Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Aug 2015 14:27:06


पाकिस्तान बातचीत की टेबुल पर आने के बजाय मुंह चुराकर पलायन कर गया। इसका अंदेशा पहले से ही हो गया था। नियत तिथि से दो दिन पहले जिस तरह की हरकतें पाकिस्तान की तरफ से हुईं, उनसे ही लगने लगा था कि शायद ही वह आमने-सामने की बातचीत के लिए साहस जुटा सके। अब, जबकि बात से पहले ही काफी बतंगड़ बनाया जा चुका और अंतत: भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की होनेवाली जिस बातचीत पर दुनिया भर की नजर टिकी हुई थी, उसको अपनी ओर से पाकिस्तान ने रद्द कर दिया तो अमेरिका सहित कई देशों ने निराशा व्यक्त की है।

कहना नहीं होगा कि अब दोनों पड़ोसी देशों के बीच तू-तू, मैं-मैं का लंबा दौर भी चलेगा ही। सीमा पर तनाव, सीजफायर उल्लंघन और आतंकी घुसपैठ की कोशिशें भी बदस्तूर जारी रहेंगी। ऐसे में हमारी केंद्र सरकार और भाजपा की साझेदारी में ही चल रही जम्मू-कश्मीर की सूबाई सरकार को पहला काम तो यही करना चाहिए कि हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं पर नकेल कसी जाए और उनकी गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए। उन्हें कोई रैली-सभा-प्रदर्शन आदि की कतई इजाजत न दी जाए और उनके पाकिस्तानी संपर्कों को छिन्न-भिन्न कर दिया जाए। लंबे समय तक उनको अलग-थलग कर देने की पहल की जानी चाहिए, ताकि इस बार की तरह पाकिस्तान भारत के खिलाफ उनके कंधों का इस्तेमाल ही न कर सके।

बहरहाल, दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत रद्द होने पर पाकिस्तानी मीडिया की प्रतिक्रियाओं को देखें तो पाकिस्तान की मंशा और मानसिकता का जायजा बखूबी लिया जा सकता है। पाकिस्तानी मीडिया ने वार्ता न हो पाने के लिए उलटे भारत को ही जिम्मेदार ठहराया है। जबकि कश्मीरी अलगाववादियों से नहीं मिलने की भारत की सलाह पर पाकिस्तान ने ही अपनी ओर से बातचीत रद्द कर दी।

पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार डॉन ने अपने पहले पेज पर छपी खबर का शीर्षक ही दिया कि भारत की शर्तों की वजह से एनएसए स्तर की बातचीत रद्द हुई। डॉन ने लिखा है कि बहुत अधिक कलह हो जाने के बाद सरकार ने भारत के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की प्रस्तावित बैठक को रद्द करने का फैसला किया। उसने कश्मीरी नेताओं के साथ मुलाकात की अनुमति से इनकार का हवाला दिया है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पाकिस्तान के इस रवैये से साफ होता है कि वह आतंकवाद के मसले पर बातचीत करने का इच्छुक नहीं है। इससे पहले पाक ने बैठक से चंद घंटे पहले ही वार्ता रद्द करने का फैसला लिया। भारत का कहना था कि वह सिर्फ आतंकवाद के मसले पर ही बात करेगा, जबकि पाक का कहना था कि वह कश्मीर मुद्दे को बातचीत से नहीं हटा सकता।

इस बीच पाकिस्तान के एनएसए के साथ हुर्रियत नेताओं के डिनर का कार्यक्रम भी रद्द हो गया है। गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित वार्ता उफा में हुई दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बातचीत के आधार पर होनी थी। आंतकवाद को लेकर पाकिस्तान का रवैया हमेशा शुतुरमुर्गी में रहा है। जब भी सच से सामना करने का समय आता है, तो वह अपनी गर्दन रेत में घुसा लेता है।

असल में पाकिस्तान भारत के कूटिनीतिक प्रयासों को लेकर परेशान हैं। वार्ता रद्द कर पाकिस्तान ने अपने दिल के खोट को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। बड़ा सवाल इस बात का है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान की भारत के साथ कोई वार्ता हो पाएगी या नहीं? पाकिस्तान की धोखेबाजी से भारत आजिज आ चुका है, भारत सरकार अब पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने के मूड में दिखाई दे रही है और देना भी चाहिए। क्योंकि पाकिस्तान अपनी फितरत से बाज आता दिखाई नहीं दे रहा है। वह न तो शिमला समझौते को मान रहा है और न ही उफा वार्ता के प्रस्ताव को।

वर्ष 1972 में हुए शिमला समझौते में साफ कहा गया है कि इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं हो सकती है. इसके बावजूद पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के अलगाववादियों को इस प्रक्रि या में शामिल करने की कोशिश बेमानी जिद्द ही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कार्यभार संभालने के समय से ही पाकिस्तान से बातचीत का संकल्प रेखांकित करते रहे हैं. शपथ-ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित करने से लेकर उफा में जारी साझा बयान उनके प्रयासों के प्रमाण हैं.

इसके विपरीत पाकिस्तान अब भी छद्म युद्ध के जरिये भारत को अस्थिर करने की अपनी नीति पर ही चल रहा है. पिछले वर्ष भारत ने हुर्रियत नेताओं को पाकिस्तानी उच्चायोग में बुलाने के मामले पर ही विदेश सचिवों की बैठक रद्द की थी. इस बार भी भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि अलगाववादी गुटों द्वारा द्विपक्षीय वार्ता को प्रभावित करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती है. यह कश्मीर और आतंकवाद पर हमारी सरकार के मजबूत आत्मविश्वास को प्रदर्शित करता है.

भारत ने शिमला समझौते और उफा के साझा बयान की भावनाओं का पूरा आदर किया है. पाकिस्तान के  उकसावे के बावजूद भारत ने बातचीत की गंभीर पहल की. इस पूरे प्रकरण पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है और दोनों देशों की जनता भी कूटनीतिक पैंतरों को देख रही है. अगर पाकिस्तान ने अपने रवैये में बदलाव नहीं किया, तो आतंक की आग में वह भी झुलसता रहेगा और वैश्विक राजनीतिक पटल पर उत्तरोत्तर हाशिये की ओर धकेले जाने के लिए अभिशप्त रहेगा.