Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Sep 2015 13:02:59

हार्दिक पटेल को गुजरात सरकार ने हिरासत में लिया और रिहा भी कर किया। बिना अनुमति के वह अपने साथियों के साथ एकता यात्रा निकाल रहे थे। हालांकि पहले उनने इसे उल्टा दांडी मार्च नाम दिया था। यानी गांधी जी ने नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती से दांडी तक मार्च किया था तो ये दांडी से साबरमती तक की यात्रा निकालना चाहते थे। बाद में इसकी आलोचना हुई तो नाम बदलकर एकता यात्रा नाम दे दिया। समस्या यह पैदा हो गई थी कि इनकी एकता यात्रा के विरोध में प्रतिकार यात्रा निकालने की घोषणा कर दी गई। एक ओर सूरत से पाटीदार अनामत आंदोलन समिति की यात्रा हार्दिक के नेतृत्व में तो ओबीसी एकता मंच के बैनर से भी सैंकड़ों गांवों के लोगों ने प्रतिकार यात्रा निकालने की घोषणा कर दिया था। इससे टकराव की संभावना उत्पन्न हो गई थी। एक ओर हार्दिक की एकता यात्रा पटेलों के आरक्षण के लिए या आरक्षण समाप्त करने के लिए होती तो दूसरी ओर आरक्षण को बचाने तथा किसी और को आरक्षण में हिस्सा न देने के लिए यात्रा निकलती। कहीं न कहीं इनमे टकराव अवश्य होता। इसलिए दांडी से प्रस्तावित 350 कि. मी. की एकता यात्रा को नवसारी जिला प्रशासन ने मंजूरी नहीं दी थी। तो हार्दिक के साथियों ने करीब नौ बजे सूरत के वाराछा विस्तार के मानगढ़ चौक से इसे शुरू करने का प्रयास किया था। उन्होंने वहां बनी सरदार पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया था। उसके बाद उन्हें हिरासत में लिया जाना ही सर्वथा उचित कदम था। हार्दिक की रैली के बाद जैसी हिंसा हुई वह गुजरात के लिए शर्मनाक क्षणों में से एक था। फिर उसी तरह की दूसरी हिंसा कोई नहीं चाहेगा। दो समानांतर यात्राओं के कारण टकराव और संघर्ष अवश्यंभावी था। हार्दिक का जो रवैया है उसमें यह खतरा आगे भी बना हुआ है।

सवाल यह है कि आखिर हार्दिक इस तरह का दुराग्रहपूर्ण रवैया क्यों अपना रहा है? पहले यह सोचिए कि एक 22 वर्ष का नवजवान, जिसके पास केवल एक जाति के लिए आरक्षण मांगने के अलावा और कोई सोच नहीं है, जो युवा पीढ़ी को कोई प्रेरणा नहीं देता, जिसकी कोई लोबिंग भी दिल्ली में नहीं दिखती उसकी एक-एक गतिविधि को मीडिया के एक वर्ग में इतना महत्व क्यों मिलता है? बाजाब्ता उसका एक-एक घंटे का इंटरव्यू चलता है। उसे टेलीविजन शो में बुलाकर इस तरह प्रश्न पूछे जाते हैं ताकि वह इस देश का कोई महान विभूति हो। उसमें भी इस तरह कार्यक्रम रहता है ताकि वह अपनी बात पूरी तरह रखे और उसका प्रचार हो। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के एक सदस्य पिछले दिनों मिले थे। उनने बताया कि उन्हें एक चैनल पर गुजरात पटेलों के आरक्षण पर बोलने के लिए बुलाया गया था। लेकिन वहां एंकर, जो जाने हुए पत्रकार हैं, ने कहा कि हमने यह शो हार्दिक को प्रोमोट करने के लिए आयोजित किया है इसका ध्यान रखिए। यही काम कुछ चैनल अरविन्द केजरीवाल के साथ करते थे। लंबे समय तक उनके सारे झूठ, पाखंड और आडम्बर को राजनीतिक क्रांति की धारा बनाकर पेश किया जाता रहा। ठीक यही हार्दिक के साथ करने की कोशिश हो रही है। चूंकि वह एकमात्र एजेंडे पर चल रहा है, इसलिए इनके पास बहुत ज्यादा दिखाने और बताने के लिए नहीं है।

मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए यह एक सिद्वात है और मान्य है। मीडिया निष्पक्ष न हो पक्षधर या सापेक्ष हो यह भी अमान्य नहीं है। लेकिन यह मान्य तभी होगा जब पक्षधरता का कुछ नैतिक और जन सरोकारी हेतु हो। यहां तो केवल भाजपा विरोध के कारण ऐसा किया जा रहा है। भाजपा के विरोध में भी कोई समस्या नहीं है। पत्रकार भी एक नागरिक है और उसे लगता है कि भाजपा की विचारधारा या कर्तृत्व देशहित में नहीं है तो उसे मान्य तरीकों से विरोध करना चाहिए। किंतु यहां दिक्कत अंधविरोध की है। यहां सोच यह है कि किसी ढंग से भाजपा को क्षति पहुंचाओ। किसी तरह नरेन्द्र मोदी को डिस्टर्ब करो। उसके लिए जो भी मोहरा मिल जाए उसका उपयोग करो। इस समय हार्दिक मिल गया। 25 अगस्त की अहमदाबाद रैली के पूर्व ही उसे इतना प्रचारित प्रसारित कर दिया गया था कि वह पटेल समाज में हीरो बन चुका था। देश में ऐसे अनेक आंदोलन चल रहे हैं। स्थानीय स्तरों पर नवजवान समाज के लिए बेहतर काम कर रहे हैं। उन आंदोलनों के पीछे सिद्वांत भी है। किंतु हमारी मीडिया के ये लोग उन्हें कभी हीरो नहीं बनाते। उनकी ओर झांकने तक की भी जहमत नहीं उठाते। क्यों?

ऐसे दोहरे व्यवहार का सवाल तो उठेगा। मीडिया की भूमिका हार्दिक में मामले में ऐसी होनी चाहिए थी ताकि वह जातिवाद का दंश पैदा करने को लेकर हतोत्साहित हो। उसके लोगों ने जो हिंसा किया उसकी पूरी निंदा होनी चाहिए थी। लेकिन कुछ चैनलों का स्वर इसके विपरीत था और है। अगर मीडिया के कुछ लोगों ने सुनियोजित तरीके से हार्दिक को प्रचारित नहीं किया होता तो वह ऐसी स्थिति में पहुंचता नहीं। 19 सितंबर को तो वैसे भी हार्दिक के साथ यात्रा में लोग नहीं थे। एक दूसरी यात्रा में भी इतनी ही संख्या थी। किंतु इसे कुछ चैनलों ने पूरा कवरेज दिया। इसके विपरीत ओबीसी मंच के संयोजक अल्पेश ठाकोर ने कहा कि अगर पास की यात्रा निकलती, तो वे काले झंडो के साथ अपनी प्रतिकार यात्रा निकालते, उसे महत्व नहीं दिया गया। दोनों अपनी-अपनी जगह गलत थे। लेकिन एक को पूरा कवरेज और दूसरे को नजरअंदाज करने की भूमिका को क्या कहेंगे? 

तो यहां मीडिया के एक वर्ग की भूमिका अत्यंत खतरनाक है। भाजपा के अंधविरोध में इस सीमा तक जाना कि एक नासमझ नवजवान को इतना बड़ा हीरो बना देना कि वह संकीर्ण जातिवाद को पूरे गुजरात में फैलाने तक का कद पा जाए, ऐसी घृणित हरकत है जिसकी निंदा की जानी चाहिए। ऐसा हो रहा है। इनको लगता है कि यदि गजरात में हार्दिक को हीरो बना दिया, उसने पटेल समुदाय को साथ लेकर वहां अस्थिरता पैदा कर दी, गुजरात सरकार इसे संभालने में सफल नहीं हो पाए, या इतना बवाल हो जाए कि सरकार के लिए संभालना मुश्किल हो जाए, वह कड़ी कार्रवाई करे तथा पटेल समुदाय उसके खिलाफ हो जाएगा और सत्ता उसके हाथ से निकल जाएगा। गुजरात में भाजपा के हाथो से सत्ता का खिसकना नरेन्द्र मोदी के लिए बहुत बड़ा आघात होगा। तो जो कार्य गुजरात दंगों के बारे में दुष्प्रचार करके हम नहीं कर पाए वह शायद हार्दिक के बहाने हो जाए। तो यह है हार्दिक को प्रोमोट करने के पीछे की सोच।

हालांकि भाजपा की अपनी समस्या है। भाजपा के ज्यादातर नेता ऐसा मान चुके हैं कि नरेन्द्र मोदी के रहते कोई संकट पार्टी पर आ ही नहीं सकता। कुछ नेता तो इस तरह व्यवहार करते हैं मानो इस देश में स्थायी शासन करने का उनको लाइसेंस मिल चुका है। इस सोच में ऐसे-ऐसे लोगों को पार्टी पदाधिकारी बनाया जा रहा है, चुनाव में उम्मीदवार बनाया जा रहा है, सरकारी पदों पर बिठाया जा रहा है जिनमें से अनेक निहायत ही अयोग्य, अनैतिक और बेईमान हैं। वे न मीडिया के कुछ लोगों की ऐसी चालाकी को समझ पाते हैं और जब समझ ही नहीं पाते तो इसका जवाब क्या दे पाएंगे। अगर कोई समझाने जाता है तो उसे इस तरह लेते हैं मानो उसकी बात सुनकर उनने अहसान किया है और बताने वाला निराश होकर लौटता है। एक अजीब किस्म के अहं में भाजपा के अनेक नेतागण जी रहे हैं। यह भी खबर थी कि आरंभ में भाजपा के ही कुछ लोगें ने आनंदीबेन पटेल का विरोध करने के लिए पाटीदार अनामत आंदोलन समिति को प्रोत्साहित किया। क्या उसकी जांच करने की कोशिश हुई? क्या मीडिया क्यों उसे इतना प्रचारित कर रहा है इसे कभी समझने की कोशिश हुई?

नहीं। हो भी नहीं सकती। दुर्भाग्यवश, ये उन्हीं लोगों को सम्मान भी देते हैं जो इनके खिलाफ साजिश रचते हैं। तो फिर परिणाम यही आना है। किंतु यह केवल भाजपा का प्रश्न नहीं है। हार्दिक जैसा जातीय विष से भरा हुआ नवजवान यदि किसी समुदाय का हीरो बन जाता है तो इससे एक खतरनाक प्रवृत्ति पैदा होती है। आनंदीबेन पटेल कहतीं हैं कि अब बहुत हुआ, हम गुजरात में अस्थिरता नहीं आने देंगे। तो आज तक हार्दिक को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? जो कुछ हिंसा हुई उसके पीछे मूल शख्स तो वही था। गुजरात सरकार न्याय करने से डर क्यों रही है? उसका यह डर ही हार्दिक जैसों का मनोबल बढ़ा रहा है और मीडिया के कुछ लोगों को उसके माध्यम से अपना एजेंडा चलाने का अवसर दे देता है। ऐसा न हो कि कल वह इतना बड़ा बन जाए जिसके खिलाफ कार्रवाई करना ही कठिन हो जाए।