Source: न्यूज़ भारती हिंदी18 Dec 2015 16:33:05

लोग इस बात को लेकर हैरत में हैं कि क्या वही अरविंद केजरीवाल हैं- जो अन्ना हजारे अथवा सिविल सोसइटी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रमुख सिपहसालार थे। जो कहा करते थे कि सी.बी.आई. एवं दूसरी जांच एजेंसियों को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए और यदि इन पर किसी का नियंत्रण हो तो वह प्रस्तावित लोकपाल या लोकायुक्त का होना चाहिए। 15 दिसम्बर को सी.बी.आई. ने केजरीवाल के प्रधान सचिव के आवास पर तथा अन्य कई जगहों पर छापा क्या मारा? केजरीवाल समेत उनकी पूरी ‘आप’ पार्टी ने जैसे भूचाल ला दिया हो। हद तो यह हुई कि केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर इस अवसर पर जिस गाली-गलौज के स्तर की भाषा का इस्तेमाल किया, उसे सर्वथा निन्दनीय ही कहा जा सकता है।

ऐसा तो कुछ था नहीं कि सी.बी.आई. ने बिना किसी वजह के दिल्ली के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के कार्यालय में छापा मारा हो। वस्तुतः राजेन्द्र कुमार पर यह आरोप है कि वह कई सालों से कुछ पूर्व अफसरों की कंपनी को कांट्रेक्ट के जरिए नाजायज लाभ पहुंचा रहे थे। इसके खिलाफ एंटी करप्शन ब्युरो ने केस दर्ज किया था। सीनियर ब्युरोक्रेट आशीष जोशी ने राजेन्द्र कुमार की शिकायत 12 जून को एसीबी से की थी। जब एसीबी ने कार्यवाही नहीं की तो 13 जुलाई को सी.बी.आई. से शिकायत की गई। जिस पर सी.बी.आई. ने एक एफ.आई.आर. दर्ज कर छापेमारी की। पर केजरीवाल और उनके सहयोगियों का कहना है कि चूंकि राजेन्द्र कुमार मुख्यमंत्री के दफ्तर में बैठते हैं, इसलिए सी.बी.आई. की यह छापामारी मुख्यमंत्री के दफ्तर पर है। इतना ही नहीं केजरीवाल ने तो यहां तक आरोप लगा दिया कि वस्तुतः भारत सरकार के वित्त मंत्री दिल्ली क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष होने के चलते घोटाले में फंसे हैं और उसी से संबंधित फाईल की खोज में सी.बी.आई. ने यह छापेमारी की है।

आश्चर्य का विषय यह है कि राजेन्द्र कुमार के विरुद्ध करप्शन का प्रकरण दर्ज है, उनके विरुद्ध सी.बी.आई. जांच कर रही है, यह केजरीवाल को अच्छी तरह से पता था। इतना ही नहीं इण्डिया अंगेस्ट करप्शन के कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि राजेन्द्र कुमार के भ्रष्ट कारनामों की शिकायत उन्होंने केजरीवाल को भी भेजी थी। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि केजरीवाल इस संबंध में सारे तथ्यों से परिचित होने के बावजूद राजेन्द्र कुमार के विरुद्ध जांच की पहल क्यों नहीं की? सबसे बड़ी बात यह कि जैसा कि अन्ना हजारे ने कहा कि केजरीवाल ने राजेन्द्र कुमार के बैकग्राउंड की जांच क्यों नहीं की? पर हकीकत कुछ और ही है। वस्तुतः अन्ना आन्दोलन के दौरान पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी की दुहाई देनेवाले केजरीवाल को जब दिल्ली के मुख्यमंत्री की हैसियत से इन्हें कार्यरूप देने का अवसर मिला, तब तक वह दूसरे केजरीवाल हो चुके थे। हकीकत यह थी कि राजेन्द्र कुमार के बैकग्राउंड को जानते हुए भी कि वह भ्रष्टाचार के आरोपी हैं, केजरीवाल ने उन्हें अपना प्रधान सचिव बनाया। इसके मायने स्पष्ट हैं कि केजरीवाल के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता पाने का एक माध्यम था। सच्चाई यह भी है कि अपने मुख्यमंत्री के पहले कार्यकाल में भी केजरीवाल ने कई विवादित और भ्रष्ट मंत्रियों व विधायकों का बचाव किया।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आंख मूंदकर ऐसे लोगों को टिकट दिए, जिसका नतीजा कुछ मंत्रियों और विधायकों की गिरफ्तारी तक में देखने को आया। केजरीवाल का कहना है कि राजेन्द्र कुमार के विरुद्ध छापेमारी में उनसे पूछा क्यों नहीं गया? पहली चीज तो ऐसा कोई नियम या प्रथा है नहीं, दूसरी बड़ी बात क्या वह यही केजरीवाल हैं जो अन्ना आन्दोलन के दौरान यह कहा करते थे कि सी.बी.आई. को कार्यवाही के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए। केजरीवाल से यह पूछा जा सकता है यह यू-टर्न क्यों? क्या इसका मतलब यह कि दूसरों के लिए अलग मापदण्ड और अपने लिए अलग मापदण्ड! केजरीवाल की बौखलाहट यह बताती है कि इस घटना के चलते कहीं-न-कहीं उनकी असलियत सामने आ गई है और वास्तविकता यही है कि मनोरोगी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि केजरीवाल हैं जो एक आरोपी अधिकारी को अपना प्रधान सचिव तो बना ही रहे हैं, उसके पक्ष में इस हद तक अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। 

केजरीवाल की कथनी और करनी का अंतर उनके प्रस्तावित जन लोकपाल में भी देखा जा सकता है। 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के दौरान वह यह कहते नहीं थकते थे कि जन लोकपाल को हटाने का अधिकार सिर्फ जांच के उपरान्त सर्वोच्च न्यायालय को ही होना चाहिए। पर वह दिल्ली में ऐसा जन लोकपाल लाते हैं जिसे हटाने का अधिकार भले ही दो-तिहाई बहुमत से हो, विधानसभा को होगा, यानी कि प्रकरांतर से उन्हें ही यह अधिकार होगा। जन लोकपाल के गठन में स्पीकर को शामिल कर क्या वह सरकार की भूमिका को निर्णायक नहीं कर रहे हैं? अब भले वह कहें कि अन्ना हजारे के कहने से हाईकोर्ट के एक जज और एक प्रमुख नागरिक को इस कमेटी में शामिल किया जाएगा। पर जज और प्रमुख नागरिक कौन होगा, इसका फैसला कौन करेगा? यह स्पष्ट नहीं है! स्पष्ट है केजरीवाल यह अधिकार अपने पास ही रखना चाहते हैं। जांच एजेन्सियों की मदद लोकपाल ले सकता है, पर वह लोकपाल के प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं रहेगी। जबकि अन्ना आन्दोलन की यह प्रमुख मांग थी कि सी.बी.आई. एवं दूसरी जांच एजेन्सियों को लोकपाल एवं लोकायुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण में होना चाहिए।

अब इस लोकपाल के गठन में न तो कोई पारदर्शिता बरती गई और न जनता से ही कोई राय ली गई, जबकि अन्ना आन्दोलन का प्राण-तत्व ही पारदर्शिता और जन भागीदारी थी। इतना ही नहीं उनका लोकपाल सांसदों, केन्द्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार की भी जांच कर सकेगा, ऐसा हो भी क्यों न? आखिर में वह जन लोकपाल ला रहे हैं जो केन्द्र के लिए प्रस्तावित है, भले ही वह केन्द्र शासित राज्य दिल्ली के मुख्यमंत्री हों। ऐसी स्थिति में जानकार लोगों का कहना है कि केजरीवाल जन लोकपाल लाने के लिए कतई गंभीर नहीं हैं, क्योंकि न्यायालय में चुनौती देने पर वह अवैध घोषित हो जाएगा। कुल मिलाकर देश की जनता यह समझ सकती है कि अरविंद केजरीवाल बतौर एक ऐसा राजनीतिज्ञ परिदृश्य पर आ गया है, जिसकी कथनी और करनी में नब्बे डिग्री का फासला है। कुछ भी हो, पर इससे भारतीय राजनीतिज्ञों की शाख जो पहले ही निम्नतम बिन्दु पर थी, उसे केजरीवाली जैसे वोट के सौदागर और सत्ताकांक्षी रसातल में ले जा रहे हैं।