Source: न्यूज़ भारती हिंदी21 Aug 2015 11:48:39

कभी नरेन्द्र मोदी के पांच करोड़ से रन आउट हुए नीतीश अब नमो के सवा सौ लाख करोड़ से स्टम्पड आउट होते स्पष्ट दिख रहे हैं। 

- प्रवीण गुगनानी

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आसन्न बिहार चुनाव के पहले बिहार को सवा सौ लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज देकर एक प्रकार से नीतीश पर साहसिक किन्तु डबल गूगली गेंद डालने का कार्य कर दिया है। साहसिक इस दृष्टि से की चुनाव पूर्व इस पैकेज की घोषणा से चुनावी लाभ लेने के आरोप लग रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा उनके महाविलय गठबंधन के साथी लालू ने तो इस पैकेज को बिहार की नीलामी तक का घटिया शब्द कह डाला। जबकि सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी या किसी भी प्रधानमंत्री के लिए किसी भी राज्य को इतना बड़ा महा आर्थिक पैकेज देना एक बड़े संकल्प का ही परिणाम होता है और इसे पूर्ण करने में होनेवाली तनिक सी भी चूक उनका राजनीतिक भविष्य निर्धारण करने में एक बड़ा कारक सिद्ध होती है। यह गूगली गेंद इस दृष्टि से है कि इस पैकेज का उल्लेख करना और नहीं करना, इसकी प्रशंसा करना या आलोचना करना, इसके लिए अहो-अहो कहना या आह-आह कहना दोनों ही नीतीश-लालू सहित सम्पूर्ण विपक्ष को अतीव भारी पड़ जाएगा। नमो ने महाविलय के गले में जैसे महा गुल्ला फंसा दिय़ा है और डबल गूगली इस रूप में कि नमो ने अपने बिहार दौरे में इस पैकेज की घोषणा के दौरान जिस राजनीतिक घटना का जिक्र किया वह बड़ी अर्थपूर्ण और चुनावी दृष्टि से प्रभावकारी है।

सात वर्ष पूर्व कोसी नदी में आई भयंकर बाढ़ विपदा के समय बिहार का तंत्र छिन्न-भिन्न हो गया था। इस त्रासदी से बिहार की जनता परेशान और दुखी थी तो शेष राष्ट्र भी बिहार की इस विपदा और पीड़ा में उसका साथी बन साथ खड़ा था। उस समय नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री थे और नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री। एक सूत्र और भी था जो उनको जोड़ता था वह था एनडीए के घटक दल के रूप में दोनों ही राजनीतिक सहयात्री थे। बिहार की कोसी नदी में आई बाढ़ से उपजी उस महाविपत्ति और समस्याओं को देखते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 करोड़ करोड़ की राहत राशि का ड्राफ्ट बनाकर बिहार सरकार के पास भेजा था और मुख्यमंत्री ने इसे लौटा दिया था। सार्वजनिक जीवन में और उससे भी ऊपर संवैधानिक दायित्व धारण करनेवाले व्यक्ति का आचरण कितना स्पृही और कितना निस्पृही होना चाहिए इसका बखान प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश को चोटिल करने के लिए प्रभावी और मारक ढंग से किया। नीतीश के इस आचरण को दम्भी, घमंडी, आत्मकेंद्रित बताते हुए मोदी ने बिहार की जनता को बार-बार याद दिलाया कि पांच करोड़ की जो राशि गुजरात की सरकार ने बिहार सरकार को बाढ़ राहत कार्य में संवेदनापूर्वक दी थी उसमें लाखों रुपया गुजरात में बसे और काम करनेवाले बिहारी नागरिकों द्वारा दिए योगदान से भी एकत्रित हुआ था।

संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा से लौटकर तुरंत ही बिहार की सहरसा और आरा की रैलियों को संबोधित करने पहुंचकर नरेंद्र मोदी ने अपनी अथक श्रमनिष्ठ प्रधानमंत्री की छवि को और अधिक चमकाया। वैसे अब यह उनके लिए आवश्यक नहीं है, वे देश में एक अहर्निश, अथक और अविचल प्रधानमंत्री के रूप में निर्विवादित तथा सुस्थापित हो गए हैं। लम्बी विदेश यात्रा से लौटकर दौड़े-दौड़े उनकी बिहार आने की यह मुद्रा संवेदनशील तथा जमीन से जुड़े बिहारियों में मोदी के प्रति पूर्व से अंकुरित स्नेह को और अधिक पल्लवित कर बढ़त दे गई।

प्रधानमंत्री ने बिहार के लिए केवल सवा सौ लाख करोड़ का विशेष पैकेज ही नहीं दिया अपितु यह भी स्पष्टतः कहा कि बिहार का विभिन्न मदों में बचा हुआ चालीस हजार करोड़ रुपया भी बिहार को इसके अतिरिक्त दिया जाएगा। बिहार के लिए इस प्रकार एक लाख पैंसठ हजार करोड़ का ऐलान करते हुए उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के नाते बिहार सरकार को आड़े हाथों लेने में भी कीई संकोच नहीं किया। मोदी ने स्पष्ट कहा कि बिहार की अक्षम, अकुशल, अयोग्य सरकार केंद्र द्वारा दिए गए बजट आवंटन की राशि का अपूर्ण उपयोग ही नहीं कर पा रही है और राशि बच-बच जा रही है। यह पीड़ा जागृत करने में भाजपा सफल हो रही है कि नीतीश सरकार केंद्र से मिली राशियों और संसाधनों का भी उपयोग क्यों नहीं कर पाए और बिहार का हक़-अधिकार नीतीश सरकार की अक्षमता की बलि क्यों चढ़ गया?

एक बात जो स्पष्ट हो चली है वह यह कि नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा विकास, सुशासन, अनुशासन और योजना के वादों के आधार पर चुनाव लड़ रही है। मोदी बिहार के विकास का एक सुस्पष्ट रोडमैप लेकर चल रहे हैं और इससे वे जनता को भी अवगत करा रहे हैं। जनता की मांग-परामर्श पर उसे जोड़ घटा भी भी रहे हैं वहीं महाविलय केवल और केवल जातिगत समीकरणों के हिसाब-किताब में उलझा हुआ है। एक समय पर धुर विरोधी ही नहीं अपितु एक-दूसरे से कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई लड़ चुके कांग्रेस, लालू, नीतीश की जोड़ी कितनी टिकाऊ और समन्वयशाली होगी इस पर जनता का संशय होना भी स्वाभाविक ही है। वहीं दूसरी ओर अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही भाजपा में किसी भी प्रकार के असंतोष, असमन्वय और अनुशासनहीनता की कल्पना भी अभी के दौर में अकल्पनीय हो चली हैं। जनता चाहे बिहार की हो या शेष भारत की वह कितनी भी जातिगत आधारित वोटिंग हेतु तत्पर हो किन्तु वह सदैव एक स्थिर और अनुशासनशाली सरकार की घोर आकांक्षी और आग्रही तो हो ही चली है।

बिहार की जनता इस बात से वाकिफ है कि नरेंद्र मोदी तो चार वर्ष और प्रधानमंत्री के तौर पर रहने ही वाले हैं और यदि नीतीश मुख्यमंत्री बन गए तो वे भला किस प्रकार से नरेंद्र मोदी से समन्वय बैठाएंगे? एक बड़े सघन जनसंख्यावाले और बेकार स्थिति में चल रहे राज्य के मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री से समन्वय, सम्बन्ध सामान्य न हो तो लोकतंत्र में समस्याएं उत्पन्न होती हैं। किन्तु जिस प्रकार नीतीश ने नरेंद्र मोदी के सदभावना स्वरूप दी हुई पांच करोड़ की बाढ़ राहत राशि को भद्द पीट-पीटकर लौटाया था उससे इन दोनों व्यक्तियों के मध्य सम्बन्ध सामान्य होना तनिक कठिन लगते हैं; खास तौर पर तब जबकि नरेंद्र मोदी के स्पष्ट बहुमतधारी प्रधानमंत्री की स्थिति को नीतीश कुमार सवा वर्ष के पश्चात भी सहजता से स्वीकार नहीं कर पाएं हैं। यद्यपि इन दोनों को एक दो बार आमने-सामने होने के सार्वजनिक अवसर मिले, जहां नीतीश कुमार सामान्य होने का भरसक प्रयास करते दिखें तथापि मोदी के प्रधानमंत्री के समक्ष वे सामान्य नहीं हो पाए। और प्रधानमंत्री मोदी भी उनके बाढ़ राहत राशि के उस प्रकरण को अपने स्वाभिमान पर बैठाए दिखते हैं जो कि स्वाभाविक ही है। बिहार की भोलीभाली, किन्तु संवेदनशील तथा मानवीय दृष्टिकोणवाली जनता इस पूरे प्रकरण को भलीभांति समझ रही है। भाजपा का चुनाव घोषणा पूर्व का प्रचार तंत्र भी जनता को इस तथ्य को विनम्रतापूर्वक समझाने में सफल हो चला है तो यह नीतीश कुमार के लिए खतरे की घंटी ही है।