Source: न्यूज़ भारती हिंदी08 Dec 2015 16:21:59

ऐसी खबरे हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पुनः दिल्ली के लिए जनलोकपाल लाने जा रहे हैं। पुनः से आशय यह कि जब वर्ष 2014 में केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, तब भी उन्होंने कुछ ऐसा दिखाने का प्रयास किया था, कि वह दिल्ली के लिए जनलोकपाल लाना चाहते हैं। अब कोई कह सकता है कि ये कैसे कहा जा सकता है कि वह इस मामले में सचमुच गंभीर न होकर दिखावे का प्रयास कर रहे थे। ऐसा कहने का ठोस आधार इसलिए है कि पहली प्रमुख बात तो यह कि अन्ना आंदोलन के दौरान जन लोकपाल की मांग केन्द्र के लिए थी, राज्यों के लिए उसी तर्ज पर लोकायुक्त व्यवस्था की मांग थी।   

हकीकत भी यही है कि लोकपाल का प्रावधान केन्द्र के लिए और राज्यों के लिए लोकायुक्त संगठन का प्रावधान है। परंतु ऐसा लगता है कि केजरीवाल केन्द्र शासित दिल्ली के मुख्यमंत्री न होकर जैसे वहां के प्रधानमंत्री हों और दिल्ली एक संप्रभु राज्य हो। इसका एक उदाहरण इससे भी समझा जा सकता है कि उनके जनलोकपाल के प्रावधान के अंतर्गत दिल्ली पुलिस भी है, जो फिलहाल केन्द्र सरकार के अंतर्गत है। नियमानुसार ऐसा कोई प्रस्ताव सर्वप्रथम उपराज्यपाल के पास स्वीकृत हेतु भेजा जाएगा, इसके पश्चात उपराज्यपाल उसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजेंगे। उसके पश्चात ही उसे विधानसभा में पास करने के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। पर ऐसा लगता है कि केजरीवाल के लिए संविधान या कानून का कोई महत्व तो दूर, मायने तक नहीं है। पिछली बार भी उनकी जिद थी कि वह इससे संबंधित बिल को उपराज्यपाल के पास न भेजकर सीधे रामलीला मैदान में जनता के सामने प्रस्तुत करेंगे। गनीमत है कि वह इस बार उक्त बिल को विधानसभा में प्रस्तुत करने की बात कर रहे हैं।

यह बताने की जरूरत नहीं कि वर्ष 2011 में जनलोकपाल के लिए हुए अन्ना आंदोलन के दौरान केजरीवाल उसके प्रमुख सिपहसलार थे। वह इस बात को पूरी ताकत से रख रहे थे कि  उच्चस्तरीय और सरकार में बैठे लोगों के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक सशक्त और निष्पक्ष लोकपाल का गठन अत्यंत आवश्यक है। लेकिन अब दिल्ली राज्य के लिए ही सही वह जिस ढंग का लोकपाल लाने की बात कर रहे हैं वह उनके पूर्व सहयोगी प्रशांत भूषण के शब्दों में वह लोकपाल की जगह सिर्फ जोकपाल ही नहीं, बल्कि महाजोकपाल होगा। पहली चीज तो यह कि जिस तीन सदस्यीय लोकपाल का गठन होगा, उसमें मुख्यमंत्री, दिल्ली के चीफ जस्टिस, विधानसभा में विपक्ष के नेता और विधानसभा के अध्यक्ष उस समिति के सदस्य होंगे। अब बड़ा सवाल यह कि विधानसभा का अध्यक्ष लोकपाल गठन कमेटी में क्यों? यह सभी को पता है कि वर्तमान समय मे जो विधानसभा के अध्यक्ष होते हैं, वह मुख्यमंत्री की कृपा पर निर्भर रहते हैं।

कहने का आशय यह कि इस तरह से केजरीवाल यह चाहते हैं कि लोकपाल गठन में उनकी भूमिका निर्णायक हो और लोकपाल उनकी पसंद का बन सके। इसी तरह से वह चाहते हैं कि लोकपाल को पद से हटाने के लिए विधानसभा के दो तिहाई सदस्य प्रस्ताव पारित कर दें। अब यह सभी को पता है कि दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल का दो-तिहाई नहीं बल्कि पूरा एकाधिकार है? तो क्या इस तरह जो लोकपाल बनाया जाएगा वह पूरी तरह उनकी दया पर अबलंबित रहेगा। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान एक प्रमुख मांग यह भी थी कि जांच एजेंसियां लोकपाल के अंतर्गत होनी चाहिए। लेकिन केजरीवाल दिल्ली में जिस लोकपाल का प्रावधान करने जा रहे हैं उसमें सतर्कता शाखा लोकपाल के अंतर्गत नहीं होगी। भला इस तरह से निष्पक्ष और ताकतवर लोकपाल कैसे बन सकता है? जबकि अन्ना आंदोलन के दौरान यही केजरीवाल यह कहते नहीं थकते थे कि लोकपाल के विरूद्ध शिकायत आने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच कर दोषी पाए जाने पर ही उसे हटाए जाने का प्रावधान होना चाहिए। पर अब वह प्रकारांतर से लोकपाल को हटाने का अधिकार स्वतः अपने हॉथों में रखना चाहते हैं। अभी कुछ महीनों पूर्व उन्होंने स्वतः लोकपाल का नाम प्रस्तावित कर चीफ जस्टिस के पास भेज दिया था और उनके इस रवैए पर चीफ जस्टिस ने उन्हें नसीहत भी दी थी। 

लोकपाल या लोकायुक्त का मुद्दा तो अपनी जगह पर है, दूसरे मामलों में भी केजरीवाल का रवैया हैरतंगेज करनेवाला है। दिल्ली का बजट पारित करते वक्त वह मीडिया के लिए इतना ज्यादा बजट रखते हैं जैसे वह उसके खरीद-फरोख्त का इंतजाम कर रहे हों। दिल्ली के विधायकों का वेतन अस्सी हजार मासिक से दो लाख दस हजार रूपये मासिक करने जा रहे हैं जो कि लोकसभा के सदस्यों का भी नहीं है। इन सबके निहितार्थ तो यही निकलते हैं कि चाहे मीडिया हो या विधायक केजरीवाल सबको खुश कर अपने एकाधिकारवादी एजेंडे़ को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

अब 20 नवम्बर को नीतीश कुमार के सरकार के शपथ समारोह के दौरान लालू से गले लगने वह भले यह सफाई दें कि लालू ने उनके साथ जबरदस्ती की। लेकिन क्या केजरीवाल के पास इस बात का जवाब है कि जब नीतीश और लालू एकाकार हैं तो वह उनसे अलग-अलग व्यवहार करने की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं? और भी कई अवसरों पर केजरीवाल जिस ढंग से अपने मंत्रियों और विधायकों के भ्रष्ट एवं स्वेच्छाचारिता कृत्यों का बचाव किया है उससे उनका असली चेहरा सामने आ गया है। लोग केजरीवाल की कथनी और करनी मे इतना मूलभूत अंतर देखकर जिसे कलाबाजी का स्तर ही कहा जा सकता है-दंग हैं। अब जैसा कि जानकार लोगों का कहना है कि केजरीवाल की ऐसी विधि-विरोधी रवैए के चलते कोई लोकपाल या लोकायुक्त बनने से रहा। अलबत्ता केजरीवाल इसके नाम पर नौटंकी जरुर कर रहे हैं। उनका रवैया देखकर बहुत पहले का एक फिल्मी गाने की यह लाइन याद आती है- “चक्कर खा गए हम तेरे भैया.....।”