Source: न्यूज़ भारती हिंदी23 Sep 2015 14:28:34

तुफैल अहमद द्वारा लिखित लेख का यह हिंदी अनुवाद है। तुफैल अहमद मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में बीबीसी उर्दू सेवा और दक्षिण एशिया अध्ययन परियोजना के निदेशक, वाशिंगटन डीसी के साथ एक पूर्व पत्रकार हैं।   

सितंबर के दूसरे सप्ताह में ऑस्कर विजेता भारतीय संगीत निर्देशक एआर रहमान और ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी के खिलाफ मुम्बई के बहुचर्चित कट्टर इस्लामी संगठन रजा अकादमी के इशारे पर एक फतवा (इस्लामी डिक्री) जारी किया गया। फतवा जारी करने का कारण था उनकी फिल्म “भगवान के दूत” (मेसेंजर ऑफ़ गॉड)। फतवे में इन दोनों को “काफिर” घोषित करते हुए कहा गया कि “यह पैगंबर (मुहम्मद) पर फिल्म बनाने जैसा अपराध है।” इस प्रकार के फतवे आम मुसलमान के जीवन में विशेष महत्व रखते हैं, तथा इनका महत्व क़ानून से कहीं अधिक होता है। इस फतवे में जो सन्देश छुपा है, वह नादानों को भी समझ में आ सकता है। सन्देश साफ़ है और वह है “मौत”।

रजा अकादमी के सईद नूरी ने रहमान और अन्य से माफी मांगने को कहा है। लेकिन हैरत की बात यह है कि 14 सितंबर को, वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी अपने ट्वीट में कहती हैं कि “रजा अकादमी” एक अनजान सी इकाई है। ट्वीट इस प्रकार है -

Who had heard of Reza foundation before they came up with an opinion on a.r.rahman? This is how fringe nonentities get traction

— Saba Naqvi (@_sabanaqvi) September 14, 2015 ">

(एआर रहमान पर राय देने से पहले कथित “रजा फाउंडेशन” का नाम किसने सूना था? यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे अनजान सी इकाई मशहूर हो जाती है।)

सच कहा जाए तो इस ट्वीट में राजा एकादमी को टार्गेट करने के स्थान पर उन लोगों पर निशाना साधा गया है, जो उसकी आलोचना कर रहे हैं। इसके जबाब में उसी दिन अर्थात 14 सितम्बर को ही प्रमुख टीकाकार स्वपन दासगुप्ता ने एक ट्वीट के माध्यम से सबा नकवी को याद दिलाया कि “रजा अकादमी” हिंदू-मुस्लिम राजनीति का विशेषज्ञ एक प्रसिद्ध संगठन है और वह उसे भली प्रकार से जानती हैं। उन्होंने ट्वीट में लिखा :

“It is sad that as an ‘expert’ on communal politics you haven’t heard of Raza Foundation...”

(यह दुखद है कि सांप्रदायिक राजनीति की आप जैसी ‘विशेषज्ञ’ ने रजा फाउंडेशन के बारे में नहीं सुना...)

रजा फाउंडेशन भी वही है जो रजा अकादमी है। राजा अकादमी आधिकारिक नाम है। सबा नकवी और स्वपन दासगुप्ता के ये ट्वीट्स जो ध्वनित करते हैं, वह कुछ इस प्रकार हैं -

भारत में अमर्त्य सेन मॉडल के पत्रकारों की एक अर्ध शिक्षित बौद्धिक वर्ग प्रशिक्षित हुआ है, जो महत्वहीन अतिवादी हिंदूओं के बयानों को महत्व देकर उन्हें चर्चा का केंद्र बिंदु बनाए रखना पसंद करते हैं, जबकि देश के क़ानून को चुनौती देने वाले रजा अकादमी जैसे हार्ड कोर इस्लामी संगठनों को अनजानी संस्था घोषित करते हैं।

सबा नकवी, स्वपन दासगुप्ता के ट्वीट की अवहेलना करते हुए अपनी उसी लाइन पर आगे बढ़ी और दो दिन बाद 16 सितंबर को, फिर ट्वीट किया :

“सोशल मीडिया पर रजा फाउंडेशन जैसी महत्वहीन संस्थाओं को महत्व देकर उन्हें मजबूत बनाया जा रहा...”

सबा नकवी जानबूझकर रजा अकादमी को एक अनजान और महत्वहीन इकाई बताने के अपने तर्क पर कायम है। जबकि अगस्त, 2012 में भारत के राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने अपने पहले पृष्ठों पर तस्वीरों और रिपोर्टों के माध्यम से प्रसारित किया था कि किस प्रकार इस इस्लामी गुट ने मुंबई में हिंसा का तांडव किया था। जिसकी वजह से दो लोग मारे गए थे, लगभग चार दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए थे और मीडिया वैन सहित लाखों की सार्वजनिक संपत्तियों नष्ट हुई थीं।

हम कैसे विश्वास करें कि सबा नकवी इन बातों से भी अनजान हैं कि कैसे उस समय रजा अकादमी और समान विचारधारा वाले समूह मदीनातुल उलूम फाउंडेशन पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के कारण 2.74 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय को भी व्यापक रूप से समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया था।

अज्ञानी होना कोई बुराई नहीं है, लेकिन अज्ञानी होने का नाटक जानलेवा हो सकता है। सबा नकवी तर्क की जिस लाइन पर हैं, उसमें तीन संभावनाएं हो सकती हैं।

एक तो यह संभव है कि वे सच में देश के समाचार पत्र नहीं पढ़तीं। दूसरी संभावना यह कि भारतीय पत्रकारिता में कोई ईमानदारी शेष नहीं बची और तीसरी यह कि उनका उदारवाद उन्हें जमीनी हकीकत को देखने से रोक रहा है।

आज के वातावरण में उदारवाद का अर्थ है भगवा का विरोध – और सामान्यतह सबा नकवी जैसों के लिए यह तीसरा तर्क ही सत्य है। जॉर्ज ऑरवेल ने उदार पत्रकारों की चर्चा करते हुए अपनी “एनिमल फार्म” की प्रस्तावना में लिखा है:

“कोई भी बुद्धिमान आलोचना पसंद नहीं करता। ईमानदारी से कहा जाए तो सामान्यतः उदार लेखक और पत्रकार भी अपनी राय झूठ सिद्ध होते देखना पसंद नहीं करते। भले ही इससे उनका कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है।”   

अगस्त, 2012 की हिंसा कोई अपवाद नहीं है। सईद नूरी और रजा अकादमी के अन्य नेताओं ने कानून का पालन करनेवाले नागरिकों को भयभीत करने के लिए फतवे को राजनीति उपकरण के रूप में उपयोग करने का निर्णय किया, साथ ही क्षमा याचना की मांगकर एक कट्टर धार्मिक बढ़त हासिल कर ली। 2012 में, सईद नूरी ने जयपुर साहित्य महोत्सव में भाग लेने आनेवाले सलमान रुश्दी को जूता मरने वाले को एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी। उसके बरेलवी अनुयायियों के लिए “जूते” का संदर्भ तो महज एक संकेत था; मुख्य लक्ष्य था जयपुर में रुश्दी की हत्या करना।

यदि कोई आउटलुक पत्रिका से प्रसिद्धि प्राप्त सबा नकवी को नहीं जानता तो उसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित 17 जनवरी, 2012 की सम्पादकीय टिप्पणी पढ़ना चाहिए, जिसमें लिखा है:

“जयपुर साहित्य महोत्सव में भाग न लेने के रुश्दी के फैसले से गलत संकेत जाएंगे। इससे यह आभास मिलेगा कि सरकार अपने देश में जन्मे एक लेखक को यह विश्वास दिलाने में असफल रही कि उसे अपनी जन्मभूमि आने में कोई भय नहीं है।...परिणामतः यह प्रतीत होगा कि भारत एक नरम राज्य है, जिसे आसानी से दबाव के आगे झुकाया जा सकता है।”

तो ऐसी हिंसक मानसिकता वाला हत्यारा समूह रजा अकादमी, जिसने कई दशकों पूर्व के रुश्दी प्रकरण के गढे मुर्दे को दुबारा उखाड़ दिया और सवा नकवी कहती हैं कि उन्होंने उसके विषय में कुछ नहीं सुना?  रुश्दी की पुस्तक “द सैटेनिक वर्सेज” पर राजीव गांधी की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था।

हाल के वर्षों में, रजा अकादमी नियमित रूप से विरोध प्रदर्शन के आयोजनों द्वारा कानून का पालन करने वाले व्यक्तियों और समूहों के खिलाफ फतवे देती रही है। ऐसा लगता है कि वह भारत के स्वयंभू पुलिसकर्मी है। उन्होंने उदार बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था।

मौलवी हसन रजा खान बरेलवी ने तस्लीमा नसरीन के खिलाफ पुलिस मुक़दमा दर्ज कराया तो दिसंबर 2013 में राजा अकादमी के नेता सईद नूरी ने बरेली शहर में उर्स के दौरान उसे सम्मानित किया।

एक 30 दिसम्बर, 201`3 की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नूरी के चाचा और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के मुखिया तौकीर रजा खान ने तसलीमा नसरीन का सिर लाने वाले को 5 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी।

तो रजा अकादमी कैसे सामान्य और तुच्छ है?

सईद नूरी द्वारा रजा अकादमी की स्थापना 1978 में की गई, तथा यह सुन्नी इस्लाम के बरेलवी स्कूल के अंतर्गत आता है। बरेलवी स्कूल का प्रारम्भ इस्लामी धर्मशास्त्री अहमद रजा खान (14 जून,1856 – 28 अक्टूबर,1921) ने किया। इस स्कूल के मौलवियों की राय भी इस्लामी राज्य (आईएसआईएस) के जिहादियों जैसी ही है, जिन्होंने फ्रांसीसी पत्रिका चार्ली हेब्दो पर हमला किया था। आईएसआईएस और अल-कायदा के समान ही बरेलवी मौलवी भी शिया समुदाय को काफिर मानते हैं।

जानकारी के अनुसार सबा नकवी भी उत्तरी भारत से ही हैं। अतः वह बरेलवी आन्दोलन से सुपरिचित ही होंगी, जिसकी की रजा अकादमी सिर्फ एक संस्था है। बरेलवी नियंत्रित संस्थाएं भारत के अनेक शहरों और गांवों में मौजूद हैं, और साथ-साथ दर्जनों देशों में भी। बरेलवी आंदोलन दावत-ए-इस्लामी, का भी प्रतिनिधित्व करता है, जिसके सदस्य मलिक मुमताज कादरी ने जनवरी 2011 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के उदार राज्यपाल सलमान तासीर की इसलिए हत्या कर दी थी, क्योंकि वह इस्लामी ईशनिंदा कानून में सुधार की वकालत करते थे। ताहिर-उल-कादरी सहित बरेलवी मौलवियों ने इस बरेलवी हत्यारे की निंदा से परहेज किया।

12 अगस्त, 2012 को पत्रकार रीतिका सुब्रमण्यम ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि रजा अकादमी ने भारतभर में 32 केंद्र स्थापित किए हैं। सुब्रमण्यम की रिपोर्ट के मुताबिक, रजा अकादमी द्वारा विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करने के लिए लिखित संदेश, फेसबुक पोस्ट और ईमेल का उपयोग किया जाता है।

रजा अकादमी दुनियाभर में फैले बरेलवी संस्थानों में से सिर्फ एक नेटवर्क है। इन संस्थाओं का प्रारम्भ उत्तर प्रदेश में बरेली के शहर से हुआ, जो भौगोलिक दृष्टि से सबा नकवी के नजदीक हैं, अतः स्वाभाविक ही वह हमारे धार्मिक और सार्वजनिक जीवन में उनके बढ़ते प्रभाव को समझती है।

रजा अकादमी और उसके बन्धु संस्थान पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, स्पेन, हॉलैंड और दूसरे कई देशों में मौजूद हैं।

हो सकता है सबा नकवी रजा अकादमी की अंतरराष्ट्रीय ताकत से अनजान हो, लेकिन बिना जाने उसे अनजान और महत्वहीन कैसे बता रही है? स्वपन दासगुप्ता ने उसे सबूतों के साथ याद भी दिलाया, किन्तु वह उसकी उपेक्षा कर अपने मत पर जिद्द से अड़ी हुई है।

हरे-भरे अपार्टमेंट में रहनेवाले और वातानुकूलित कारों में यात्रा करनेवाले हमारे लिबरल-वामपंथी लेखक अक्सर जमीनी हकीकत को समझने में विफल है। यह बताना प्रासंगिक है कि सबा नकवी सुन्नी नहीं है, अतः शायद वह अधिकांश सुन्नी मुसलमानों पर बरेलवी मौलवियों के विशाल प्रभाव को नहीं समझती।

सबा नकवी को रजा अकादमी जैसे इस्लामवादियों से कोई नुकसान नहीं है, अतः वह उन्हें सामान्य और तुच्छ बता रही है, और इस तथ्य की भी उपेक्षा कर रही है कि ये लोग देश का कानून अपने हाथों में ले रहे हैं। दुष्टता भी एक विचार के रूप में इस्लामवादियों के सामाजिक जीवन में स्वीकार्य हैं।

उसकी ट्विटर टाइम लाइन पर दिखाई देता है कि सऊदी अरब पर लिखे गए एक वाक्य को लेकर उसकी आलोचना हुई। 16 सितम्बर को लिखा गया वह वाक्य था – “Post [the] piece on Saudi Arabia [I am] being told I am Shia first.”

The Bhakts harp on Muslim identity. Post piece on Saudi Arabia being told I am Shia first. i am just an individual and citizen of India.

— Saba Naqvi (@_sabanaqvi) September 16, 2015 ">

स्विस मनोचिकित्सक कार्ल जंग ने लिखा है कि “मानव मन सतर्कता से स्वयं को देखने से रोकता है।” जैसा कि उसने जोर देकर बताया कि वह एक शिया है (और यह उसकी कोई गलती नहीं है) किन्तु उसके बाद से स्वाभाविक ही बौद्धिक जगत में चर्चा शुरू हो गई कि वह सुन्नी सउदी की आलोचना इसलिए कर रही है, क्योंकि वह शिया है। या कि क्या वह शिया ईरान की भी आलोचना करेगी, क्योंकि ईरान में भी सार्वजनिक रूप से अनेक लोगों का ठीक वैसे ही सिर कलम किया गया, जैसे कि आईएसआईएस करती रही है। इस वर्ष ईरान में लगभग 700 लोग इसी प्रकार मारे गए हैं।

कुछ हद तक इस संदर्भ में, पत्रकार ब्रेट स्टीफंस ने हाल ही में लिखा है : “उदार लोकतंत्र जनता को संस्थाओं, तरीकों और जीवन मूल्यों के बारे में शिक्षित करने में विफल है, और इस प्रकार उन्होंने खुद को खतरे में डाल दिया है।”

हमारे युवाओं को सभी किस्मों के चरमपंथियों के खिलाफ बोलकर भारतीय गणतंत्र की रक्षा करनी चाहिए। पत्रकारों को भी उसी कड़ाई से उग्रवादी मुस्लिम नेताओं का बौद्धिक सफाया करना चाहिए जितनी निर्दयता से वे “अतिवादी” हिंदुओं का करते हैं। होता यह है कि बौद्धिक अर्द्ध शिक्षित अमर्त्य सेन मॉडल के सदस्य जब भी कोई अतिवादी हिंदू बयान जारी करे, घर की छत पर चढ़कर बोलते हैं। ठीक है बोलें, किन्तु रजा अकादमी जैसे इस्लामवादियों का कई प्रकार से समर्थन करते हैं। जैसे सीधे कमेन्ट से बचते हैं, उन्हें अनदेखा करते हैं, उन्हें लिप सर्विस देते हैं, उन्हें छोटा और अप्रासंगिक बताकर इसके लिए लंबा विचार विमर्श चलाते हैं कि कैसे ये अप्रासंगिक और तुच्छ हैं, उन्हें सामान्य ढंग से लेकर, और यह तो उनका पंथ है बताकर उन्हें मुख्य धारा में सहन कर।