Source: न्यूज़ भारती हिंदी20 Aug 2015 17:49:31

देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया, उसने जैसे सोये हुए समाज को झकझोर कर जगा दिया है। अब देश के धनी मानी नौकरशाह, नेतागण और सामान्य कहे जानेवाले आम नागरिकों को प्राथमिक शिक्षा एक समान दिया जाना व्यावहारिक है अथवा नहीं, इसे लेकर देश में व्यापक बहस प्रारम्भ हो गई है।

- हरिहर शर्मा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गत 18 अगस्त को एक बड़ा फ़ैसला सुनाते उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वे सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़वाना अनिवार्य किया जाए। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी व्यवस्था की जाए कि अगले शिक्षा-सत्र से इसका अनुपालन सुनिश्चित हो सके। उल्लेखनीय है कि सरकरी अफसर और नेता अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिल करते हैं। इसका मुख्य कारण निजी स्कूलों में शिक्षा व विद्यार्थियों से जुडी हर व्यवस्था का बेहतर होना है, वहीं सरकारी स्कूलों की हालत और शिक्षा में बहुत सारी कमियां दिखाई देती हैं। सरकारी अफसर या विभागीय नेता सरकारी विद्यालयों की स्थितियों की अनदेखी कर उसे उसी हाल पर छोड़ देते हैं। यदि सरकारी विद्यालयों में सरकारी अफसर व नेताओं के बच्चे पढ़ने जाएं तो वहां की व्यवस्था में निश्चित ही सुधार होगा। यही कारण है कि न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शिवकुमार पाठक की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस सम्बन्ध में बड़ा फैसला लिया।

याचिका में कहा गया कि सरकारी परिषदीय स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है जिसके चलते अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है। इसके चलते बच्चों को स्तरीय शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसकी चिंता न तो सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को है और न ही प्रदेश के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को है। इसपर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सरकारी कर्मचारी, निर्वाचित जनप्रतिनिधि, न्यायपालिका के सदस्य एवं वे सभी अन्य लोग सरकारी खजाने से वेतन एवं लाभ मिलता है, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राज्य के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में भेजें। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने यह फैसला सुनाते हुए यह भी कहा कि आदेश का उल्लंघन करनेवालों के लिए दंडात्मक प्रावधान किए जाएं।

देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया, उसने जैसे सोये हुए समाज को झकझोर कर जगा दिया है। अब देश के धनी मानी नौकरशाह, नेतागण और सामान्य कहे जानेवाले आम नागरिकों को प्राथमिक शिक्षा एक समान दिया जाना व्यावहारिक है अथवा नहीं, इसे लेकर देश में व्यापक बहस प्रारम्भ हो गई है। इस विषय पर विचार करते समय गुलामी के पूर्व के भारत की शिक्षा व्यवस्था पर भी एक नजर डालना प्रासंगिक होगा। प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक स्व. धर्मपाल जी ने इस विषय को लेकर पर्याप्त शोध किया भी था।

पौराणिक काल से लेकर अंग्रेजों की गुलामी के काल तक भारत की शिक्षा व्यवस्था एक रमणीय वृक्ष के समान थी। जिसमें तना, फूल, पत्ती, फल सब अलग अलग दिखते हुए भी एक ही जड़ से पोषण प्राप्त करते थे, अर्थात सबकी शिक्षा दीक्षा एक ही प्रकार से होती थी। चाहे गुरू वशिष्ठ का आश्रम हो, चाहे सांदीपनी मुनि का आश्रम, राजा और रंक सभी के बच्चे एक साथ शिक्षा गृहण करते और शिक्षा प्राप्ति के उपरांत अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों के लिए समर्पित होते थे। कृष्ण और सुदामा इसी व्यवस्था का अनुपम उदाहरण है। यही कारण है कि अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत शिक्षा,  कृषि, हस्तशिल्प आदि अनेक क्षेत्रों में अग्रणी था। किन्तु अंग्रेजों ने योजनापूर्वक भारत की संपत्ति का शोषण करने के लिए इसे पददलित किया।

1835 में बिलियम एडम ने बंगाल और बिहार के गांवों में शिक्षा की स्थिति को लेकर एक सर्वेक्षण किया था। उसने अपने प्रथम विवरण में लिखा था कि सन 1830 से 1840 के वर्षों में बंगाल और बिहार के गांवों में एक लाख के लगभग पाठशालाएं थीं। चेन्नई प्रदेश के लिए भी ऐसा ही अभिमत टॉमस मनरो ने व्यक्त किया था। उसके अनुसार, “वहां प्रत्येक गांव में एक पाठशाला थी।” इसी प्रकार मुम्बई प्रेसीडेंसी के जी.एल.प्रेंटरगास्ट नामक वरिष्ठ अधिकारी ने लिखा है, “गांव बड़ा हो या छोटा, यहां शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जिसमें कम से कम एक पाठशाला न हो। बड़े गांवों में तो एक से अधिक पाठशालाएं भी थीं।

अंग्रेज अधिकारियों के लिए इन सर्वेक्षणों को पचा पाना बहुत मुश्किल था। क्योंकि उनके देश में सन 1800 तक आम परिवार के बच्चों के लिए पाठशालाओं की व्यवस्था बहुत साधारण स्तर की ही थी। इतना ही नहीं तो जो विद्यालय थे भी उनकी स्थिति भी बहुत दयनीय थी। और तो और जब भारत तथा इंग्लेंड के बीच शिक्षा, उद्योग, हस्तकला, कृषि आदि की तुलना हुई तो यह दिखाई दिया कि भारत के कृषि मजदूर को इंग्लेंड के कृषि मजदूर की तुलना में अधिक वेतन प्राप्त होता था। इन सर्वेक्षणों से एक बात निर्विवाद रूप से सिद्ध हुई कि गुलामी काल में यद्यपि भारत कंगाल बना, किन्तु उसके बाद भी भारत में शिक्षा का प्रसार, शिक्षा पद्धति, पाठ्यक्रम आदि की गुणवत्ता और व्यापकता उन दिनों भी इंग्लेंड की अपेक्षा अच्छी थी। साथ ही भारत की पाठशालाओं का वातावरण भी इंग्लेंड की पाठशालाओं की तुलना में विशेष आत्मीयता पूर्ण और नैसर्गिक था।

एडम के सर्वेक्षण के 45 वर्ष बाद डॉ.जी.डब्लू.लीटनर द्वारा पंजाब प्रांत में पारंपरिक भारतीय शिक्षा को लेकर व्यापक सर्वेक्षण किया। डॉ.लीटनर लाहौर के सरकारी कोलेज में प्रिंसिपल थे। वे कुछ समय तक पंजाब सरकार के शिक्षा विभाग में निदेशक के पद पर भी रहे थे। उनके निष्कर्ष भी एडम के समान ही थे, बल्कि यूं कहा जाए कि अधिक स्पष्ट और असंदिग्ध थे। लीटनर अपने सर्वेक्षण में लिखते हैं कि, “जब पंजाब अंग्रेजों के अधिपत्य में आया, तब वहां विभिन्न स्तर की पाठशालाओं में तीन लाख तीस हजार छात्र थे। वे सभी लिख पढ़ सकते थे, साथ ही साधारण गणना भी कर सकते थे।”

18वीं, 19वीं शताब्दी में भारत आए अंग्रेज अधिकारियों और प्रवासियों द्वारा लिखे गए लेखों के आधार पर ही चार्ल्स मेटकाफ और हेनरी मोईनी ने भारत को प्रजातांत्रिक गांवों का देश निरूपित किया। उनके अनुसार उस समय भारत के गांव भी राज्यों के समान एक दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र थे। गांवों की सारी राजस्व आय के ऊपर उन गांवों का ही अधिकार रहता था। भारतीय समाज और राजतंत्र भले ही एक राष्ट्र के तौर पर सदा संगठित और एक सूत्र में आबद्ध रहे हों, किन्तु समाज या शासन तंत्र किसी केन्द्रीय व्यवस्था से कभी जुड़े हुए नहीं रहे। शायद भारतीय सैन्य तंत्र की कमजोरी का भी यही कारण रहा। इसके बाद भी अगर भारतीय समाज जीवन बचा रहा तो उसे समझने के लिए यूरोपीय चश्मा नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि आवश्यक है। जिस दिन राजराजेश्वर श्रीकृष्ण और विपन्न सुदामा एक साथ अध्ययन करने लगेंगे, भारत पुनः जग का सिरमौर बन जाएगा। एक समान शिक्षा व एक समान चिकित्सा सुविधा स्वतंत्र भारत की प्राथमिकता होना चाहिए।