Source: न्यूज़ भारती हिंदी31 Aug 2015 11:06:41

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के निर्देश पर आखिरकार नई दिल्ली महानगर पालिका के अंतर्गत आनेवाली सड़क जिसका नाम औरंगजेब रोड था अब वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम रोड के नाम से जानी जाएगी। इस सड़क के नाम परिवर्तन का मुद्दा कई वर्षों से चल रहा था जो अब आकर फलीभूत हुआ।

- राजीव गुप्ता

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के निर्देश पर आखिरकार नई दिल्ली महानगर पालिका के अंतर्गत आनेवाली सड़क जिसका नाम औरंगजेब रोड था अब वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम रोड के नाम से जानी जाएगी। इस सड़क के नाम परिवर्तन का मुद्दा कई वर्षों से चल रहा था जो अब आकर फलीभूत हुआ। दरअसल नई दिल्ली महानगर पालिका के अंतर्गत आनेवाली विभिन्न सड़कों के नाम परिवर्तन के पीछे की कहानी में कई तकनीकि पहलू हैं। मुझे एक आरटीआई के जवाब में गृह मंत्रालय का एक आदेश का हवाला दिया गया जो कि वर्ष 1975 में नई दिल्ली महानगर पालिका को लिखा गया था। उस आदेश के अनुसार नई दिल्ली महानगर पालिका की विभिन्न सड़कों का नाम नहीं बदला जा सकता था क्योंकि नाम-परिवर्तन करने से पता ढूंढने में दिक्कत आती और आनेवाली नई पीढ़ी देश के इतिहास से वंचित रह जाती। इसके बाद से ही प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को पत्र लिखकर इस विषय पर हस्तक्षेप करने की मांग की जाने लगी। परिणामतः इस कार्य में सफलता मिली और नाम-परिवर्तन करने का फैसला दिल्ली के मुख्यमंत्री और नई दिल्ली महानगर पालिका के अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल की उपस्थिति में किया गया।

राममनोहर लोहिया अस्पताल, महात्मा गांधी मार्ग, पटेल चौक, महावीर जयंती पार्क इत्यादि महापुरुषों, देशभक्तों, समाजसेवियों के नाम पर रखे गए दिल्ली के अस्पतालों, सड़कों, चौकों और पार्कों का नाम हम देख सकते हैं जिन्हें पढ़कर निश्चित ही हमे उन देशभक्तों का देश के प्रति योगदान याद आते हैं जिससे हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। अगर हम एक नजर अतीत मे डाले तो पाएंगे कि भारत में “नाम” को लेकर कई दिग्गज देशबी हाक्तों ने भी संघर्ष किए हैं, परन्तु उनकी “नाम-परिवर्तन” के पीछे की मंशा राजनीति न होकर देशभक्ति की भावना थी। 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना कर विधानसभा के अन्दर से अंग्रेज सरकार का विरोध करने हेतु कलकत्ता (वर्तमान नाम कोलकाता) महानगर पालिका का चुनाव जीता और वे स्वयं महापौर बन गए तथा उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को कलकत्ता महानगर पलिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया था। सुभाष चन्द्र बोस जब कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए गए तो उन्होंने कलकत्ता महानगर पालिका का पूरा तंत्र एवं उसकी कार्यपद्धति तथा कोलकाता के मार्गों के नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दे दिया था। कुछ इसी तरह का काम समाजवादी राजनारायण ने भी किया। उन्होंने बनारस के प्रसिद्ध बनिया बाग़ में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की स्थापित प्रतिमा को हटाकर गुलामी के प्रतीक को मिटटी में मिला दिया हालांकि उनके इस कृत्य के लिए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था परंतु  आज उसी पार्क को  ‘लोकबन्धु राजनारायण पार्क’  के नाम से जाना जाता है।

परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इतिहास ने उस हेमू के नाम को ही बिसार दिया जिसने पानीपत के तीसरे युद्ध से पूर्व 22 युद्ध लड़े। हेमचन्द्र ने दूसरे युद्ध में अकबर की सेना को और 20वी युद्ध में अफगानों को पराजित किया। अकबर की सेना 7 अक्टूबर, 1556 को तुगलकाबाद, दिल्ली की लड़ाई में हेमचन्द्र से हारकर भाग गई। हेमचन्द्र का तब सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य के रूप में दिल्ली में राज्याभिषेक हुआ। गाजी की उपाधि पाने के लिए अकबर द्वारा हेमू का सिर काटकर उसे काबुल भेजा गया और धड़ तुगलकाबाद के किले में टांग दिया गया। हेमू व उनके पिता और परिवार पर किए गए इन अत्याचारों के बाद भी अकबर का संरक्षक बैरम खां संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने हेमू के समस्त भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया। 

अपनी फतह के जश्न में उसने हजारों बंदी भार्गवों और सैनिकों के कटे सिरों से मीनारें बनवार्इं, जिसका उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चन्द्र ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत, सल्तनत से मुगलों तक में भी किया है। ऐसी एक मीनार की मुगल पेंटिंग राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में आज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है और नवस्थापित पानीपत संग्रहालय में भी प्रदर्शित है। इतना ही नहीं अकबर की क्रूरता का राजस्थान आज भी गवाह है जिसके कारण महाराणा प्रताप को घास तक की रोटियां खानी पड़ी थी। औरंग्जेब की क्रूरता तो आज भी इतिहास में अक्षम्य है जिसका मुक़ाबला छत्रपति शिवाजी महाराज ने डटकर किया और हिन्दवी साम्राज्य की स्थापना की।

परंतु वर्तमान समय में देशभक्ति को राजनीति ने अपने पंजे में जकड़ लिया है। सार्वजनिक जगहों जैसे अस्पताल, सड़क, चौक, पार्क इत्यादि का “नामकरण”  मात्र एक राजनीति करने का हथियार बनकर रह गया है अगर ऐसा मान लिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सत्ताधारी राजनेता कभी अपने नाम पर तो कभी अपने दल के किसी अन्य “श्रेष्ठ” के नाम पर अथवा समाज के किसी विशेष वर्ग को खुश करने के लिए ऐसे सार्वजनिक सभी स्थलों का नामकरण कर राजनीति करते आए है।

 अभी हाल ही में पिछले दिनों पहले जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता स्थित इंदिरा भवन का नाम बदलकर क्रांतिकारी कवि काजी नजरूल इस्लाम के नाम पर रखना चाहा तो यह खबर अख़बारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बनी थी क्योंकि इमारत का नाम बदले जाने के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने कहा था कि वे काजी नजरूल इस्लाम के खिलाफ नहीं है लेकिन इंदिरा गांधी का इस तरह से अपमान नहीं सहा जा सकता। उल्लेखनीय है कि इस इमारत का निर्माण वर्ष 1972 में किया गया और कांग्रेस के एक सत्र के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस भवन में ठहरी थीं।

2004 में तत्कालीन केन्द्रिय पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने अंडमान की राजधानी पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल सेलुलर जहां वीर सावरकार को दो आजीवन कारावास की सजा के लिए रखा गया था वहां वीर सावरकर के नाम की पट्टिका लगी थी, को बदलवाकर महात्मा गांधी के नाम की पट्टिका लगवा दी थी जबकि गांधीजी का सेलुलर जेल से कोई दूर-दूर तक सम्बन्ध ही नहीं था।

सिर्फ बंगाल ही नहीं एक समय उत्तर प्रदेश में भी नाम-परिवर्तन को लेकर राजनीति काफी गर्म हुई थी जब उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने पूर्ववर्ती माया सरकार का एक बड़ा फैसला बदल दिया था। मायावती सरकार द्वारा यूपी के सात् जिलों के नाम बदल दिए गए थे लेकिन सपा सरकार ने इस निर्णय को बदलते हुए सभी सात जिलों को उनके पुराने नाम लौटाने का निर्णय लिया।

विज्ञान से लेकर मान्यताओं तक में नामकरण की व्यवस्था बहुत प्राचीन और सटीक है। भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट होता है किन्तु जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं। हिन्दू धर्म संस्कारों में नामकरण-संस्कार पंचम संस्कार है। जिसके तीन आधार माने गए हैं। पहला, जिस नक्षत्र में शिशु का जन्म होता है, उस नक्षत्र की पहचान रहे। इसलिए नाम नक्षत्र के लिए नियत अक्षर से शुरू होना चाहिए, ताकि नाम से जन्म नक्षत्र का पता चले और ज्योतिषीय राशिफल भी समझा जा सकें। दूसरा, मूलरूप से नामों की वैज्ञानिकता बनें और तीसरा यह कि नाम से उसके जातिनाम, वंश, गौत्र आदि की जानकारी हो जाए। गुरु वशिष्ठ द्वारा श्रीराम आदि चार भाइयों का नामकरण और महर्षि गर्ग द्धारा श्रीकृष्ण का नामकरण उनके “गुण-धर्मों” के आधार पर करने की बात सर्वविदित है।

 विज्ञान की भाषा में भी किसी वस्तु, गुण, प्रक्रिया, परिघटना आदि को समझने-समझाने के लिए उसका समुचित नाम देना आवश्यक होता है। नाम देने की पद्धति को ही नामकरण अर्थात “नोमेंक्लेचर” कहा जाता है जिसमे तकनीकी शब्दों की सूची, नामकरण से संबन्धित सिद्धान्त, प्रक्रियाएं आदि शामिल होते हैं। जीव विज्ञान में द्विपद नामकरण प्रजातियों के नामकरण की एक प्रणाली है जिसे कार्ल लीनियस नामक एक स्वीडिश जीव वैज्ञानिक द्वारा शुरू किया गया। जिसमें उन्होंने पहला नाम वंश अर्थात “जीनस” का और दूसरा प्रजाति विशेष का विशिष्ट नाम को चुना था। उदाहरण के लिए, मानव का वंश “होमो” है जबकि उसका विशिष्ट नाम “सेपियंस” है, तो इस प्रकार मानव का द्विपद या वैज्ञानिक नाम “होमो साप्येन्स्” है। इतना ही नहीं रसायन विज्ञान में आईयूपीइसी नामकरण की व्यवस्था से आज भी स्कूलों में विभिन्न प्रकार के रसायनों के नाम उनके गुण-धर्मों के आधार पर रखने की पद्धति सिखाई जाती है। 

जब विज्ञान और मान्यताओं में “गुण-धर्म” की महत्ता के आधार पर ही “नामकरण-पद्धति” का अस्तित्व है तो इतना सब कुछ जानते हुए भी न जाने क्यों अकबर को महान व औरंगजेब, इब्राहिम लोदी जैसे अन्य मुस्लिम आक्रान्ताओं के नाम को महिमामंडित करने हेतु आज भी भारत की राजधानी की सड़कों का नाम इन आक्रांताओं के नाम पर है, और तो और इन सड़कों का रख-रखाव करनेवाली नई दिल्ली महानगर पालिका को भी नहीं पता कि इन सड़कों का नाम इन आक्रांताओं के नाम पर क्यों रखा गया है व उसका आधार क्या है? ध्यान देने योग्य है कि भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। भारत को गुलाम बनाने और लूटने के उद्देश्य से आए सभी विदेशी पूर्व मध्यकालीन-मध्यकालीन शासकों को नाको चने चबवाने होते हुए भारत के कई महान सपूतों ने अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया, इस बात का पता हमें इतिहास के पन्नों से चलता है। आए दिन हम उन सभी शहीदों को श्रद्धान्जलि देते हैं जिन्होंने हंसते-हंसते भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने हेतु अपने प्राणों को देश-हित में न्योछावर कर दिया। जिन्हें याद करके हर भारतीय गौरवान्वित महसूस करता है। परन्तु देश की राजधानी दिल्ली की कुछ सड़कों के नाम उन्हीं "पूर्व-मध्यकालीन एवं मध्यकालीन शासकों" के नाम पर रखी गई है जिन्होंने भारत को सैंकड़ों वर्ष गुलाम बनाए रखा। हमें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि जो देश अपना इतिहास भूल जाता है वह अपना अस्तित्व व पहचान खो बैठता है।