Source: न्यूज़ भारती हिंदी03 Sep 2015 18:58:54

खमरछठ (हलषष्ठी) यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जानेवाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग हर जाति में बहुत ही सदभावपूर्वक मनाया जाता है। हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखती है।

इस दिन माताएं सुबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान कर व्रत धारण करती हैं। भैस के दुध की चाय पीती हैं तथा दोपहर के बाद घर के आंगन में, मंदिर-देवालय या गांव के चौपाल आदि में बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर, उसमें जल भरते हैं। सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार में बेर, पलाश, गूलर आदि पेड़ों की टहनियों तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते हैं। सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मूर्ति (भैस के घी में सिन्दुर से मूर्ति बनाकर) उनकी पूजा करते हैं। साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते हैं तथा हलषष्ठी माता के छह कहानी को कथा के रूप में श्रवण करती हैं।

इस पूजन की सामग्री में पचहर चांउर (बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल), महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैस का दूध - दही व घी आदि रखते हैं। बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा, बाटी आदि भी रखा जाता है। बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में गेडी (हरियाली त्योहार के दिन बच्चों के चढ़ने के लिए बनाया जाता है) को भी सगरी में रखकर पूजा करते हैं क्योंकि गेडी का स्वरूप पूर्णतः हल से मिलता जुलता है तथा बच्चों के ही उपयोग का है।

इस व्रत के बारे में पौराणिक कथा यह है कि वसुदेव-देवकी के 6 बेटों को एक-एक कर कंस ने कारागार में मार डाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दी थी। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आनेवाले संतान की रक्षा हुई।

सातवें संतान का जन्म समय जानकर भगवान श्री कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींचकर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देना, जो कि इस समय गोकुल में नंद-यशोदा के यहां रह रही है तथा तुम स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेना।

योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया जिससे देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहणी के गर्भ से संतान के रूप में बलराम का जन्म हुआ। उसके बाद देवकी की आठवीं संतान के रूप में साक्षात भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए। इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत-पूजन से देवकी के दोनों संतानों की रक्षा हुई।

हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व भैया बलराम से संबंधित है। हल से कृषि कार्य किया जाता है तथा बलराम जी का प्रमुख हथियार भी है। बलदाऊ भैया कृषि कर्म को महत्व देते थे, वहीं भगवान कृष्ण गौ पालन को। इसलिए इस व्रत में हल से जुते हुए जगहों का कोई भी अन्न आदि व गौ माता के दुध, दही, घी आदि का उपयोग वर्जित है। साथ ही हलषष्ठी व जन्माष्टमी एक दिन के अंतराल में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

इस दिन उपवास रखनेवाली माताएं हल चलेवाले जगहों पर भी नहीं जाती हैं। इस व्रत में पूजन के बाद माताएं अपने संतान के पीठवाले भाग में कमर के पास पोता (नए कपड़ों का टुकड़ा - जिसे हल्दी पानी से भिगाया जाता है) मारकर अपने आंचल से पोछती हैं जो कि माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है।

पूजन के बाद व्रत करनेवाली माताएं जब प्रसाद-भोजन के लिए बैठती हैं। तो उनके भोज्य पदार्थ में पचहर चावल का भात, छह प्रकार की भाजी की सब्जी (मुनगा, कद्दु ,सेमी, तोरई, करेला,मिर्च) भैस का दुध, दही व घी, सेन्धा नमक, महुआ पेड़ के पत्ते का दोना - पत्तल व लकड़ी को चम्मच के रूप में उपयोग किया जाता है। बच्चों को प्रसाद के रूप मे धान की लाई, भुना हुआ महुआ तथा चना, गेहूं, अरहर आदि छह प्रकार के अन्नों को मिलाकर बांटा जाता है।

इस व्रत-पूजन में छह की संख्या का अधिक महत्व है। जैसे- भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का छठवां दिन, छह प्रकार का भाजी, छह प्रकार का खिलौना, छह प्रकार का अन्नवाला प्रसाद तथा छह कहानी की कथा।

सहयोग : डॉ.संध्या तिवारी