Source: न्यूज़ भारती हिंदी02 Sep 2015 17:34:57

मेरे हिसाब मंगलवार को बिहार के भागलपुर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महारैली चुनाव अधिसूचना लागू होने से पूर्व की एनडीए की बड़ी रैली थी जिसमें प्रधानमंत्री के पास विकास को भुनाने का पर्याप्त मौका था और उन्होंने अपने अंदाज में वह सब किया जिसकी महागठबंधन के गढ़ में ज़रूरत थी। कुछ दिनों पूर्व पटना के गांधी मैदान में हुई महागठबंधन रैली में उठाए गए प्रश्नों पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर जवाब दिए। 

दरअसल लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामगोपाल यादव और सोनिया गांधी के मंच साझा करने से एनडीए का प्रचार छोटा लगने लगा था जिसकी भरपाई जरूरी थी। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस आक्रामक अंदाज में महागठबंधन के नेताओं पर निशाना साधा, उससे इतना तो तय है कि आने वाले समय में अब सारा चुनाव प्रचार मोदी बनाम शेष होने वाला है। हां, इसमें बिहार के विकास का मुद्दा कितनी तवज्जो पाता है, यह देखने वाली बात होगी? यह प्रश्न कि आखिर लालू और नीतीश को सोनिया गांधी के साथ मंच साझा करने की क्या ज़रूरत पड़ी जबकि ये दोनों नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के पदचिन्हों पर चलने का दावा करते हैं किंतु इन तीनों नेताओं को कांग्रेस शासनकाल में बड़ी तकलीफों से गुजरना पड़ा, प्रधानमंत्री मोदी ने प्रासंगिक कर दिया। कुछ दिनों से यह प्रश्न सोशल मीडिया के माध्यम से भी उठाया जा रहा था। इस एक तीर से मोदी ने दो निशाने साधे। अव्वल तो बिहार में आज भी जनता-जनार्दन जयप्रकाश नारायण, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के प्रति श्रद्धा से नमन करती है दूसरा कांग्रेस अध्यक्ष के साथ मंच साझा करना अब उनको महंगा पड़ सकता है। नीतीश और लालू को जवाब देना होगा कि क्या सिर्फ चुनाव जीतने के लिए वे इन नेताओं की सीख और बलिदान को भुलाकर कांग्रेस के पंजे से हाथ मिला रहे हैं? यही वजह रही कि मोदी ने गांधी मैदान की महागठबंधन रैली को तिलांजलि रैली कह कर संबोधित किया।

दरअसल भागलपुर किसी समय में भाजपा का गढ़ रहा है। पूर्वी बिहार का यह क्षेत्र दंगों के बाद से भगवा लहर में बहता रहा है मगर बीते लोकसभा चुनाव और विधानसभा उपचुनाव में पार्टी इस मजबूत गढ़ में खेत रही। भाजपा की ओर से मुस्लिम चेहरा शाहनवाज़ हुसैन के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है। अतः यहां प्रधानमंत्री का आना और जोरदार आमद दर्ज़ करवाना निश्चित रूप से जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरणों की राजनीति कर रहे महागठबंधन के लिए नुकसानदेह होगा। पूर्वी बिहार के इस क्षेत्र में 60 विधानसभा सीटें आती हैं, जो किसी भी दल की जीत में महती भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं। हालांकि यहां वर्तमान स्थिति महागठबंधन के पक्ष में किंतु यदि इस ताकत को एनडीए तोड़ दे तो इसका असर उसके पक्ष में दिख सकता है और यही कारण रहा कि मोदी का पूरा भाषण जातिवाद से इतर विकास और राज्य सरकार के झूठ पर केंद्रित रहा ताकि यहां की राजनीतिक धारा बदली जा सके।

मोदी ने लालू और नीतीश पर विकास की राजनीति की अपेक्षा स्वार्थ की राजनीति करने का आरोप लगाया जिसे झुठलाना दोनों के लिए फिलहाल दुष्कर होगा। मोदी ने 14वें वित्त आयोग के हवाले से कहा कि अगले पांच साल में बिहार को तीन लाख 76 हजार करोड़ रुपये केंद्र से मिलेंगे और यह राशि आरा रैली में दिए गए 1.65 लाख करोड़ के पैकेज से अलग हैं। उन्होंने सवाल किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2.74 लाख करोड़ का पैकेज घोषित किया है, जबकि उनसे पूछना चाहिए कि बचा हुआ 1.06 लाख करोड़ रुपया कहां जाएगा? लालू पर निशाना साधते हुए मोदी ने सवाल उठाया कि क्या यह पैसा चारे के लिए लगाया जाएगा? अपने इन्हीं तेवरों के जरिए मोदी ने पैकेज की राजनीति को भी बहस का मुद्दा बना दिया और यह मुद्दा अब विधानसभा चुनाव तक गूंजेगा।

हमेशा जातिगत समीकरणों पर लड़ा जाने वाला बिहार चुनाव यदि इस बार विकास और उन्नति के नाम पर लड़ा जा रहा है तो उसका श्रेय नि:संदेह मोदी को दिया जाना चाहिए। वैसे देखा जाए तो नीतीश कुमार ने लालू को आगे कर जाति कार्ड खेलने की कोशिश की थी मगर अब यह संभव नहीं होगा। जातिगत राजनीति से कांग्रेस का दामन को नीतीश से छिटगेका ही; नीतीश खुद भी लालू के मुकाबले नेपथ्य में चले जाएंगे। थोड़ी बहुत कसर नीतीश की पार्टी के नेता बदजुबानी से पूरी कर देंगे। कुल मिलाकर भागलपुर रैली ने भाजपा के लिए इस क्षेत्र के साथ ही प्रदेश में संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं जो महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी हैं।