Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Aug 2015 15:29:46

 

तो पाकिस्तान ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द कर दी। उसके पास इसके अलावा विकल्प क्या था? हालांकि उसने इसका दोष भारत पर मढ़ा है, किंतु सच पूरी दुनिया के सामने है। भारत की पूर्व शर्त को बात रद्द करने का आधार बनाना झूठ के सिवा कुछ है ही नहीं। भारत ने कोई शर्त नहीं रखी। भारत ने तो केवल यह कहा कि जो शिमला समझौता और उफा का संयुक्त वक्तव्य है उसको ध्यान में रखते हुए हम बातचीत करें। यानी इसमें कोई तीसरा पक्ष नहीं होना चाहिए और उफा की भावना के अनुरुप पहले आतंकवाद और हिंसा रोकने पर बात हो। प्रश्न है कि पाकिस्तान को इसमें समस्या क्या थी? क्या वह नहीं चाहता कि आतंकवाद पर लगाम लगे? क्या वह नहीं चाहता कि नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी रुक जाए? जाहिर है, उसकी मंशा कुछ और ही थी और है।

जब पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने 22 अगस्त को पत्रकार वार्ता में कहा कि उफा के संयुक्त वक्तव्य में अगर सभी मुद्दों पर बात करना शामिल था तो उसमें कश्मीर अपने आप आ जाता है। हां, आ जाता है। पर वह प्रस्तावना है, जो करने वाले पहलू हैं यानी ऑपरेशनल भाग उनमें तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की आतंकवाद और हिंसा रोकने की बातचीत, मुंबई हमले की कानूनी प्रक्रिया तेज करना, युद्वविराम उल्लंघन को रोकने के लिए सीमा सुरक्षा बल एवं पाकिस्तान रेंजर्स की बातचीत, दोनों संगठनों के औपरेशन के महानिदेशकों यानी डीजीएमओ की साप्ताहिक बैठकें, मछुआरों की रिहाई तथा धार्मिक यात्राओं को प्रोत्साहन देना शामिल था। इसके अलावा उसमें तो कुुछ है ही नहीं। फिर पाकिस्तान कश्मीर को उसमें लाने के लिए क्यों अड़ा रहा? उसमें भी करेले पर नीम यह कि हुर्रियत से मिलेंगे...। यह बातचीत के लिए ईमानदार तैयारी का प्रमाण नहीं था। सरताज अजीज यह कहते रहे कि भारत ने यदि आतंकवाद के संदर्भ में डोजिएर बनाए हैं तो हमने भी रॉ को लेकर तीन डॉजिएर बनाए हैं जिसे वो भारत को देने के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ को शेयर करेंगे। यानी आप जानबूझकर भारत को उत्तेजित कर रहे हैं। तीसरे पक्ष को आप डोजिएर देने की बात कहकर क्या साबित करना चाहते हैं?

भारत ने डोजिएर अवश्य तैयार किया, और पूरी गंभीरता से और ठोस प्रमाणों के आधार बनाकर किया, उसमें आरोप नहीं आतंकवाद को खत्म करने, उनके दोषियों को पकड़ने की गंभीर भावना थी। पाकिस्तान ने जो डोजिएर तैयार किया वह केवल भारत को आरोपित कर उसे घेरने की रणनीति थी। भारत सरकार ने अधिकृत तौर पर किसी को डोजिएर न दिखाया न उसकी चर्चा की। सरताज अजीज ने बाजाब्ता पत्रकार वार्ता में उसे लाकर दिखाया। यह सब क्या था? सच यह है कि पाकिस्तान ने अपने ही प्रधानमंत्री की इज्जत नहीं की। नवाज शरीफ और नरेन्द्र मोदी की सहमति से उफा का संयुक्त वक्तव्य तैयार हुआ। प्रश्न है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की वचन की कोई कीमत है या नहीं? जब 10 जुलाई को उफा में नवाज शरीफ और नरेन्द्र मोदी मिले उसके बाद दोनों देशों के विदेश सचिव बैठे उसमें करीब आधा घंटा लगा और एक संयुक्त वक्तव्य तैयार हुआ, जिसमें बातें बिल्कुल साफ थीं। वहां शरीफ से जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हां, मैं इससे संतुष्ट एवं खुश हूं। लेकिन 20 अगस्त को पाकिस्तान के विदेश सचिव का जो वक्तव्य जारी हुआ है उसमें उफा के संयुक्त वक्तव्य को पलट दिया गया है। यह तो प्रधानमंत्री की बेइज्जती थी। जब उसमें दो ही स्टेकहोल्डर माने गए, जब उसमें आतंकवाद और सीमा पर शांति एवं स्थिरता पर बात होनी थी तो फिर तीसरे स्टेकहोल्डर एवं कश्मीर को लाना बेईमानी तो थी ही, नवाज शरीफ की औथोरिटी को नकारना भी था। सरताज अजीज और नवाज शरीफ ने सेना प्रमुख और आईएसआई प्रमुख से मुलाकात की तो वह अकारण नहीं था। निश्चय ही सेना की मंशा से सारा निर्णय हुआ है। सेना किसी तरह इस समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बातचीत नहीं चाहती थी। या इस तरह चाहती थी कि पाकिस्तान यहां आकर हुर्रियत नेताओं की उच्चायोग में मेजबानी करे तथा उसके द्वारा कश्मीर को फिर से सुर्खियों में ले आए।

भारत के लिए इसे स्वीकारना करना संभव नहीं था। इस बदले हुए भारत का अनुभव पाकिस्तान को संभवतः पहली बार हुआ। ऐसे भारत की जो हुर्रियत को हाशिए का पक्ष भी नहीं मानता। पहले प्रदेश की मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार द्वारा हुर्रियत के चेहरों को नजरबंद कराया, ताकि पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश जा सके कि हमारा रुख क्या है। जब मुफ्ती ने दबाव में आकर उन सबको मुक्त किया तो फिर दिल्ली में ही उनके पुलिसिया स्वागत की व्यवस्था की गई। शब्बीर शाह दिल्ली पहुंचे और हवाई अड्डे पर ही पुलिस ने उनको अपनी मेजबानी में ले लियां। अगर आप नहीं मानेंगे तो फिर हम अपनी धरती पर कानून के अनुसार कदम तो उठाएंगे ही। सरताज अजीज भले कहें कि भारत की मीडिया गलत कह रही है कि पाकिस्तान बातचीत से भाग रहा है किंतु सच यही है कि वो भागने का बहाना और तरीका तलाश रहे थे। भारत के विदेश सचिव जयशंकर 3 मार्च को पाकिस्तान गए थे। क्या उन्होंने कहा कि मैं वहां पाक अधिकृत कश्मीर से, गिलगित बलतिस्तान के नेताओं से, बलूच नेताओं से मुहाजिर कॉमी मूवमेंट के नेताओं से मिलना चाहता हूं। वे भी ऐसा कर सकते थे। जब उनने नहीं कहा तो पाकिस्तान ऐसा क्यों कह रहा था? भारत को पाक अधिकृत कश्मीर के उन लोगों से जो पाकिस्तान से अलग होना चाहते हैं संपर्क बढ़ाकर उनसे सार्वजनिक बात करनी चाहिए और उनकी हर संभव मदद करनी चाहिए।

पाकिस्तान कहता है कि हुर्रियत कश्मीर के सच्चे प्रतिनिधि हैं। किस प्रमाण से आप कह सकते हैं कि हुर्रियत कश्मीर के लोगों के सच्चे प्रतिनिधि हैं? क्या आधार है? आप ऐसा सोचते है इसलिए वो हो गया। हुर्रियत कुछ नहीं है। अगर पाकिस्तान उनको धन देना बंद कर दे, फिर देखिए उनकी क्या दशा होती है। तो भारत ने हुर्रियत के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा करके साफ और सख्त संदेश दे दिया है। पाकिस्तान के सामने अब स्पष्ट है कि आगे यदि भारत से बात करनी है तो फिर हुर्रियत राग का परित्याग करना होगा। अगर नहीं करेंगे तो फिर हुर्रियत के साथ भारत वो सब कुछ करेगा जो देश को तोड़ने की मांग करने वालों के साथ किया जाता है। दूसरे, पाकिस्तान के सामने यह भी साफ है कि आतंकवाद और सीमा पर शांति से ही बातचीत की शुरुआत हो सकती है। अगर आप इस पर सहमत नही ंतो फिर अन्य विषय पर बात करके समय जाया करने के पक्ष में भारत नहीं है। भारत को बातचीत का परिणाम चाहिए और परिणाम यही हो सकता है कि पाकिस्तान भारत जो कुछ आतंकवाद के संदर्भ में प्रमाण देने वाला था उसे स्वीकार करे और उन पर रोक लगाए। वह सीमा पर शांति के लिए उफा में जो तय हुआ उस पर अमल करे। 23 और 24 जुलाई के पत्रों में से एक का आपने 18 अगस्त को जवाब दिया और दूसरे का तो जवाब ही नहीं दिया। यह साबित करता है कि बातचीत को लेकर पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति कैसी हो गई थी। उफा के बाद ही हमने देखा कि नवाज शरीफ की कितनी आलोचना पाकिस्तान में हुई। तो उस दबाव में पाकिस्तान सरकार ने उसकी ऐसा व्याख्या करनी आरंभ कर दी जो उनके घरेलू वातावरण को सूट करता था। भारत ने ऐसा नहीं किया। भारत में भी विरोध एवं आलोचना हुआ, किंतु यह उफा वचनबद्वता पर कायम रहा।

भारत तो चाहता है कि पाकिस्तान एक स्थिर पड़ोसी के रूप में खड़ा हो। इस बातचीत से उसकी संभावना निकल सकती थी। पाकिस्तान ने अपने रवैये से साबित कर दिया कि वह स्थिर पड़ोसी होना नहीं चाहता। वह यह सुनिश्चित करने में अपनी पूरी बुद्धि लगा रहा है कि हमारा घर भले आतंकवाद, मजहबी कट्टवाद, राजनीतिक प्रतिष्ठान पर सैन्य वर्चस्व के त्रिचक्रव्यूह में फंस गया हो, इसे न स्वीकारना है न इससे निकलना है। उल्टे भारत को आरोपित करना है। इसके अलावा और क्या वजह हो सकती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिल्ली आकर आतंकवाद और सीमा पर शांति की बात नहीं करते। उसमें तो उसका भी लाभ था। हां, उसने अपनी नासमझी, कुंठा और धूर्त रणनीति अपनाने के चक्कर में अपनी छवि और खराब कर ली है। इसके विपरीत भारत ने संयम, संतुलन के साथ संकल्प और जहां आवश्यकता थी सख्ती दिखाकर एक परिपक्व देश की छवि बनाई है। भले पाकिस्तान ने बातचीत रद्द कर दी हो, भारत इससे जितनी लाभ की अवस्था में आ गया है उसे वह परिणत नहीं कर सकता।