Source: न्यूज़ भारती हिंदी27 Sep 2015 18:09:01

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक ने आरक्षण के संबंध में पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि किन लोगों को और कितनों दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी समिति में राजनीतिज्ञों से ज्यादा सेवाभावियों का महत्व होना चाहिए। इसके पहले जयपुर में स्तम्भ लेखकों के एक कार्यक्रम में 13 सितम्बर को एक सवाल के जबाब में उन्होने कहा था कि यहां जो आरक्षण के नाम पर सब कुछ चल रहा है वह आरक्षण के नाम पर राजनीति है। इसलिए जिनका अपना कोई निहित स्वार्थ न हो ऐसे लोगों की एक कमेटी बने- जो यह तय करे कि सचमुच किनको आरक्षण की जरूरत है, और वह कितने समय तक मिलना चाहिए। जैसा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है तदनुसार उनका मानना था कि क्रीमीलेयर को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि आरक्षण मात्र उन व्यक्तियों को मिल रहा है जो संगठित है, असंगठित लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। श्री भागवत का यह कहना था कि सचमुच में आरक्षण की राजनीति कर रहे नेताओं को जैसे बैठै-बैठाए मौका मिल गया।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण नीति में यदि मोदी सरकार ने कोई छेड़छाड़ की तो पार्टी देशभर में आंदोलन करेगी, क्योंकि आरक्षण संबैधानिक व्यवस्था है। मायावती ने यह भी कहा कि मोहन भागवत के बयानों से दलित समाज नाराज है। फिलहाल मुददाविहीन, प्रमाणित घोटालेबाज और विशुद्व जाति की राजनीति करने वाले लालू यादव भला इस मौके पर कब चूकने वाले थे? उन्होंने कहा, आरएसएस, बीजेपी आरक्षण खत्म करने का कितना भी सुनियोजित माहौल बना लें, देश का 80 प्रतिशत दलित, पिछड़ा, इनका मुंहतोड़ करार जवाब देगा। उन्होंने तो यहां तक कहा कि तुम आरक्षण खत्म करने की बाते कहते हो हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। अगर किसी ने मां का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाए। बिहार विधानसभा को चुनावो को दृष्टिगत रखते हुए भला नीतीश कुमार कब चुप रहने वाले थे? उन्होंने बीजेपी पर आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुसरण करना ही है जो कि उसका सुप्रीम कोर्ट है।

अब उपरोक्त बातों के परिपेक्ष्य में यह देखे जाने भी जरूरत है कि श्री भागवत और उपरोक्त नेताओं की बातों में कितना औचित्य है। उपरोक्त नेताओं के अनुसार जैसे श्री भागवत आरक्षण समाप्त करने के पक्षधर हों। पर यह बात पूरी तरह गलत है क्योंकि श्री भागवत ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा कि आरक्षण व्यवस्था खत्म कर दी जानी चाहिए। उन्होंने तो मात्र इसकी समीक्षा करने की बात कही, ताकि इसका दुरूपयोग बंद हो, और सचमुच जरूरत मंदों को आरक्षण का लाभ मिल सके। मायावती कहतीं हैं कि आरक्षण संवैधानिक व्यवस्था है इसलिए इस पर छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि डॉ. आम्बेडकर ने संविधान में मात्र दस वर्षों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। ऐसी स्थिति में यदि श्री भागवत यह कहते हैं कि आरक्षण की समय-सीमा तय होनी चाहिए तो इसे कतई अनुचित नहीं कहा जा सकता। संविधान निर्माताओं का ऐसा आशय नहीं था कि आरक्षण को स्थाई व्यवस्था बना दिया जाए। इसके अलावा यदि इन नेताओं की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति इनती निष्ठा है तो संविधान में पिछडी कही जाने वाली जातियों के लिए तो आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी। बड़ी बात यह कि संविधान कोई जड़ व्यवस्था नहीं बल्कि किसी राष्ट्र का जीवंत दस्तावेज होता है, बदली परिस्थितियों के अनुसार किसी भी व्यवस्था पर सार्थक बहस और समीक्षा यदि नहीं होगी तो उससे समाज की गतिशीलता निस्संदेह प्रभावित होगी।

हमारे यहां इसलिए हमारे देश में शास्त्रार्थ का प्रावधान था और यह कहा गया है कि - वादे-वादे जायते तत्वबोधे। बड़ा सवाल यह कि इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि वर्तमान दौर में इस आरक्षण व्यवस्था का भयावह दुरूपयोग हो रहा है। जब गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट, और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की लाइन पर खड़े हो, तो समझा जा सकता है कि अब आरक्षण अपनी मूल भावना से भटक कर बंदरबाट का पर्याय हो गया है। इतना ही नहीं मंडल कमीशन के नाम पर जिन पिछड़ी  जातियों को आरक्षण दिया गया है उसमें भी उसका लाभ अधिकतर यादव और कुर्मी जैसी संगठित जातियों को ही मिल रहा है। बाकी सचमुच की पिछड़ी और असंगठित जातियों तो सिर्फ बेवश हो कर यह देख रही है। उदाहरण के लिए नाई, कहार, लोहार और बढई जैसी जातियों को ले लिया जाए, क्योंकि एक तो यह संख्या में कम है या कि सचमुच पिछड़ी हैं और असंगठित हैं। इसलिए आरक्षण की मलाई पिछड़ों में अगडी एवं संगठित जातियां खा रहीं है। अनुसूचित जातियों में भी कहीं न कहीं यही स्थिति है क्योंकि इसका सबसे ज्यादा लाभ मायावती के सजातीय ही ले रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि आखिर में मायावती, लालू यादव या नीतीश कुमार को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? यह किस बात में पिछड़े हैं? हकीकत यह है कि पता नहीं कितने अगाड़ी जाति के कहे जाने वाले इनकी कृपा के लिए इनके पीछे घूमते रहते हैं। इस तरह से जो मुख्यमंत्री हो गये, संसद-विधायक हो गये, जो प्रथम श्रेणी का शासकीय सेवक हो गया उसे आरक्षरण क्यों मिलना चाहिए यह बडा प्रश्न है?

ऐतिहासिक सत्य है कि ब्रिटिश राज के दौर में 1921 में विभिन्न जाति सभाओं ने प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें ऊंची जाति में शामिल करने का आग्रह किया गया था। जैसे अहीरों का कहना था कि वस्तुतः वह यादव क्षत्रिय हैं। जाट अपने को जदुवंशी ठाकुर होने का दावा कर रहे थे। इसी तरह से बंजारों का कहना था कि वह चौहान राजपूत है तो गूजर भी अपने को क्षत्रिय बता रहे थे। गडरिया अपने को पाल राजपूत कह रहे थे तो चमार-जाटव भी अपने को राजपूत कहलाने का दावा कर रहे थे। इसमे कुछ गलत भी नहीं था क्योंकि मुस्लिम काल में जब कई क्षत्रिय जाति के लोगों ने तलवार छोड़कर दूसरे पेशे जीवन यापन के लिए अपना लिए या मजबूरन उन्हें अपनाना पड़ा- तो वह तथाकथित छोटी जातियों में गिने जाने लगे। कहने का आशय यह कि जब तक आरक्षण की मारा मारी नहीं थी तो अधिकांश जातियां अपने को उच्च जातियों में शामिल करना चाहती थीं। पर आरक्षण की मारा-मारी के चलते संपन्न और अगड़ी जातियां भी अपने को पिछड़ी साबित करने पर तुली हैं। आरक्षण की इस दौड़ में शामिल होने की होड़ के चलते 1950 में अनुसूचित जातियों की जो संख्या 1208 थी वह बढ़कर 2011 तक 1241 हो जाती है। इसी तरह से अनुसूचित जनजातियों की संख्या 664 से 705 हो जाती हैं, पिछड़ी जातियों भी 1257 से 5013 हो जाती हैं।

यह सब बातें तो अपनी जगह पर हैं पर लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे लोग जो अपने को जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुयायी कहते हैं। जो कि जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की बात करत थे- आखिर में उनके यह तथाकथित अनुयायी इस तरह की विशुद्व जाति की राजनीति पर क्यों आमादा हैं? असलियत यह है कि इन नेताओं के पास न तो कोई सिंद्धात बचा है और न कोई मुद्दे बचे हैं। मोदी के विजय रथ के बढ़ते इनके समक्ष अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए जाति ही इनका एकमात्र सहारा है। तभी तो लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ जाति आधारित गणना के आंकड़े जारी करने के लिए अनशन तक करते हैं। बड़ी बात यह कि इस आरक्षण व्यवस्था का सबसे ज्यादा लाभ भी ऐसे लोग ही ले रहे हैं और यदि किसी किस्म की समीक्षा होगी तो ऐसे लोग निश्चित ही आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे। इसीलिए अपनी बोट बैंक की राजनीति और निहित स्वार्थों की सुरक्षा के लिए ये नेता एक सार्थक एवं सामयिक  विचार पर हंगामा बरपा कर जातीयता के घनचक्कर में समाज को बांटने पर आमादा हैं। तभी तो लालू यादव बिहार में जो उम्मीदवार देते हैं उसमे सभी शर्मो-हया छोडकर 101 में 48 सजातीय होते हैं। इनके लिए यही कहा जा सकता है – बेचारे : जाति के सहारे।