Source: न्यूज़ भारती हिंदी10 Sep 2015 15:38:10

हमारा देश ऐसा है जहां अर्थ का अनर्थ करके किसी भी विषय को आराम से विवादित बनाया जा सकता है और मीडिया की कृपा से उस पर बहस भी हो सकती है। गुजरात सरकार के गोसेवा और गोचर विकास बोर्ड की ओर से जन्माष्टमी पर अहमदाबाद के बापू नगर क्षेत्र में लगाए गए एक होर्डिंग तथा मुंबई में एक सप्ताह तक मांस के प्रतिबंध के आदेश पर जिस ढंग का बावेला मचाया गया है उसे देखकर अपना सिर पीटने की चाहत पैदा होती है। आखिर उसमें ऐसा क्या है जिससे यह मान लिया गया कि गुजरात सरकार आतंकवाद की तरह फैसला कर रही है। उसमें क्या लिखा है जिसे फासीवादी मान लिया जाए? उसमें क्या ऐसी कोई बात लिखी है जो कि किसी समुदाय के लिए सरकार के आदेश या दिशानिर्देश के समान हो? जब ऐसा कुछ है ही नहीं तो फिर हंगामा को बेवजह ही माना जाएगा। इसी तरह महाराष्ट्र के आदेश को भी लोगों के खाने पीने की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप तक करार दिया गया है। यह विचित्र स्थिति है।

यह तो मैं मानता हूं कि अहमदाबाद के होर्डिंग में कुरान शरीफ का जो हवाला है वह संभवतः अपुष्ट है। कुरान शरीफ में गोसेवा या उसकी सुरक्षा का संदेश शायद नहीं दिया गाया है जैसा मुस्लिम विद्वान बता रहे हैं। इसे हम भूल मान लें तो उससे क्या हो गया? न तो पूरे गुजरात में पोस्टर लगा है न कोई शासनादेश है, न उस एक होर्डिंग में ऐसी कोई बात है जिसे आपत्तिजनक मानी जाए। उसमें यही न लिखा है कि चार पैर वाले जानवरों में गाय सबसे श्रेष्ठ है। यह तो हिन्दू धर्मशास्त्रों का कथन है। गोसेवा को सबसे बड़ा धर्म तक कहा गया है। गोपालन को हिन्दुओं का दायित्व माना गया है। उसमें यही कहा गया है कि गोमांस स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। आपकी इससे असहमति हो सकती है, पर कई शोधों में इसकी पुष्टि हुई है। वैसे जिस विभाग का काम ही गाय की सेवा, गाय के पालन और उसके संरक्षण को प्रोत्साहन देना, उसमें सहयोग करना है वह इस प्रकार की बात तो करेगा ताकि लोग गोहत्या करने से बचें। उसमें यह कहा गया कि गाय का दूध, दही, मक्खन, घी कहीं ज्यादा पौष्टिक है इसलिए इसका उपयोग करें। ऐसा लिखने में कहां किसी पर जबरन लादने की कोई बात है। आपकी इच्छा है आप दुध, दही, मक्खन का प्रयोग मत करिए। होर्डिंग में मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, कृषि मंत्री भूपेन्द्र सिंह चूडास्मां तथा चांद तारे के चित्र छपे हैं। इसे आप साम्प्रदायिक नजरिए से देखें तो इसका अर्थ कुछ उल्टा पुल्टा निकल सकता है, लेकिन इसे मुसलमानों से अपील के रूप में भी तो देखा जा सकता है। 

हम यहां कुरान में गोमांस का उल्लेख है नहीं है इस बात में जाना नहीं चाहते। मुस्लिम विद्वान कहते हैं कि नहीं हैं तो मान लेते हैं। दूसरे की आस्था के बारे में कुरान शरीफ क्या कहता है इस पर भी जाने की यहां आवश्यकता नहीं है। लेकिन ऐसा कोई भी पहलू इस होर्डिंग में नहीं है जिससे किसी मजहब का अपमान हो, किसी मजहबी भावना के विरुद्ध हो या फिर इसे सांप्रदायिक या फासीवादी मान लिया जाए। यह सीधे-सीधे गोमांस खाने वाले को ऐसा न करने के लिए प्रेरित करने तथा उसके पालन पोषण करके उसके जीवित अवस्था में निकलने वाले दूध आदि के सेवन का व्यवहार करने की अपील वाली होर्डिंग है। यह विरोध का नहीं समर्थन करने का होर्डिंग है। यह विवाद की नहीं, प्रशंसा और प्रोत्साहन की होर्डिंग है। कुरान शरीफ वाले अंश को निकालकर या उसे संशोधित कर इसे दोबारा जगह-जगह लगाया जा सकता है।

गाय की उपयोगिता पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि उसे अलग से बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारे लिए उस जानवर की कितनी ज्यादा उपयोगिता है। हाल के वर्षों में इस पर काफी शोध हुए और हो रहे हैं जिनके परिणाम चमत्कारिक आ रहे हैं। गो पालन की प्रवृत्ति भी पुनः जोर पकड़ी है और लाखों परिवार इससे न केवल सुखी जीवन जी रहे हैं वरन गाय के दूध, मूत्र और गोबर तक से अनेक औषधियां निर्मित कर उससे स्वास्थ्य सेवा भी कर रहे हैं। इनको कुछ समय के लिए अलग कर दें तो धार्मिक मान्यता के अनुसार गाय को हिन्दू माता का दर्जा देते हैं। यही नहीं हमारे यहां यह भी कहा गया है कि अगर आपकी मृत्यु होती है तो आपकी आत्मा को अंततः गाय ही सही स्थान पर ले जाएगी जिसका आपको इस जीवन में अंदाजा भी नहीं है। इसे बैतरणी पार कराना बोलते हैं। यह आस्था का प्रश्न है। किसी को अंधविश्वास भी लग सकता है। किंतु भावनाएं करोड़ों की ऐसी हैं तो उसे आप क्या करेंगे। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्व में गोरक्षा की बात है। उसमें हर राज्य से यह अपेक्षा की गई है कि गोहत्या पर प्रतिबंध के लिए कदम उठाएगा। चूंकि अनेक राज्यों ने अपने दायित्व का पालन नहीं किया, इसलिए गोहत्या होती रही, कत्लाखाने चलते रहे। अब जागृति आई है, राज्य कानून बना रहे हैं, केन्द्र ने भी एक कानून का मॉडल बनाकर राज्यों को भेजा है। इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में कोई राष्ट्रीय कानून इस पर बन जाएगा।

अब आए महाराष्ट्र प्रतिबंध की ओर। महाराष्ट्र में मीरा-भायंदर इलाके में 10 सितंबर से 18 सितंबर तक मांस की दुकानों को बंद करने का प्रस्ताव पास किया गया है। महानगर पालिका ने ये फैसला जैन लोगों के त्योहार पर्युषन की वजह से लिया है। मुंबई नगर निगम ने भी मंगलवार को शहर में 4 दिन के लिए ऐसी ही पाबंदी लगा दी है। बीएमसी अधिकारियों के मुताबिक, मुंबई में 10, 13, 17 और 18 सितंबर को मीट की सेल पर बैन रहेगा। हलांकि फैसले का विरोध शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी कर रही है। दुकानदारों का कहना है कि इतने दिन दुकान बंद रखने से उनकी रोजी-रोटी पर संकट आ जाएगा।

जरा इसका सच जानिए। यह प्रतिबंध प्रतिवर्ष लगता है और केवल उस परंपरा का पालन किया गया है। जो कांग्रेस और एनसीपी आज विरोध कर रही है उसके राज में भी लगा था तब तो ये विरोध नहीं करते थे। पयुर्षन पर्व जैन धर्म का विशिष्ट पर्व है। यदि वे चाहते हैं कि उस बीच किसी तरह की हिंसा न हो तो इसे हम सबको स्वीकार करने में क्या समस्या है? भारत जैसे देश में दो स्थानों पर भी यदि एक सप्ताह हिंसा न हो तो फिर गांधी जी सहित हमारे अनेक पूर्वज मनीषियों को श्रद्धांजलि होगी। इससे यदि कारोबार को कुछ क्षति होती है तो होने दीजिए। कुछ लोगों की जीभ को केवल मांस का स्वाद नहीं मिलेगा तो न मिल। यह हिन्दू, मुसलमान, सिख्ख, ईसाई सबके लिए होगा। इसलिए इसे भी किसी एक मजहब का नहीं माना जा सकता। न इससे सरकार यह तय कर रही है कि कौन क्या खाए। कई बार आवश्यकता पड़ने पर यह भी तय करना पड़ता है और करनी चाहिए। कोई बकरीद में बकरे काटते हैं तो उनको रोका नहीं जाता। हालांकि अहिंसा के पुजारियों को इसमें भी काम करना चाहिए। बकरा या कोई भी जानवर काटने वालों को समझाना चाहिए कि हिंसा में जानवरों, पक्षियों को कितना कष्ट होता है। लेकिन यह आगे की बात है। फिलहाल तो हमें ऐसे कदमों को स्वीकार करना चाहिए। जिस तरह से शराब में भी कुछ दिन ड्राई डे होते हैं उसी तरह मांस का ड्राई डे बना लेना चाहिए। खासकर दूसरे धर्म की भावनाओं का ध्यान रखते हुए। इससे भारत की जो अहिंसामूलक समाज निर्माण का लक्ष्य है उसे दिशा में शून्य से थोड़ा आगे का कदम तो उठेगा ही।