Source: न्यूज़ भारती हिंदी31 Dec 2015 15:56:27

एक वर्ष की विदाई और दूसरे वर्ष के आविर्भाव में क्षण का अंतर होता है। यही स्थिति यह साबित करता है कि किसी नए वर्ष के आगमन से पुराने वर्ष की चुनौतियों, समस्याओं, उपलब्धियों, सफलताओं, विफलताओं पर पूर्ण विराम नहीं लगता। वास्तव में वे ही नए वर्ष के आधार बनते हैं और उनका क्रम ही आगे बढ़ता है। यह समय ऐसा है जिसमें कोई देश अकेले समुद्र के द्वीप की तरह अपनी नियति निर्धारित भी नहीं कर सकता। विश्व के सभी देशों का जुड़ाव इस कदर सधन हुआ है कि एक छोर की घटना दूसरे छोर को प्रभावित करती है। इन दो कसौटियों पर पर हम ईसा संवत 2016 के परिदृश्य का आकलन करें तो भारत एवं विश्व दोनों के संदर्भ में आशा-निराशा, शीत-वसंत की मिश्रित तस्वीर उभरती है। अगर चुनौतियों की दृष्टि से देखें तो 2016 के लिए कई मायनों में सकारात्मक परिवर्तन नजर आता है, पर दूसरी ओर चुनौतियों और समस्याओं की ओर नजर जाते ही ये परिवर्तन कहीं-कहीं कमजोर भी नजर आने लगते हैं।

वर्ष के अंत में पेरिस में दुनिया को बचाने यानी ग्लोबल वार्मिंग कम करने के लिए आयोजित सम्मेलन की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि विश्व के अंदर अपनी पृथ्वी और आसपास के माहौल को मनुष्य सहित सभी जीवों एवं वनस्पतियों के अस्तित्व को बचाने के प्रति प्रतिबद्धता कायम हुई है। एक संकल्प विश्व भर के देशों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सामान्य पर लाने का किया है और सबने अपनी-अपनी जिम्मेवारियां घोषित की हैं। विकासशील, गरीब और सपंन्न देशों के बीच कायम मतभेदों को देखते हुए इस तरह के सहयोग और सहकार के ठोस निर्णयों के साथ सम्मेलन के अंत की उम्मीद नहीं थी। तो 2016 ने ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के साझे संकल्प के साथ शुरुआत की है और इस स्थिति को सकारात्मक परिणति मानना ही होगा। भारत के लिए गर्व का विषय यह है कि इसमें भारत ने जो कुछ कहा उसे स्वीकार किया गया और एक प्रकार से इसके एक दिशा निर्धारक देश के रूप में भारत उभरा। उम्मीद की दूसरी घटना संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव द्वारा विशेष रूप से आयोजित सतत विकास सम्मेलन था जिसमें दुनियाभर के देशों ने मिलकर कुछ नीतियां बनाईं। 2030 तक के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने सतत विकास के 17 लक्ष्य तथा उस तक पहुंचने के लिए 169 उप लक्ष्य तय किए गए हैं। ये 17 लक्ष्य बिल्कुल विश्व की समस्याओं और उनके निदान के लिए आवश्यक हैं। इनमें गरीबी उन्मूलन, भुखमरी का अंत, सुन्दर स्वास्थ्य एवं खुशहाल जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, साफ जल एवं स्वच्छता, वहन करने योग्य एवं स्वच्छ ऊर्जा, शालीन कार्य एवं आर्थिक विकास, उद्योग अन्वेषण एवं आधारभूत संरचना, असमानता में कमी, संपुष्ट शहर और कम्युनिटी, उत्तरदायित्वपूर्ण उपभोग एवं उत्पादन, जलवायु पर कार्य, पानी में जीवन, धरती पर जीवन, शांति एवं न्याय वाली मजबूत संस्थाएं और लक्ष्यों के लिए साझेदारी आदि इसमें शामिल हैं।

तो एक साथ सबके विकास तथा पृथ्वी को बचाने का संकल्प व्यक्त करना 2016 में दुनिया के अंदर हर दृष्टि से आशा और उम्मीद पैदा करता है। यह समूचे शीत के बीच वसंत का द्योतक है। लेकिन दूसरी ओर इस समय दुनिया के लिए ग्लोबल वार्मिंग और आर्थिक विषमता या गरीबी के बाद जो तीसरा सबसे बड़ा संकट आतंकवाद का है उसकी भयावहता बनी हुई है और इसे लेकर देशों के बीच मतभेद भयभीत करने वाली है। आईएसआईएस की क्रूरता की कथाएं हालांकि 2015 के अंतिम तीन महीनों में कम आईं हैं और यह उस पर रूस द्वारा तथा उसके बाद पेरिस हमले के बाद फ्रांस द्वारा जारी ताबड़तोड़ आक्रमण के कारण हो सकता है। इन दो देशों ने जल और आकाश दोनों जगहों से आईएस पर ऐसे हमले किए हैं जिनकी कल्पना नहीं थी। हालांकि अमेरिका के साथ रूस की इस पर तनातनी भी है। अमेरिका कह रहा है कि रूस आतंकवादियों पर हमले की आड़ में वहां राजनीतिक परिवर्तन के लिए लड़ रहे विद्रोहियों को भी मार रहा है। रूस इसे स्वीकार करता है और कहता है कि हां, उसके लिए दोनों आतंकवादी हैं। यह मतभेद आईएस के समूल नाश की बाधा तो बन ही रहा है इससे भविष्य में तनाव के विस्तारित होने का भी खतरा है। आखिर तुर्की ने रुस के एक लड़ाकू विमान को उड़ाकर इसका संकेत दे ही दिया जिसके संदर्भ में रूस की यह धमकी कायम है कि उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। इसमें भारत ने सुझाव दिया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस आतंकवाद विरोधी हमले का प्रस्ताव पारित हो तो वह भी शामिल हो सकता है। हालाकि 2016 के आरंभ में इसकी संभावना नहीं है और रूस अमेरिका के मतभेद को देखते हुए इसमें बाधाएं भी हैं, पर आईएस पर हमला जारी रहनेवाला है। 2016 में वह कितना कमजोर होगा, खत्म होगा या नहीं यह कहना कठिन है।

अब आइए विश्व की अर्थव्यवस्था की ओर। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टीन लगार्ड ने कहा है कि साल 2016 में वैश्विक आर्थिक विकास निराश कर सकता है। उनके अनुसार अमेरिका में ब्याज दरों में हुई बढ़ोतरी एवं चीन की आर्थिक सुस्ती वैश्विक विकास के लिए जोखिमपूर्ण है। वास्तव में 2016 के लिए लेगार्ड की यह भविष्यवाणी तथ्यों पर आधारित हैं। विश्व व्यापार की गति लगातार धीमी बनी हुई है। कच्चे माल की कीमतों में गिरावट उन देशों की अर्थव्यवस्था के लिए परेशानियां खड़ी कर रहीं हैं जो इन्हीं पर आधारित हैं। कई देशों का प्रदर्शन वित्तीय क्षेत्र में कमजोर रहा है जिससे उभरते बाजार वाले देशों के लिए वित्तीय जोखिम बढ़ रहा है। जाहिर है, वर्ष 2016 में विश्व आर्थिक विकास के पैमाने पर निराशा की ही तस्वीर पेश करेगा। सुश्री लेगार्ड के अनुसार निम्न उत्पादकता, बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और वैश्विक वित्तीय संकट के प्रभाव से दुनिया की आर्थिक विकास की गति धीमी हो रही है। वर्ष 2015 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने करीब एक दशक में पहली बार ब्याज दरों में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी ही है और आगे इसमें क्रमिक वृद्धि करने का संकेत दिया है। अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी उभरते बाजारवाली अर्थव्यवस्था एवं विकासशील देशों सहित अन्य के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा। विकसित देश तो ब्याज दरों में वृद्धि के जोखिम से निपटने के लिए तैयार हैं लेकिन चिंताजनक स्थिति उन देशों के लिए है जो इस जोखिम को झेलने में सक्षम नहीं हैं। मुद्राकोष ने चेतावनी दी है कि ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी और डॉलर के महंगा होने से कई कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर पहुंच सकती हैं।

यानी कुल मिलाकर 2016 में दुनिया की आर्थिक दशा चिंताजनक रहनेवाली है। इसके असर से भारत भी अछूता नहीं रह सकता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा भी है कि विश्व अर्थव्यवस्था की सुस्ती एक बड़ी चुनौती हमारे लिए रहेगा। किंतु यहां उम्मीद की किरण भारतीय अर्थव्यवस्था का 2015 का प्रदर्शन है। 2015 में समूची दुनिया की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही थी, भारत का विकास दर गति पकड़े हुए था। नरेन्द्र मोदी सरकार को विरासत में 5 प्रतिशत विकास दर मिली थी, लेकिन इसने अर्थव्यवस्था को 7.5 प्रतिशत की गति देकर इसे विश्व की सबसे तेज गति वाली अर्थव्यवस्था बना दिया है। जरा याद करिए 2015 में यूरोप में फिर ग्रीस संकट उभरा, अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी रही, ब्रिटेन, फ्रांस व र्जमनी विकास के लिए संघर्ष करते नजर आए, जापानी अर्थव्यवस्था नए निवेश के लिए जूझती रही, चीनी अर्थव्यवस्था का बुलबुला फटा और उसे अपने गिरते निर्यात को थामने के लिए अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन करना पड़ा। इसमें यदि भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.5 प्रतिशत की गति को बनाए रखा तो 2016 में यह नीचे आ जाएगी इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। दुनिया में विदेशी निवेश में 16 प्रतिशत की कमी आई वहीं भारत में यह करीब 40 प्रतिशत बढ़ा है। विश्व की रेटिंग एजेंसियों-मूडीज, फिच, एसएंडपी और नोमुरा ने 2016 के लिए भारत की रेटिंग को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विदेश दौरों या आनेवाले विदेशी नेताओं से आर्थिक-व्यापारिक समझौतों के परिणाम 2016 में आने आरंभ हो जाएंगे और इससे भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर हो सकती है।   

इस प्रकार अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुनिया के विपरीत भारत के लिए संकेत उम्मीदोंवाले हैं। अगर इस वर्ष की सुस्ती में भारत दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाला देश बना रहा तो फिर निवेशकों के लिए यह लंबी अवधि के निवेश का स्थल बन सकता है। मेक इन इंडिया को ताकत मिल सकती है। मोदी सरकार के लिए इस मायने में 2016 कमर कसकर अर्थव्यवस्था को संभाले रखने की चुनौती वाला वर्ष है। समस्या हमारी राजनीति में है। देशहित एवं विकास के मुद्दे पर भी जहां राजनीति होने लगे वहां समस्याएं तो आएंगी। संसद के अंदर राजनीतिक दलों के रवैये से विधायी कार्य नहीं हो पा रहे हैं और इनसे अर्थव्यवस्था जिस गति से दौड़नी चाहिए नहीं दौड़ पा रही है। जीएसटी अगर पारित हो जाता तो 2016 में एक दूसरी तस्वीर उभरती। उम्मीद करनी चाहिए कि 2016 में राजनीतिक दलों को सुबुद्धि आएगी और वे कम से कम विकास तथा अन्य राष्ट्रीय हित के मुद्दों को अपनी संकीर्ण राजनीति का शिकार नहीं होने देंगे।