Source: न्यूज़ भारती हिंदी31 Aug 2015 16:51:54

- ललित शर्मा 

हिन्दी फ़िल्मों का भी एक जमाना था, समाज में सार्थक संदेश देने का एक प्रभावशाली माध्यम फ़िल्में ही थी। फ़िल्मी अभिनेताओं को दर्शक हाथों-हाथ लेते थे, यदि कोई धार्मिक फ़िल्मों का हीरो है तो उसे भगवान सदृश ही समझते थे। अब जमाना बदल गया, फ़िल्में समाज में विकृति परोसने का माध्यम बन गई हैं। पहले कैसी भी फ़िल्में टाकिज में लग जाए, 25 हफ़्ते तो निकाल ही देती थीं। फ़िल्मों की सफ़लता का पैमाना उसके 25 हफ़्ते तक टाकीज में टिक जाना ही माना जाता था। टाकिजों में टिकिटें ब्लेक होती थी। लोग लुट-पिट कर भी फ़िल्म देखना चाहते थे। कईयों की तो आदत में शुमार था फ़िल्म का पहला शो देखना। कई तो इतने दीवाने थे कि दिन भर में 4 शो देखकर आधी रात के बाद घर पहुंचते थे।

वह समय ऐसा था जब फ़िल्में समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाती थी। खुलेपन और गंदगी का दौर नहीं था। धार्मिक, पारिवारिक एवं भुतिया फ़िल्मों के 25 हफ़्ते चलने की गारंटी होती थी। रामायण, हर हर महादेव, वीर हनुमान, संत ज्ञानेश्वर, साई बाबा, जय संतोषी माँ, राजा भरथरी जैसी फ़िल्मों के शो हाऊस फ़ुल हुआ करते थे। साथ ही यह भी था कि धार्मिक, पारिवारिक, ऐतिहासिक फ़िल्में देखने के लिए युवाओं को घर से छूट मिल जाया करती थी साथ ही फ़िल्म की टिकिट के पैसे भी। वयस्कों के लिए रामसे बदर्स की हारर फ़िल्में मर्दानगी दिखाने का अवसर देती थी।

पारिवारिक और साफ़ सुथरी फ़िल्में बना करती थी। राजश्री बैनर्स और जैमिनी की फ़िल्में हुआ करती थी। राजश्री बैनर अब छोटे परदे पर आकर दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बना रहा है।  यशराज बैनर्स की पारिवारिक फ़िल्में टाकीजों में चलने की गारंटी हुआ करती थी। मैंने गिनी-चुनी फ़िल्में ही देखी हैं। जिनके नाम उंगलियों पर ही गिना सकता हूँ। तीसरी कसम, दिल अपना और प्रीत पराई, मुगले आजम, सिकंदर पोरस, धरती कहे पुकार के, गीत गाता चल, बालिका वधु, मदर इंडिया, आवारा, बंदनी, शोले, मेरा नाम जोकर, आग, बरसात(पुरानी) ज्वार भाटा, सूरज, साहब बीबी और गुलाम, काश्मीर की कली, दुश्मन, जंगली, शोले, संत ज्ञान ज्ञानेश्वर, हर हर महादेव, जय संतोषी माता, मै तुलसी तेरे आंगन की, दरवाजा, खूनी हवेली, हिन्दुस्तान की कसम इत्यादि फ़िल्में देखी। नई फ़िल्मों में प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, यशवंत, तारे जमीन पर, लगान, स्टेनली का डिब्बा इत्यादि अच्छी फ़िल्में आई।

दूरदर्शन पर रविवार को आनेवाली फ़िल्में बिना मध्यान्ह के ही लगातार देखीं। फ़िल्मों का शौक तो था, परन्तु हमारे गांव में फिल्म देखने का साधन नहीं था और न ही मुझे इतनी छूट थी कि अन्य साथियों की तरह रायपुर के टाकीजों में फ़िल्म देख आuऊं। पहले गांव में कभी-कभी टुरिंग टाकिज के द्वारा फ़िल्में दिखाई जाती थी। कभी सरकार की तरफ़ से भी फ़िल्म दिखाने वाले आते थे। रात 8 बजे बस स्टैंड में अपनी गाड़ी khadi करके उसके पीछे परदा लगाते और प्रोजेक्टर से फ़िल्में दिखाया करते थे। कई बार तो इस मुफ़्त की फ़िल्म के चक्कर में पिटाई भी खाने की नौबत आ जाती थी। फ़िल्म और उपन्यास दो ऐसी चीजे हैं कि एक बार शुरु हो जाए फ़िर चाहे कितना ही काम पड़ा हो, जब तक अंजाम तक नहीं पहुंच जाए तब तक वह काम होना नहीं है। इसे ही फ़िल्मों और उपन्यासों का चस्का कहते थे।

एक बार रात को पापा के लिए सरदर्द की गोली "आनंदकर" लेने जाना पड़ा, रास्ते में फिल्म का प्रदर्शन हो रहा था। फ़िल्म का नाम था हिन्दुस्तान की कसम। फ़ौजियों की लड़ाईयां और बन्दुक टैंक गोले चल रहे थे। रात के लगभग 8 बजे थे। फ़िल्म देखने के लिए भीड़ लगी हुई थी। मैं भी अपनी सायकिल किनारे पर लगा फ़िल्म का आनंद लेने लग गया। हीरो हीरोईन पहचान में नहीं आते थे पर गाने बड़े अच्छे चल रहे थे। हीरो के डायलाग के साथ दर्शक ताली और सीटी बजाते। समय का पता ही न चला। पापाजी मुझे ढूंढते हुए घर से बस स्टैंड आ चुके थे। उनके सिर में दर्द था, इसलिए मुझे रात में टेबलेट लाने के लिए बाड़ा से निकलने की अनुमति मिली थी। फ़िल्म देखने के चक्कर में दुकान भी बंद हो चुकी थी। अब उन्होंने गुस्से में आकार दो थप्पड़ लगाए और दोनों घर आ गए। उसके बाद शायद एक सप्ताह मैं उनके सामने नहीं आया। ऐसी दीवानगी थी फ़िल्मों की।

तब लोगों को फ़िल्मों का चस्का अधिक था। क्योंकि इसके अतिरिक्त सस्ता मनोरंजन का साधन अन्य कोई दूसरा नहीं था। फ़िल्म देखने लिए दाम भी देने पड़ते थे। फ़िर मुफ़्त का सिनेमा आ गया दूरदर्शन के रूप में। दूरदर्शन की सौगात दिल्ली के बाद सीधे रायपुर को मिली। उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल थे। जयपुर, मुजफ़्फ़रपुर और रायपुर से एक साथ प्रसारण शुरु हुआ। हमारे गांव के स्कूल के एक टीवी का सेट मिला। उसे चलाने के लिए एक गुरुजी नियुक्त किया गया। शाम 5 बजे ही टीवी स्कूल के बरामदे में रख दिया जाता। लोग घर से अपनी बोरियां, दरी आसन इत्यादि पहले से ही लाकर बिछा देते। कोई अपनी कुर्सियां घर से ले आता। इस तरह सारा गांव सामूहिक रूप से फिल्म का आनंद उठाया करता था।

वर्तमान में इतने सारे चैनल आ गए टीवी पर कि दिन भर में सैकड़ों फ़िल्में दिखाई जाती है और आदमी हाथ में रिमोट लिए सिर्फ़ चैनल ही बदलता रहता है। मनोयोग से फ़िल्में भी नहीं देख पाता। जैसे ही कोई विज्ञापन आता है, वह चैनल बदल देता है। फ़िल्मों का चलन भी कम हो गया। शायद ही कोई फ़िल्म हो जिसने 5 हफ़्ते भी टाकिजों में पूरे किए हों। सौ-सौ करोड़ के बजट की फ़िल्में बनती हैं और धूम धाम से टाकिजों में लगती हैं। फ़िर उतरती कब हैं इसका पता ही नहीं चला। कुछ वर्षों पूर्व माधुरी दीक्षित और सलमान खान की हम आपके हैं कौन 25 सप्ताह रायपुर के टाकिज में चली। पहले तीन-चार सप्ताह तो हर हर महादेव या रामायण जैसी फ़िल्में टुरिंग टाकिजों में चल जाया करती थी। टीवी ने सिनेमा के दर्शकों का अपहरण कर लिया।

कुछ दिनों पूर्व फ़ेसबुक पर पानसिंह तोमर फ़िल्म का बहुत हल्ला मचा था। मैंने सोचा कि कभी समय मिलेगा तो देख लेंगे टाकिज में जाकर। कुछ दिनों के बाद टाकिज में गया तो वह फ़िल्म कब उतरी उसका पता ही नहीं चला। पहले तो फ़िल्में लगने और उसके उतरने की पूर्व सूचना रिक्शे में लगा भोंपू बता जाया करता था कि फ़लां फ़िल्म का अंतिम शो अंतिम दिन कब है? दर्शकों का स्वाद भी मुम्बई के निर्माता निर्देशकों ने खराब कर दिया। आज की फ़िल्में तो सपरिवार बैठ कर देखना ही कठिन है। बच्चे देख रहे होते हैं तो माता-पिता को देखकर उन्हें चैनल बदलना पड़ता है, अगर माता-पिता देख रहे होते हैं तो बच्चों के आने पर वे चैनल बदल कर समाचार देखने लग जाते हैं। फ़िल्मों का सत्यानाश हो गया है। न देखो तो ही सुखी रहोगे।

किसी जमाने में निर्माता निर्देशक फ़िल्मों को समाज के चरित्र निर्माण का जरिया समझते थे और फ़िल्में भी उसी मर्यादा में बना करती थी और चला भी खूब करती थी। कई फ़िल्में तो साल भर तक एक ही टाकीज में चली। हिन्दी सिनेमा में एक्शन फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ, जंजीर लेकर एंग्री यंग मैन आ गाए। टाकिजों में ढिशुम-ढिशुम और मार-धाड़ वाली फ़िल्में हिट होने लगी। इसके साथ ही दर्शकों का स्वाद बदलने लगा। फ़िल्मों के अपसंस्कृतिकरण के रूप में धीरे से बलात्कार दृश्यों के रूप में सेक्स का भी तड़का लगने लगा। अधिक कमाई करने के चक्कर में दर्शकों का जायका खराब किया फ़िल्म निर्माताओं ने। अनावश्यक रूप से देह दर्शन के सीन डाले गए, नाभि प्रदर्शना हीरोईनें पैदा हो गयी। जब नाभि प्रदर्शन से काम नहीं चला तो लगभग निर्वस्त्र होकर ही पर्दे पर आने लगी। इससे समाज में विकार पैदा हुए। समाज में बढ़ते अपराधों के मूल में मुख्य रूप से हिन्दी सिनेमा को प्रभावकारी माना जा सकता है। सत्यकथा इत्यादि में मैंने पढ़ा था कि अपराधी ने फ़लां फ़िल्म से प्रेरणा लेकर अपराध किया।

फ़िल्म निर्माता नग्नता दिखाने के प्रश्न पर दलील देते दिखाई देते हैं कि जो दर्शक देखना चाहता है वही हम दिखाते हैं। यह तो वही बात हुई जैसे अंग्रेजों ने पहले मुफ़्त में चाय पीना सिखलाई फ़िर लोगों को चाय की लत लगाकर चाय बगानों से धन कमाने लगे। पहले लोगों को मुफ़्त में सिगरेट पिलाई गई, फिर सिगरेट बनाने की फ़ैक्टरी लगाकर लोगों की जेबें खाली कराई गई। नैतिकता भी कोई चीज होती है, संस्कार भी कुछ होते हैं। लेकिन मुंबईया निर्माताओं की नोटों की हवस ने इन्हे सर्वभक्षी बना दिया है। इन्हे तो सिर्फ़ पैसा चाहिए। चाहे समाज का सत्यानाश  हो जाए। समाज रसातल में चला जाए। क्योंकि इनका देवता तो सिर्फ़ पैसा ही है। ऐसा नहीं है कि दर्शक इनकी चाल नहीं समझ रहे हैं, फ़िर भी वे इनके जाल में फ़ंस ही जाते हैं। अरबों रुपए के बजट की फ़िल्में पिट रही हैं। शहरों में टाकिजों को जमींदोज करके मॉल बनाए जा रहे हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री को अपना नजरिया बदलना चाहिए वरना यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के साथ समाज भी रसातल में पहुंच जाएगा।