Source: न्यूज़ भारती हिंदी22 Sep 2015 11:39:29

आजादी के 68 साल बाद भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रहस्यमायी मौत से पर्दा कोई सरकार नहीं उठा पाई। तीन जांच आयोग बैठे, बावजूद राज अपनी जगह कायम रहा। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन 64 फाइलों को खोल दिया है, जिन्हें लेकर ये आशंकाएं प्रगट होती रही हैं कि इनमें नेताजी की जीवन-मृत्यु के अनसुलझे रहस्यों के सूत्र छिपे हैं। गोया इस पर्दे की उठने की शुरुआत हो गई है। 12,744 पन्नों के इन दस्तावेजों की आरंभिक पड़ताल से ये संकेत तो मिले हैं कि नेताजी 1945 में हुई हवाई दुर्घटना के बाद भी जीवित थे। साथ ही यह जानकारी भी मिली है कि बंगाल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के कार्यकाल में 34 फाइलें नष्ट भी की गई हैं, साथ ही नेताजी के परिजनों की स्वतंत्रता के बाद भी जासूसी होती रही है। इन फाइलों के सार्वजनिक हो जाने के बाद अब केंद्र सरकार पर यह नैतिक दबाव बढ़ गया है कि वह भी उन 134 फाइलों से पर्दा उठा दे, जो केंद्र की गोपनीय सूची व निगरानी में हैं। दरअसल तृणमूल और भाजपा ही इन फाइलों को खोलने का श्रेय ले सकते हैं, क्योंकि बंगाल के वामपंथी दल और केंद्र में लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस तो वही राजनीतिक दल हैं, जो अपनी कमजोरियों के चलते नेताजी की मौत को गोपनीय बनाए रखना चाहते हैं।

नेताजी की मौत की जांच तीन आयोग कर चुके हैं। 1956 में बैठे पहले आयोग के अध्यक्ष शाहनवाज खां थे। दूसरा 19७४ में अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति जीडी खोसला के नेतृत्व में बैठा और 2000 में बने तीसरे आयोग के अध्यक्ष एएन मुखर्जी थे। इन तीनों आयोगों की जांच मौत के संदर्भ में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। तीनों में से किसी आयोग ने ताइहोकू के उस हवाई अड्ढे के आधिकारियों से पूछताछ नहीं की, जहां यह दुर्घटना हुई थी। ताइहोकू को अब ताइवान के नाम से जाना जाता है। दरअसल ताइवान के हवाई आधिकारी इस दुर्घटना का होना ही नहीं मानते हैं। मुखर्जी आयोग लंदन के ब्रिटिश अभिलेखागार में जरूर पहुंचा था, जहां नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े कुछ दस्तावेज सुरक्षित हैं। किंतु अभिलेखागार के आधिकारी ह्यूगतोये और लॉर्ड पीटर आर्चर ने यह कहकर दस्तावेज दिखाने से इनकार कर दिया कि ‘सुरक्षा कारणों के चलते 2021 से पहले नेताजी से जुड़े कोई भी दस्तावेज नहीं दिखाए जा सकते हैं।’ बावजूद यह माना जाता है कि इस रिपोर्ट को संसद के पटल पर जस की तस रख दिया जाता है तो रहस्य के कई सूत्र उद्घाटित हो जाएंगे। क्योंकि यह आयोग अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में बना था। किंतु रिपोर्ट पूरी होने से पहले वाजपेयी सरकार गिर गई थी।

फॉरबर्ड ब्लॉक के सांसद रहे प्रो. मर गुहा ने अपने स्तर पर नेताजी की मौत से जुड़े रहस्यों की गंभीरता से पड़ताल की थी। इस निचोड़ से संबंधित उनकी किताब ‘नेताजी सुभाष जीवित या मृत’ आई थी। यह उनकी अंग्रेजी में लिखी किताब ‘नेताजी सुभाष लाइव एंड डेथ’ का हिंदी अनुवाद थी। किताब में शुरू के दोनों आयोगों के निष्कर्षों की भी समीक्षा की गई है। गुहा कि किताब में यह स्पष्ट है कि कथित हवाई दुर्घटना हुई ही नहीं थी। ताइवान के आधिकारी भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। अब फाइलों से झड़ रही धूल से भी खुलासा हो रहा है कि नेताजी 1947 तक जीवित थे। गुहा ने उन दस्तावेजों का भी अध्ययन किया है, जो 1942 से 1947 तक भारत-ब्रिटिश संबंधों पर रोशनी डालते हैं। इनके अनुसार, ब्रितानिया हुकूमत को अपने गुप्तचरों से पता चला कि जापान सरकार द्वारा 18 अगस्त, 1945 को ताइहाकू में हुई हवाई दुर्घटना में सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु का जो समाचार जारी किया है, वह असत्य है। इन दस्तावेजों में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड वैवल, उनकी परिशद के गृहमंत्री आरएफ मुडी एवं वायसराय के निजी सचिव इवेन जेन्किस की टिप्पणियों में दर्ज चिंता यह जताती है कि ‘आखिर सुभाष कहां छिपे हैं, उन्हें कैसे पकड़ा जाए और उन्हें युद्ध अपराधी ठहराकर कहां मुकदमा चलाया जाए?

समर गुहा के अनूसार, घुरी राष्ट्रों की निर्णायक पराजय के बाद नेताजी बच निकले थे। उन्होंने रूस में शरण ली। लेकिन रूस का रुख उनके प्रति सहनभुति वाला नहीं रहा। लिहाजा उन्हें लगा कि वे एक जाल से निकलकर दूसरे जंजाल में फंस गए हैं। तब उन्होंने नेहरू को एक गुप्त संदेश भेजकर अनुरोध किया कि उन्हें रूस के शिकंजे से मुक्त कराने का उपाय करें। नेहरू महत्वाकांक्षी थे। उनकी सत्ता प्राप्ती की इच्छा को लार्ड माउंट पहले ही जान गए थे। इसलिए उन्होंने नेहरू को सचेत कर दिया था कि सुभाष की भारत वापिसी का अर्थ होगा कि वे अपनी जनता में गहरी लोकप्रियता के चलते भारत के प्रधानमंत्री चुन लिए जाएंगे?

इस कश्मकश से उबरने के उपाय के चलते नेहरू ने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली (जुलाई, 1945 से अक्टूबर, 1991) को एक गुप्त पत्र लिखकर संदेश भेजा। इसका मजमून है, ‘हम जानते हैं कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष बोस को स्टालिन ने रूस की सीमा में प्रवेश की अनुमति दे दी है। यह राजनीतिक शरण देकर रूस ने मित्र राष्ट्रों के आपसी समझौते का उल्लघंन किया है। यह सीधे तौर पर रूस का धोखा है, क्योंकि वह अमेरिका व ब्रिटेन का साथी है। अतः कृपया इसे संज्ञान में लें।’ यह पत्र आसफ अली के घर 26 अगस्त, 1945 को लिखाया गया। इसे टाइप नेहरू के मेरठ के आशुलिपीक श्यामलाल जैन ने किया था। यह रहस्योद्घाटन खुद जैन ने जीडी खोसला आयोग को किया था। इस पत्र की प्रति आयोग की रिपोर्ट के साथ प्रदीप बोस की किताब ‘सुभाश बोस एंड इंडिया टुडे- न्यू ट्राइस्ट विद डेस्टिनी’ में भी दर्ज है। यह छोटा पत्र, बड़े सवाल खड़े करता है। आखिर यह जानकारी नेहरू को किसने दी? क्या यह जानकारी सिर्फ नेहरू के पास थी या उन्होंने इसे गांधी और पटेल के साथ भी साझा किया था? यदि किया था तो इसे क्यों दबाकर रखा गया? हालांकि एक फाइल में दर्ज जानकारी से पता चलता है कि गांधी को नेताजी की मौत पर भरोसा नहीं था। क्योंकि नेताजी की कथित मौत के आठ माह बाद गांधी ने बंगाल में एक प्रर्थना सभा में कहा था कि मुझे भरोसा है नेताजी जिंदा हैं। चार माह बाद उन्होंने एक लेख लिखा था, जिसमें उल्लेख था कि निराधार भावना पर विष्वास नहीं किया जा सकता है।

इन फाइलों के खुलासे के बाद जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस और वामदलों के प्रवक्ता कह रहे है कि नेताजी से जुड़ी फाइलों को गुप्त सूची से हटाना कांग्रेस और भाजपा की मिलीभगत का परिणाम है। यदि देश के एक महानायक की मृत्यु के रहस्य से पर्दा कांग्रेस और तृणमूल मिलकर उठा रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है? अवाम को यह पता चलना ही चाहिए कि एक राष्ट्रप्रेमी की मौत के रहस्य को किन व्यक्तिगत स्वार्थों और राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए दबाया गया? इसलिए अब केंद्र सरकार को भी बिना देर किए उन 134 फाइलों को सार्वजनिक कर देना चाहिए, जो गोपनीयता के दायरे में होने के चलते धूल खा रही हैं। दरअसल कांग्रेस फाइलों में दर्ज तथ्यों से इसलिए परेशान है, क्योंकि इनके जग जाहिर होने से नेहरू की सत्ता लोलपुता और सुभाष के प्रति विद्वेष भाव सामने आएंगे और वामदल इसलिए सकते में हैं, क्योंकि वे उस रूस के निष्ठावान अनुयायी हैं, जिस पर आशंका है कि उसके तानाशाह स्टालिन ने नेताजी को अभानवीय यतनाएं देकर साइबेरिया में मौत के मुकाम तक पहुंचाया। नेताजी की प्रपौत्री राजश्री चौधरी ने कहा भी है कि यदि संसद में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट सम्पादित किए बिना रख दी जाती है तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। भाजपा के लिए मामता ने रास्ता खोल दिया है, लिहाजा वह अवसर का लाभ उठाते हुए फाइलें सार्वजनिक करके अपना चुनावी वादा भी पूरा कर सकती है।