Source: न्यूज़ भारती हिंदी16 Sep 2015 15:44:50

तो बिहार चुनाव की औपचारिक दुंदुभि चुनाव आयोग ने बजा दी है। औपचारिक इसलिए क्योंकि राजनीतिक दलों ने तो चुनावी रणभूमि में पहले से ही बिगुल फूंका हुआ है। चुनाव आयोग की घोषणा की प्रतीक्षा राजनीतिक दलों ने नहीं की। केवल उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई, अन्यथा चुनाव प्रचार आयोग की घोषणा के पहले ही लगता है जैसे चरम पर पहुंच गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चार परिवर्तन रैली तथा एक सरकारी कार्यक्रम सह राजनीति रैली तथा उसके जवाब में जनता दल यू के नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पत्रकार वार्ताओं ने चुनावी युद्ध का माहौल तो बनाया ही हुआ है। भाजपा के प्रचार रथ तो जनता दल (यू) के संपर्क रथ सहित अनेक कार्यक्रमों से चुनाव अभियान की प्रचंडता कोई भी महसूस कर सकता है।  दो गठबंधन पहले से सामने आ चुके हैं। जनता दल (यू), राजद एवं कांग्रेस के गठजोड़ में तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच सीटों का औपचारिक विभाजन भी हो चुका है। जाहिर है, चुनावी तिथियों की घोषणा के बाद हमें उम्मीदवारों के चयन में तीव्रता देखने को मिल रही है। इस तरह कोई अंतर आएगा तो इतना ही, अन्यथा चुनाव अभियान तो धीरे-धीरे चरम अवस्था की ओर जा ही रहा था।

हालांकि चुनाव आयोग द्वारा इतने चरणों में चुनाव कराने के निर्णय से सहमत होना कठिन है। भारत के पास आज सुरक्षा से लेकर अन्य सारे संसाधन इतने हैं कि बिहार का चुनाव भी एक चरण में कराया जा सकता है। लेकिन आयोग धीरे-धीरे ज्यादातर राज्यों में बहुचरणीय मतदान की परंपरा डाल चुका है। आयोग के लिए भले यह सुविधाजनक हो, पर आचार संहिता का लंबा खींचना, अन्य प्रकार की अति सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक मशीनरी का चुनाव केन्द्रित हो जाना आदि ऐसी स्थितियां हैं जिनसे संबंधित प्रदेश को विकास कार्यों से लेकर आम जीवन यापन तक में समस्याएं आतीं हैं। इसलिए चुनाव आयोग को अगर एक दो राज्यों का चुनाव हो तो एक दिन में संपन्न कराने की ओर बढ़ना चाहिए। वैसे भी बिहार का चुनाव अब हिंसक घटनाओं वाला चुनाव नहीं रहा। कम से कम पिछले चार चुनाव इसके प्रमाण हैं। अन्य हिंसा सहित माओवादी खतरे का जहां तक प्रश्न है तो एक दिन में अर्धसैनिक बलों की पर्याप्त व्यवस्था करके उतनी ही सुरक्षा व्यवस्था की जा सकती है जितनी कई दिवसीय मतदान में। लेकिन चुनाव मामले में हमारे संविधान ने चुनाव आयोग को जो अधिकार दिए हैं उनसे वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान एक प्रकार से सर्वशक्तिसंपन्न हो गया है।

संभवतः आयोग के सामने बिहार चुनाव को लेकर सुरक्षा के संदर्भ में इसके राजनीतिक महत्व का भी आभास है। राजनीतिक महत्व मतलब एक ओर यदि यह नीतीश कुमार एवं लालू यादव दोनों के लिए अपने अस्तित्व का प्रश्न है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए दिल्ली पराजय के बाद अपनी लोकप्रियता कायम करने का पैमाना भी। यदि बिहार चुनाव में भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन की विजय होती है तो फिर नरेन्द्र मोदी ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपने एजेंडा पर आगे बढ़ सकते हैं, विपक्ष का हमला कमजोर होगा औश्र परिणाम विपरीत आए तो फिर इसकी उल्टी स्थिति हो सकती है और आने वाले चुनावों के परिणाम इसके विपरीत हो सकते हैं। इसलिए दोनों पक्षों ने इस चुनाव को वाकई राजनीतिक महायुद्व में परिणत कर दिया है। एक ओर 1 लाख 25 हजार का अतिरिक्त पैकेज तो दूसरी ओर नीतीश कुमार की 2 लाख 70 हजार करोड़ की पांच वर्षों की विकास योजना। समूचे प्रचार तंत्र का भरपूर उपयोग, आरोप-प्रत्यारोप, शाब्दिक हमले प्रतिहमले से वातावरण काफी संतप्त हो चुका है। मोदी बनाम नीतीश की जुगलबंदी ने बिहार चुनाव को राष्ट्रीय क्षितीज पर ला दिया है। इतनी रोचकता पहले बिहार चुनाव में कभी शायद ही रही हो। नीतीश कुमार को नेतृत्व सौंपने वाले मुलायम सिंह यादव ने अलग सारी सीटों पर चुनाव लड़ने का ख़म ठोंकते हुए नीतीश पर जिस तरह से तीखे हमले किए हैं उनसे बिहार चुनाव का तापमान बढ़ गया है। एक खिलाड़ी के रूप में पप्पू यादव भी मैदान में हैं जिनकी छवि के बारे में बताने की आवश्यकता नहीं। असदुद्दीन ओवैसी भी अचानक बिहार की रणभूमि में उतर गए हैं और जिस लहजे में वो जो कुछ बोल रहे हैं उनसे सांप्रदायिक जहर पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा भी कुछ क्षेत्रों तक सीमित ऐसे लोग हैं जो येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने या प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।

इन राजनीतिक परिस्थितियों में चुनाव आयोग का निष्कर्ष यह हो सकता है कि बिहार के इस घनघोर घात-प्रतिघात में विजय के लिए वे सारे यत्न किए जाएंगे जो सामान्यतः किए जाते हैं। बाहुबल तो इसका एक भाग है। हालांकि चुनाव आयोग मानता है कि चुनावों में हमने बाहुबल को काफी हद तक समाप्त कर दिया है, पर धन बल का प्रभाव कम करने में सफलता नहीं मिली है। बिहार में यदि किसी तरह विजय का वायुमंडल है तो इसमें धनबल का बोलबाला होना सुनिश्चित है। उस धन बल का प्रभाव रोकने के लिए आयोग को जबरदस्त नाकेबंदी करनी पड़ेगी। चुनाव अयोग की घोषणा के पूर्व ही राजग एवं जदयू, राजद, कांग्रेस गठबंधन के कार्यक्रमों, अभियानों पर जितना खर्च हुआ है उनसे आने वाले समय के परिदृश्य का अनुमान लग जाता है। चुनाव आयोग और उसके नेतृत्व में काम करने वाली सारी सरकारी मशीनरी के लिए धन के अवैध इस्तेमाल को रोकना बहुत बड़ी चुनौती होगी। धन केवल सीधे नहीं दिया जाता, लोगों के पास कई तरीकों और कई रुपों में इसे पहुंचाया जाता है। प्रशासन एवं राजनीति दलों व उम्मीदवारों के बीच इसमें ‘तू डाल डाल, हम पात पात’ का खेल चलता है। इसके अलावा नेता और उम्मीदवार जातीय एवं सांप्रदायिक कार्ड का नंगा खेल न खेल सकें इसे भी रोकने का दायित्व चुनाव आयोग का ही हो जाता है। यदि आयोग इनमें सफल हो गया तो बिहार चुनाव दूसरे राज्यों के चुनाव के लिए नजीर बन सकता है। 

तो एक ओर चुनाव आयोग के स्तर पर इसके नजीर बनने की संभावना है तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों के व्यवहार और प्रदर्शन से भी। व्यवहार का अर्थ कि आप चुनाव को किस दिशा में मोड़ते हैं। चुनाव स्वच्छ विकास, लोगों से जुड़े स्थानीय, क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं या फिर संकीर्ण जातीय-सांप्रदायिक समीकरण हाबी रहते हैं। दुर्भाग्य से 30 अगस्त की जद यू, राजद एवं कांग्रेस गठबंधन की स्वाभिमान रैली में लालू प्रसाद यादव ने 1990 के दशक के जातीय पांसा फेंकने में भी अपने भाषण का ज्यादा समय लगा दिया। इससे बिहार के विवकेशील लोगों के अंदर ही नहीं, देशभर में भय पैदा हुआ है कि जातीय जकड़बंदी की राजनीति से एक बार बहुत हद तक बाहर निकल चुका बिहार कही फिर उसी त्रासदी का शिकार न हो जाए। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी तीन सभाओं में यदुवंशियों की बातें कीं, भाजपा ने भी जातीय सम्मेलन किए, लेकिन भागलपुर की सभा में उनने एकदम विराम लगा दिया। वहां उन्होंने जनता के सामने केवल विकास के एजेण्डे को रखा। उनने लोगों से प्रश्न किया कि क्या विकास पर वोट नहीं पड़ना चाहिए? क्या लोगों का बिहार से शिक्षा एवं रोजगार के लिए पलायन रुके इसके लिए मतदान नहीं होना चाहिए? क्या माताओं-बहनों की संपूर्ण सुरक्षा हो इसके लिए मतदान नहीं होना चाहिए? तो उन्होंने ब्रेक लगाने की कोशिश की। देखना है यह ब्रेक कब तक और किस सीमा तक लगा रहता है।

तो कुल मिलाकर एक ओर यदि बिहार चुनाव चुनाव आयोग के लिए चुनौती है तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों के लिए भी कसौटी कि वे स्वच्छ और सही मुद्दों पर टिक पाते हैं या नहीं। लेकिन यह बिहार के लोगों का भी परीक्षण है कि वे साफ सुथरे मुद्दों पर मतदान करते हैं, लोभ लालच से उपर उठकर अपना वोट डालते हैं या फिर जातीय-सांप्रदायिक संकीर्णता में फंस जाते है या लोभ लालच में आकर अपना वोट नीलाम करते हैं। बिहार चुनाव को हर दृष्टि से देश के नजीर बनने का अवसर है।