Source: न्यूज़ भारती हिंदी16 Sep 2015 15:25:46

4 जुलाई, 2015 को दिल्ली के पार्लियामेंट अनैक्सी में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के तत्त्वावधान में सम्पन्न हुए प्रथम अंतरराष्ट्रीय रोजा इफ्तयार के अवसर पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) के मार्गदर्शक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक तथा केन्द्रीय कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार के उद्बोधन के सम्पादित अंश। इस आयोजन में सऊदी अरब, यमन, फिलिस्तिन, इराक, ईरान, तुर्किस्तान सहित 22 मुस्लिम देशों के राजनयिक उपस्थित थे।  

इस्लाम का मतलब अमन और सलामती

अल्लाह, खुदा, ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि यहां उपस्थित महानुभावों पर, हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर अपनी रहमत, कृपा बरसाएं ताकि हम इन्सान से बढ़कर एक फ़रिश्ता (देवता) बनने की दिशा में आगे बढ़ सकें। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया है। मैंने किसी से पूछा कि इस्लाम का मतलब क्या है? तब उन्होंने जवाब दिया कि अमन और सलामती। परन्तु जब हम जब आज पूरी दुनिया पर नजर घुमाएं तो दिखाई देता है दुनिया मानवता से दूर होकर हिंसा, अपराध और दंगों से भारी पड़ी है। इसलिए यदि वैश्विक समाज में प्रेम और शांति का माहौल बनाना है तो समाज को हिंसामुक्त, दंगामुक्त और अपराधमुक्त बनाना होगा। इस कार्यक्रम के जरिए पूरी दुनिया में सन्देश जाए कि दुनिया की भलाई के लिए शांति और सुरक्षा बहुत जरुरी है। यहां उपस्थित दुनिया के हर एक देश के प्रतिनिधि अपने-अपने देशों में जाकर लोगों को बताएं कि शांति और सलामती हर हाल में कायम रखना बेहद जरुरी है। चाहे वह भारत हो, सऊदी अरब हो, यमन हो, ईरान हो, इराक हो, तुर्किस्तान हो, फिलिस्तिन हो, छाए वह पाकिस्तान और बांग्लादेश ही क्यों न हो, सभी देशों को इस पथ को समझना होगा।

ईश्वर ने, अल्लाह ने हमें दंगा या नफरत के लिए पैदा नहीं किया है। उसने हमें पैदा किया है भाईचारा से जीने के लिए, एक दूसरे की सहायता करते हुए आगे बढ़ने के लिए। परन्तु शायद ये बातें केवल किताबों लिखी रह गई। गीता, कुरान शरीफ, बाइबल, गुरुग्रंथ साहब या विश्व के प्रत्येक पंथ के ग्रंथों में समाज के लिए शुद्ध आचरण और उदात्त चरित्र का सन्देश दिया गया है, परन्तु उसके अनुसार आचरण नही रहा। 

पहला सन्देश- प्रदुषण से मुक्ति

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने रमजान के मौके पर पूरी दुनिया को कुछ नए सन्देश दिए हैं। पहला सन्देश है- प्रदुषण से मुक्ति। मंच ने हिंदुस्तान और दुनियाभर के मुसलमानों को सन्देश दिया है कि वे रमजान के महीने में एक पौधा अपने मोहल्ले, गांव, शहर में जरुर लगाएं। क्योंकि वृक्ष के बारे में दुनिया की धारणा है कि अगर वृक्ष है तो जल है, पेड़ से ऑक्सीजन मिलता है इसलिए वृक्ष लगाएं। इस सन्देश को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाएं ताकि दुनिया को प्रदुषण से मुक्त किया जा सके।

जन्नती झाड़ घर-घर लाएं

इसी तरह एक और सन्देश को दुनिया में प्रसारित करने की आवश्यकता है। कुरान-ए-पाक में बताया गया है कि एक जन्नती झाड़ है जिसे अरबी में रेहान कहा जाता है। रेहान को घर-घर लगाओ। पूरी दुनिया में मुसलमान बच्चों के नाम रेहान और रेहाना रखने का एक खुबसूरत चलन (फैशन) हो गया है। क्योंकि इसका मतलब है जन्नत की याद करते रहना। जब पुकारा रेहान तो जन्नत की याद आई और जब पुकारा रेहाना तब जन्नत याद आई। इसलिए घर-घर में जन्नती झाड़ को लगाना या लाना। अनेक हदीसों में कहा गया है कि जिसके घर में रेहान यानी जन्नती झाड़ है और सुबह-शाम उसका दीदार करेगा तो उसकी जिंदगी जन्नती होगी। रेहान की तीन खुबसूरत व्याख्या की गई है। पहला यह कि वह वायु को शुद्ध करता है। दूसरा यह भूत-प्रेत, ऊपरी आत्माओं से हिफाजत करता है, और तीसरा सबसे बड़ा एंटीबायोटिक है। इसलिए वह स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रेष्ठ उपचार का साधन है। इसलिए जन्नती झाड़ रखने की अपील की है। हर मुसलमान के घर में कुरान-ए-पाक के अनुसार जन्नती झाड़ होना चाहिए और उसके सुबह-शाम दीदार करने से जन्नत नसीब होने की गारंटी मिलती है। हिंदुस्तान में रेहान को तुलसी कहते हैं।

माँ के चरणों में जन्नत

हमने कहा कि जिन्दा रहते भी जन्नती हो और मरने के बाद भी जब उसकी किस्मत का फैसला हो तो फैसला जन्नत का ही हो। जीवित रहते वह जन्नती हो और क़यामत के समय जन्नत मिले। इस सन्दर्भ में अन्तिम रसूल और सभी नबियों ने कहा है कि जिन्दा रहते हुए अगर कहीं जन्नत है तो वह माँ के चरणों में। भ्रूण हत्या, बलात्कार, तलाक, नशाखोरी, घरेलू हिंसा आदि नारीविषयक अपराध हमें दोजख (नर्क) की और ले जाता है। बेटी, बीवी, अम्मीजान ये सभी खुदाई कायनात हैं जो हमारे पैदा होने का माध्यम है। इसलिए नारी का सम्मान बढ़ना चाहिए क्योंकि उसके पैरों में जन्नत है। जिन्दा रहते हुए जन्नत नसीब करनी है तो उसका एक ही रास्ता है - “बेटी बचाओ, कल बचाओ” यानी अपने जीवन को जन्नती बनाओ। 

लकुम दिनेकुम वलीयदीन

हिंदुस्तान की हर पंथ, जाति व जुबान में बोला जाता है कि किसी भी मजहब (मार्ग) से चलो, मालिक एक है और सब रास्ते उसी के पास जाते हैं। इस्लाम के अंतिम रसूल साहब ने इस नसीहत को बहुत खूबसूरत तरीके से रोशनीभरे शब्दों में कहा है “लकुम दिनेकुम वलीयदीन”। इस्लाम का यह नया सन्देश हो सकता है - शांति, प्रेम और विकास। हर इन्सान का अपना कोई न कोई दीन (मजहब) होता है, उसे अपने दीन पर चलना चाहिए परन्तु दूसरे इन्सान का भी कोई दूसरा दीन होगा। इसलिए अपने दीन पर चलते हुए कट्टर नहीं सच्चे बनों और दूसरों के दीन की आलोचना न करो। यदि आलोचना हुई तो नफरत, संघर्ष, हिंसा भड़केगी और इज्जत करेंगे तो प्रेम बढ़ेगा, भाईचारा बढ़ेगा। हिंसा के बदले करुणा पैदा होगी। दुनिया में मिलकर चलने का रास्ता है और लड़कर चलने का भी रास्ता है। दूसरों पर कब्ज़ा करने का रास्ता है और दूसरों का मन जीतने का भी रास्ता है। “लकुम दिनेकुम वलीयदीन” यह दूसरों के मन को जीतने का रास्ता है। भरोसा करोगे तो भरोसा मिलेगा और सम्मान करोगे तो सम्मान मिलेगा, प्यार करोगे तो प्यार मिलेगा। “लकुम दिनेकुम वलीयदीन” एक अच्छे इन्सान की खूबसूरत तस्वीर है। इस रास्ते पर चलते हुए क्या हम सन्देश दे सकते हैं? आलोचना नहीं, धर्मांतरण नहीं, झगडा नहीं।

हत्या का रास्ता शैतान का

वतन से मुहब्बत करो कहते हैं हुब्बलवतनी निस्फुल इमान, अपने वतन से मुहब्बत करो तो ईमानवाले बनेंगे। हम सबका अपना-अपना वतन है, पर हमला करके दूसरों की सरजमीं को छिनना हुब्बलवतनी निस्फुल ईमान नहीं है बल्कि यह बेईमानी है, एक किस्म से हिंसा और शैतानी काम है। आज दुनिया में इसे करना ज्यादा फसाद है। इसलिए हजरते आदम ने कहा कि हाविल और काबील में से एक हत्यारा बना और एक का क़त्ल हुआ तो पूरी कायनात में हाहाकार मचा। तब पूछा गया कि सृष्टि का रंग क्यां उड़ रहा है, हवाओं की फिजा क्यों बदल रही है। तब उसने कहा कि आज पहली हत्या हुई! और इसलिए अब इन्सान को मौत का स्वाद मिल गया है, अब आदमी जिंदगी से प्यार करने की जगह मौत से प्यार करने लगेगा और इसके कारण दुनिया में खून का दरिया बहेगा, लाशों के ढेर लगेंगे। हमारे सामने प्रश्न खड़ा होता है कि हमें हत्यारा बनना है या रक्षक का मार्ग अपनाना है। हत्या का रास्ता शैतान का है और रक्षक का रास्ता खुदा का है। हमें रक्षक के रास्ते पर जाना है। 

सुकून की हवाएं हिंदुस्तान से

अंतिम रसूल जिस समय मक्का से हिजरत करके मदीने में थे, एक बार हीरा गुफा के पास अर्ध्यरात्रि के समय टहलते हुए उन्होंने फ़रमाया कि जब मैं तन्हाई में होता हूं तो मुझे सुकून की ठंडी हवाएं (आध्यात्मिक लहर) पूर्व से यानी हिंदुस्तान से आती है। मैंने यह हदीस पढ़ा, मैंने इस मार्ग को समझा कि इस दुनिया में अमन लाना है, सुकून लाना है, सलामती लानी है तो इस ईश्वरीय (खुदाई) सन्देश की सरजमीन, वहां की संस्कृति, वहां के लोग कौन सा है? निश्चित रूप से वह हिंदुस्तान है। इसलिए हमने बड़े बन्धुत्वभाव से शांति, प्रेम, अपनत्व, विश्वास और ख़ुशी का सन्देश देना चाहा।

जरुरतमंदों की सहायता ही सच्ची इबादत    

हमने मुसलमानों को एक और सन्देश दिया है कि रमजान के महीने में आप जकात निकालेंगे तो गरीब, दुखी, पीड़ित, कमजोर और असहाय लोगों की मदद करने के लिए। “इमदाद का सबसे शानदार तरीका” इसी को कहा गया है कि आप जरुरतमंदों की सहायता कर सको। निकाहवाली बीवी पर जुल्म मत ढाओ। बीवी को मत छोड़ो, ठेकेवाली बोतल की रानी शराब को छोड़ो। अगर हम रमजान के महीने में सूफी हो सकते हैं तो साल भर क्यों नहीं? इसके लिए हमने संकल्प लेने की जरुरत है।

हमने इस रमजान के रोजे के इफ्तारी के कार्यक्रम का आयोजन राजनीति के लिए नहीं किया है, वरन आध्यात्मिक सन्देश देने के लिए किया है। अगर सारे मुल्क एक दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करे, तो सभी देशों में मित्रवत व्यवहार बनेगा। यदि ऐसा न हुआ तो हमले, दंगे फसाद बढ़ेंगे। यह खुदा का मार्ग नहीं है। इसलिए आज तो दुनिया में हिंसा चल रही है वह ठीक नहीं है, इसे रोकने के उपाय करने होंगे। व्यवस्थापन में नैतिक मूल्यों की बहुत बड़ी ताकत होती है। व्यवस्थापन से ऐसे हिंसा को रोका जा सकता है।

प्रसाद की भावना अन्न बर्बादी को रोकता है

एक उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण है जो किसी भी देश, भाषा और जाति के लिए सामान्य रूप से लागू होती है। यदि सूखे मेवे की पैकेट बांट दी जाय कि इसे संभालकर रख लीजिए और रोजा इफ्तारी के समय खोलकर रोजा तोड़ दीजिए। कोई उस पैकेट को खोले और एक काजू बादाम नीचे गिर जाए तो वह काजू बादाम गंदा हो गया ऐसा समझा जाता है। झाड़ू लगे तो वह कूड़ेदान में चला जाएगा। लेकिन तब कहा जाए कि यह तो अजमेर शरीफ का प्रसाद है। शाहदरा शरीफ या निजामुद्दीन शरीफ या मस्जिद के अन्दर गए थे या मंदिर गए थे तब हमने जो इबादत कि थी उसके बाद जो पैकेट मिला वह प्रसाद है। प्रसाद के रूप में जो सूखा मेवा मिला वह गिरता है तो प्रसाद गंदा नहीं होता बल्कि हमें पाप लगता है। प्रसाद मंदिर से मिले या मस्जिद से वह गंदा नहीं होता, बल्कि गंदे हम होते हैं। प्रसाद से एक क्रांति का जन्म होता है। प्रसाद की भावना रही तो अन्न बर्बाद नहीं होता। अन्न बर्बाद नहीं हुआ तो न हम भूखे रहेंगे और न ही किसी को भूखा रहने देंगे।

आपस में नहीं, भुखमरी से लड़ें

आज मस्जिद और दरगाह वाले भी जब जरुरत पड़ती है तो खूब लड़ लेते हैं। जब मैं पहली बार दरगाह गे था, जिसके साथ जाना था वह शुद्ध मस्जिद वाला था और दरगाह विरोधी था। उसने कहा आप कुफ्रखाने (नास्तिक स्थान) में जा रहे हो। उसने कहा मैं साथ नहीं जाऊंगा। जिसको लगता है दरगाह जाना गलत है तो उससे झगड़ा मत करो और जिसको दरगाह जाना अच्छा लगता है उससे भी झगड़ने की आवश्यकता नहीं है। मैंने एक मुस्लिम मौलाना फ़क़ीर से पूछा कि अगर दुनिया में भुखमरी का राक्षस है तो उस राक्षस को ख़त्म करने के लिए कौन सी गोली चलानी होगी, कौन सी तलवार चलानी चाहिए। तब उस संत फ़क़ीर ने कहा कि भुखमरी के राक्षस को समाप्त करना है तो उसके लिए कोई गोली, तोप, बम, बन्दुक या तलवार की जरुरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जो अच्छे लोग हैं वे अन्नदान, वस्त्रदान तथा गरीबों के प्रति अपने प्रेम का दान कर इस भुखमरी के राक्षस को समाप्त कर सकते हैं। यदि हम बम, बन्दुक, तोप, तलवार चलाते हैं तो भुखमरी खत्म नहीं होता बल्कि इन्सान का क़त्ल होता है। इन्सान का क़त्ल यानी इंसानियत का क़त्ल और इस्लाम की बदनामी है। मैं इन भारतीय संदेशों से अपनी बात को समाप्त करना चाहता हूं।

सबके मालिक का एक ही स्वरूप- ऊपर वाला

आज बहुत बड़ी ख़ुशी का दिन है कि हम सब लोगों के अन्दर अपने-अपने देश के अन्दर की मूलभूत समस्या, मानवता की रक्षा और उसका विकास जैसे विषयों पर चिंतन कर रहे हैं। इस दिशा में हम सब दुनिया के लोग मिलकर क्या कर सकते हैं? भारत की सरजमीन से जो सन्देश दी जा सकती थी उसकी कुछ बातें मैंने आपके सामने रखीं। एक छोटी सी बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। कोलकाता में सम्पन्न हुए एक विश्व सम्मलेन में सभी महानुभावों ने अपनी-अपनी जुबान में अपने मालिक को याद किया। जब मेरा समय आया तो मैंने कहा कि हर जुबान में, हर मजहब के पास अपने मालिक को याद करने के लिए अनेक नाम हैं। कोई अल्लाह कहता है, कोई खुदा, कोई गॉड कहता है तो कोई ईश्वर, पर मेरे मालिक ने कहा कि मेरे नाम से झगड़ा न हो इसलिए उसने दुनिया को अपना एक पक्का स्वरूप बता दिया, वह है “ऊपर वाला”। हर सम्प्रदाय के लोग अपने-अपने मालिक को ऊपर वाला कहते हैं। सभी मानते हैं कि हम ऊपरवाले के पास से यहां आए और बाद में उसी ऊपरवाले के पास जाना है। यह विचार आपस के मतभेद को दूर करता है और विश्व शांति तथा विश्व बंधुत्व का मार्ग दिखलाता है। इसलिए इस इफ्तार के अवसर पर सभी मतों के उत्सवों को मिल जुलकर मनाने का संकल्प करें। आप सभी को ईद की शुभकामनाएं।