Source: न्यूज़ भारती हिंदी22 Sep 2015 12:20:24

विश्व का एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल अब 'धर्मनिरपेक्ष' बन गया है। नेपाल की संविधान सभा ने देश के पहले ऐतिहासिक संविधान को जन्म दिया है। यह पहला संविधान है जिसे संविधान सभा ने बनाया है। 2008 में निर्वाचित पहली संविधान सभा को ही यह कार्य संपन्न करना था लेकिन यह संभव नहीं हो सका। फिर 2013 में दूसरी संविधान सभा का चुनाव हुआ और इस बार भी ऐसा लग रहा था कि संविधान नहीं बन सकेगा किंतु विरोधाभासों एवं खून-खराबे के बीच नेपाल के नए संविधान की घोषणा कर दी गई। वामपंथी एवं चर्च समर्थक यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि नेपाल की संविधान सभा की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि तमाम दबावों के बावजूद उसने नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र का दर्जा नहीं दिया और संविधान में ‘धर्म निरपेक्ष’ शब्द को जस का तस रहने दिया गया। पर देखा जाए तो उनकी यह आत्मसंतुष्टि तथा खुशी क्षणिक ही है क्योंकि नेपाल से 'हिंदू राष्ट्र' का तमगा भले ही छीन लिया गया हो किंतु मान्यताओं, परंपराओं व जीवनशैली से नेपाल हमेशा हिंदू राष्ट्र रहेगा। फिर अभी तो संविधान का निर्माण ही हुआ है, संशोधन की प्रक्रिया कभी भी अपनाई जा सकती है।

नेपाल एकमात्र राजनीतिक सत्ता है जहां उच्च जाति के हिंदू सबसे बड़ी संख्या में हैं। वहीं नेपाल में आम जीवन में हिंदुत्व का प्रभाव साफ नजर आता है। आम नेपाली अब भी हिंदू धर्म का पालन करता है। संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र के राष्ट्रपति से लेकर सड़कों पर मौजूद पुलिसकर्मियों व राज्य के अधिकारियों को अपनी हिंदू पहचान प्रदर्शित करने में कोई हिचक नहीं होती। इसके इतर अधिकतर सार्वजनिक अवकाश हिंदू त्यौहारों जैसे दशहरा, दीपावली और रामनवमी पर होते हैं। सरकारी विभाग भी नियमित रूप से कई मंदिरों और पारंपरिक अनुष्ठानों के लिए बजट जारी करते हैं। पशुपतिनाथ का मंदिर हिंदू समाज में बड़ी आस्था का प्रतीक है। नेपाली जनमानस में मां समान पूजी जाने वाली गाय को मारना अब भी कानूनन अपराध है और धर्मांतरण पर न सिर्फ़ ऐतराज़ किया जाता है बल्कि सरकार सक्रिय रूप से इसे हतोत्साहित भी करती है। नए संविधान में भी धर्मांतरण पर पांच साल की जेल का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसके बावजूद मिशनरी संस्थाएं बरगलाने का अपना अभियान निरंतर जारी रखे हुए हैं। देखा जाए तो इस तरह नेपाल नाम के अलावा हर तरह से हिंदू बना हुआ है।

दरअसल हिंदुस्तान में सत्ता परिवर्तन के साथ यह धारणा पुख्ता हुई थी कि नेपाल हिंदू राष्ट्र के अपने दर्जे को बरकरार रख सकता है किन्तु 1962 में हिंदू राष्ट्र और हिंदू राजशाही का संवैधानिक उद्घोष करने के बावजूद नेपाल सदियों से एक सहिष्णु और बहुलतावादी राष्ट्र रहा है जिसे कभी गुलाम नहीं बनाया जा सका। प्रलोभन तथा छल-प्रपंच के बल पर धर्मांतरण की नेपाल में सख्त मनाही थी मगर राजशाही के पतन और माओवादियों के प्रभुत्व वाली सरकार ने सुनियोजित तरीके से विदेशी ताकतों के इशारों पर धर्मांतरण को भी वैध ठहराने की कोशिश की, जिसमें वे कामयाब नहीं हो पाए। आम नेपाली समाज का उन्हें साथ नहीं मिला किंतु धर्मांतरण की कोशिशें वहां अब भी बदस्तूर जारी हैं। मिशनरी गतिविधियों के कारण नेपाल के पारंपरिक बौद्ध एवं शैव हिंदू धर्मावलंबियों के बहुमत वाले समाज में तनाव निर्मित होने लगा है। नेपाल के संविधान में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द का विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि जब विश्व में 40 से अधिक मुस्लिम राष्ट्र एवं 70 से अधिक ईसाई राष्ट्र हो सकते हैं तो नेपाल 'हिंदू राष्ट्र' की अपनी पहचान को क्यों अक्षुण्णए नहीं रख सकता? सोचा जाए तो बात एकदम सत्य है मगर पश्चिमी सहायता और चर्च के बढ़ते प्रभाव ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को खुद के ऊपर निर्भर बना दिया है। नेपाल की आय का मुख्य जरिया पर्यटन के साथ ही अरब देशों से लेकर चर्च के प्रभुत्व वाले देशों से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता भी है, जिसे अब नेपाल नकार नहीं सकता और शायद यही वजह है कि नेपाल को अपने हिंदू राष्ट्र के तमगे को हटाना पड़ा है।

धर्मनिरपेक्ष शब्द के अलावा संविधान के कई प्रावधानों से नेपाली समाज खुश नहीं है। मौलिक अधिकारों के मामले में संविधान कमजोर है। तराई और मधेस क्षेत्रों में संविधान आने से मातम का माहौल है और संविधान के विरोध में जारी हिंसा में 50 से अधिक निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। 37 अध्यायों वाले संविधान के तहत दो सदनों वाली संसद, एक सदन वाली विधानसभा और तीन जिला, प्रांतीय और संघीय स्तर पर तीन स्तरीय न्याय पालिका होगी। प्रांतों के गठन को संविधान की उपलब्धि बताया जा रहा है लेकिन संघीय ढांचे में प्रांत कैसे बनाए जाएंगे इसे लेकर अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है। संविधान में प्रस्तावित सात प्रांतों के नाम और सीमाएं तय करने के लिए आयोग के गठन का प्रावधान है जो नेपाल के बहु-जातीय और भौगोलिक विविधता को देखते हुए बेहद मुश्किल और जटिल काम होगा। दरअसल नेपाल में 100 से ज्यादा जातीय समूह और कई भाषाएं हैं। खास कर नेपाल का मैदानी इलाका जिसे तराई क्षेत्र कहा जाता है, वहां के 22 जिलों में नाराजगी कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही है। तराई के इलाके को मधेश और वहां रहने वाले लोगों को मधेशी कहा जाता है। मधेशी चाहते हैं कि तराई के सारे जिलों को मिलाकर एक प्रदेश या दो प्रदेश बनाए जाएं और उन्हें पहाड़ के जिलों से अलग रखा जाए। लेकिन नेपाल के प्रमुख चार दलों का कहना है कि प्रदेश इस तरह से नहीं बनाया जा सकता कि कहीं सारे संसाधन हों और कहीं कुछ भी न हो। मधेशी इस बात से भी दुखी हैं कि नेपाल पर हमेशा मैदानी इलाके वाले समूहों का आधिपत्य रहा है और उन्हें राजधानी से हमेशा धोखा मिला है। मधेशियों का यह संघर्ष यदि लंबे समय तक चला तो नेपाल में गृहयुद्ध जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं और तब संविधान की भूमिका गौण होना तय है। हो सकता है, नेपाल में पुनः नए सिरे से संविधान को बनाने का कार्य शुरू हो। फिलहाल तो नेपाल की आंतरिक स्थिति पर गौर रखना होगा ताकि अन्य देशों के हित भी प्रभावित न हो। खासकर भारत को नेपाल के प्रति अधिक सतर्क रहना होगा।