। संयोग से जिन न्यायाधीश महोदया ने उनको 8 दिसंबर को पेश होने का आदेश दे दिया था उनका तबादला हो गया है। अचानक एक ही दिन में कैसे तबादला हो गया यह भी एक रहस्य ही है। नई न्यायाधीश महोदया ने यह राहत दे दी है। ऐसा नहीं होता तो दोनों को दिल्ली की पटियाला हाउस न्यायालय में पेश होना ही पड़ता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले को खारिज करने की अपील को खारिज कर दिया तो इसके बाद इनके पास कोई विकल्प बचा नहीं है। इसके बाद कांग्रेस का पूरा वकील समुदाय इसी अपील को उच्चतम न्यायालय में ले जाने की तैयारी कर रहा था। हालांकि अब उनको समय मिल गया है, इसलिए वे अपील कभी भी उच्चतम न्यायालय ले जा सकते हैं। यह देखना होगा कि उच्चतम न्यायालय भी उच्च न्यायालय के फैसले को बनाए रखता है या नहीं। उच्च न्यायालय के फैसले को गहराई से देखें तो इस मामले से बचने का कोई संभावना सोनिया गांधी, राहुल गांधी एवं उनके अन्य चार साथियों के पास नहीं है। यह हो सकता है कि न्यायालय इन्हें स्वयं न उपस्थित होने की छूट दे दे। किंतु न्यायालय में जाने से छूट मिल जाने का मतलब मामले का अंत नहीं है। याचिकाकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी के स्वभाव को समझने वाले जानते हैं कि वो किसी सूरत में पीछे नहीं हटेंगे। इस मामले का महत्व इस मायने में है कि सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामले में पहली बार स्वयं न्यायालय में मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है।

इस मुकदमे के फैसले पर केवल इन दोनों नेताओं का नहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व निर्भर है। आखिर कांग्रेस आज जो कुछ भी पार्टी के रूप में शेष है उसकी एकता और उम्मीद के आधार ये ही दोनों तो हैं। उस परिवार पर दाग का मतलब पूरी कांग्रेस पार्टी पर दाग। इसलिए पूरी कांग्रेस हर हाल में दोनों को बचाने में लगी है तो यह स्वाभाविक है। इस मामले के चार पहलू हैं। पहला है इसकी कानूनी स्थिति। दूसरा है, सोनिया गांधी और राहुल गांधी परिवार की इसमें कथित संलग्नता का व्यापक अर्थ। तीसरा, इस मामले के प्रति उनका व्यवहार। और इसी से जुड़ा चौथा है राजनीतिक पहलू। कानूनी पहलू का फैसला तो न्यायालय करेगी और उस पर बहुत ज्यादा टिप्पणी उचित नहीं। पहली नजर में देखने से यह तो लगता है कि नेशनल हेराल्ड का स्वामित्व अपने हाथों लेने के लिए व्यवस्था और नियमों का लाभ उठाया गया। 2008 में अखबार का मालिकाना हक एसोसिएटेड जर्नल्स और टीएजेल के पास था। इस कंपनी पर 90 करोड़ का कर्ज कांग्रेस का बन गया था। कांग्रेस पार्टी ने 26 फरवरी 2011 को टीएजेएल; द असोसिएट्स जर्नल्स लिमिटेड की 90 करोड़ रुपए की देनदारियों को अपने जिम्मे ले लिया। इसके बाद 5 लाख रूपए से एक नई कंपनी यंग इंडियन बनाई गई। इस कंपनी में सोनिया और राहुल की 38-38 प्रतिशत हिस्सेदारी है। बाकी 24 प्रतिशत हिस्सेदारी कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस के पास है। इसके बाद टीएजेएल के 10-10 रूपए के 9 करोड़ शेयर यंग इंडियन कंपनी को दे दिए गए। 9 करोड़ शेयर के साथ यंग इंडियन को टीएजेएल के 99 प्रतिशत हिस्सेदारी मिल गई। इसके बदले यंग इंडियन को कांग्रेस का कर्ज चुकाना था। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने टीजेएल का 90 करोड़ का कर्ज माफ कर दिया। ऐसा करने से यंग इंडियन कंपनी को मुफ्त में ही टीएजेएल यानी नेशनल हेराल्ड का स्वामित्व मिल गया।

इसके बाद आप स्वयं निष्कर्ष निकालिए कि यह कितना ईमानदार, पारदर्शी और नैतिक कवायद है। वैसे तो स्वामी ने इसमें हवाला एवं कर चोरी का भी मामला दर्ज किया है। इससे प्रवर्तन निदेशालय एवं आयकर विभाग भी इसकी जांच कर रहा है। इसके भी परिणाम हमारे सामने आएंगे। लेकिन यहां यह पहलू उतना महत्वपूर्ण नहीं है। वास्तव में इसमें कानून का पालन किया गया नहीं किया इस विषय को छोड़ दीजिए, लेकिन यह पूरी कवायद किसी तरह नेशनल हेराल्ड की संपत्ति को अपने हाथों लेने के लिए किया गया इसमें तो दो राय नहीं हो सकती है। यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि अभी तक उस परिवार की छवि यह बनाई गई है कि वह निःस्वार्थ भाव से केवल देश की सेवा करता है। उस परिवार में किसी ने निजी संपत्ति बनाने की आज तक सोचा ही नहीं। इस मामले से यह छवि ध्वस्त हो रही है। जरा इसको विस्तारित करिए। सबसे पहले रॉबर्ट बाड्रा पर जमीन व्यापार में धोखाधड़ी का मामला सामने आया। यहां भी वाड्रा ने कानूनी रूप से गलत किया या नहीं यह पहलू अपनी जगह है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उसने भी दूसरे प्रोपर्टी कारोबारियों की तरह व्यवस्था का लाभ उठाकर अकूत संपत्ति बनाया। उसने स्वयं कहा कि मेरी तरह अनेक लोगों ने संपत्ति कमाई, लेकिन मेरे पीछे ही सरकार पड़ी है और मुझे बदनाम किया जा रहा है। उसके बाद हाल ही में राहुल गांधी द्वारा लंदन में एक कंपनी बनाए जाने का मामला सामने आ गया। वह कंपनी कोई समाजसेवा के लिए तो बनी नहीं थी। व्यवसाय और कमाई के लिए ही बनी थी। और नेशनल हेराल्ड का मामला तीसरा है।

वास्तव में इससे उस परिवार की छवि पर जो असर पड़ेगा उसके राजनीतिक परिणाम ज्यादा गहरे होंगे। अगर कांग्रेस विरोधी पार्टियों ने इसे मुद्दा बनाया तो इसका अर्थ आम जनता यही लगाएगी कि यह परिवार भी अन्यों की तरह संपत्ति बनाने या संपत्ति पर कब्जा करने के लिए हथकण्डे अपनाता है। इससे सोनिया गांधी, राहुल गांधी और परिवार की त्यागी और निःस्वार्थ देश सेवा की छवि को जितना बड़ा आघात लगेगा और इसका कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य पर जो असर होगा वह पार्टी के नेताओं के लिए यह बड़ी चिंता है। सोनिया और राहुल यदि नेशनल हेराल्ड अखबार, उसके साथ नवजीवन एवं कौमी आवाज को फिर से आरंभ करने की कोशिश करते तो उसे इस रूप में नहीं देखा जाता। लेकिन यहां तो जो सूचना है करीब 60 लाख रूपया किराया वसूला जा रहा है। यह किराया किसके पास जा रहा होगा? यंग इंडिया कंपनी के पास, जिसका 76 प्रतिशत शेयर सोनिया एवं राहुल के पास है एवं शेष मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस के पास जो कि केवल दिखाने के लिए हैं। यह इस मायने में दुखद है कि इस अखबार को जवाहरलाल नेहरु ने आरंभ किया। स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी प्रमुख भूमिका थी। आजादी के बाद भी यह कुछ समय तक लोगों का प्रिय अखबार रहा। लेकिन बाद में इसका कांग्रेसीकरण कर दिए जाने से लोगों की रुचि घट गई एवं यह धीरे-धीरे मर गया या इसे मार दिया गया। तो परिवार के एक महापुरुष ने अखबार आरंभ किया और उन्हीं के वंशजों ने इसका नाश कर दिया। संपत्ति बनाई सो अलग।

सोनिया एवं राहुल को यदि न्यायालय ने सम्मन भेजा जो उन्हें उपस्थित होने में क्या समस्या है? क्या न्यायालय के सम्मन का सम्मान कर उपस्थित होने से इनका कद घट जाता? अगर न्यायालय का सम्मान ये करते है तो इन्हें पूरी ताकत पेशी से छूट लेने के लिए लगाने की बजाय उपस्थित होकर उदाहरण पेश करना चाहिए था। न्यायालय में उपस्थित होने से कोई अपराधी साबित नहीं हो जाता। बहरहाल, अब न्यायालय को विचार करना है कि इसके स्वामित्व का हस्तांरण इनको हो सकता है या नहीं? गहराई से देखा जाए तो इसमें 1987 के बोफोर्स दलाली प्रकरण का चरित्र है। बोफोर्स में समस्या थी कि उसके सारे सबूत विदेश में थे, धन भी विदेशी बैंकों में जमा हुए थे, सबसे ज्यादा लाभ पाने वाला ओतावियो क्वात्रोच्चि विदेश भाग चुका था, इसलिए उसकी कानूनी परिणति वैसी नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। इस मामले में सबूत देश के अंदर है, आरोपी भी और लेनदेन का पूरा खाता भी। इसलिए इसमें जांच करने तथा इसे तार्किक कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचाने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। इसकी जांच में सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। आशंका यह है कि सरकार इस भय से कि सोनिया राहुल पर कार्रवाई से उनके प्रति कहीं सहानुभूति पैदा न हो जाए जांच धीमी करा सकती है या फिर ममाले को टालते रहने की भूमिका अपना सकती है। इसकी पूरी संभावना है। आखिर एक समय प्रवर्तन निदेशालय ने इस फाइल को बंद करने का निर्णय ले ही लिया था। जब इस पर हंगामा हुआ तो फिर से उसकी जांच आरंभ हुई। हालांकि सुब्रह्मण्यम स्वामी का एक चरित्र ऐसे मामलों पर डटे रहने का है। तो वे न्यायालय में डटे रहेंगे।