Source: न्यूज़ भारती हिंदी07 Sep 2015 15:02:24

इस फैसले में राजनीतिक स्तर पर जो मीन-मेख निकाली जा रही है, वह विरोध के लिए विरोध की प्रवृत्ति का परिचायक है। कम से कम कांग्रेस के पास को इस फैसले की आलोचना करने का नैतिक आधार बिल्कुल नहीं है। यह बात रिकॉर्ड पर है कि यूपीए सरकार के रक्षामंत्री ने वन रैंक वन पेंशन को लागू करना आर्थिक तौर पर असंभव काम बताया था। बाद में ऐन चुनाव के पहले जिस तरह इस मांग को स्वीकार करने और इस हेतु पांच सौ करोड़ रपए की व्यवस्था का ऐलान किया गया, वह भी राजनीतिक बाजीगरी का उपक्रम था। बेहतर होगा कि कम से कम अब इस विषय पर राजनीति न की जाए।

आखिर सरकार ने रिटायर्ड सैनिकों के लिए 'वन रैंक वन पेंशन' को लागू करने की घोषणा कर दी। काफी समय से पूर्व सैनिक इसके लिए आंदोलन कर रहे थे और कुछ सैनिक भूख हड़ताल पर भी बैठे थे। लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत में नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि अगर वह प्रधानमंत्री बने, तो 'एक रैंक एक पेंशन' को लागू करेंगे। सत्ता प्राप्ति के बाद जब इस विषय पर सरकार ने विचार-मंथन किया तो उसे इस बात का एहसास हुआ कि यह मामला कितना पेचीदा है यही वजह है कि उसे ‘वन रैंक वन पेंशन’ लागू करने में एक वर्ष से भी अधिक समय लग गया।

पेंशन विसंगति से जूझ रहे पूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन लागू करने का मोदी सरकार का फैसला किसी मुंह मांगी मुराद से कम नहीं है। पिछले चालीस सालों से इसकी मांग की जा रही थी। इसको लागू करने में लगभग दस हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। सैनिकों के साथ-साथ इस जटिल मसले के सुलझाने में मिली कामयाबी से सरकार भी सुकून महसूस कर रही होगी, क्योंकि पिछले कुछ अरसे से उस पर लगातार वन रैंक वन पेंशन का लागू करने का दबाव बढ़ता जा रहा था।

बहरहाल, इस बाबत रक्षामंत्री के ऐलान के बाद इसका स्वागत करने के साथ-साथ कुछ बिंदुओं को लेकर जिस तरह पूर्व सैनिक असहमति जाहिर करने लगे, उससे आशंका हुई कि मामले में नए पेंच न पैदा हो जाएं। पूर्व सैनिकों को खासकर वीआरएस लेनेवालों को लाभ से वंचित करने और पांच साल पर पेंशन की समीक्षा के प्रावधान पर ऐतराज था। आशंका इस बात को लेकर अधिक थी कि यदि नौकरी की अवधि पूरी न करनेवालों को लाभ से वंचित किया जाएगा तो पचास फीसद से अधिक रिटार्यड सैन्य कर्मी इसके दायरे से बाहर हो जाएंगे। हालांकि तत्काल जिस तरह सरकारी पक्ष से स्पष्टीकरण आने लगे उससे लगा कि यह विवाद समझने और समझाने में चूक का है। अंततः रविवार को प्रधानमंत्री की इस घोषणा से तस्वीर साफ हो गई कि न्यूनतम अवधि तक सेवारत रहने वाले हरेक पूर्व सैनिक को वन रैंक वन पेंशन का लाभ मिलेगा। इसका सुफल इस रूप में देखना सुकूनदेह रहा कि पूर्व सैनिकों ने आमरण अनशन खत्म कर दिया है।

वन रैंक वन पेंशन को एक जुलाई, 2014 से लागू किया जाएगा और इसके अतिरिक्त पेंशन की हर पांच साल में समीक्षा होगी। हालांकि कुछ लोग भ्रम फैला रहे थे कि प्रीमैच्योर रिटायर हुए जवानों को यह लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें प्रधानमंत्री ने जवाब देते हुए कहा हैकि वन रैंक वन पेंशन का लाभ सभी रिटायर सैनिकों को मिलेगा। उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि इस पर सरकार कोई आयोग नहीं बनाने जा रही है, बल्कि एक न्यायिक समिति गठित करेगी जो कि इस योजना को लागू करने में सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करने से संबंधित एक रिपोर्ट छह माह में दे देगी।

हालांकि यह निराशाजनक है कि पूर्व सैनिकों का एक समूह सरकार की घोषणा से असंतुष्ट नजर आ रहा है। दरअसल, पूर्व सैनिक पेंशन की समीक्षा पांच साल के बजाय हर साल या दो साल में चाह रहे हैं। ओआरओपी लागू करने की तिथि एक जुलाई 2014 के बजाय अप्रैल 2014 करने की मांग कर रहे हैं। अधिकतम और न्यूनतम पेंशन के औसत के आधार पर ओआरओपी तय करने के बजाय अधिकतम पेंशन के आधार पर इसे तय करने की मांग कर रहे हैं। वहीं एक सदस्यीय न्यायिक समिति के बजाय पांच सदस्यीय न्यायिक समिति चाह रहे हैं जिसमें उनके भी तीन प्रतिनिधि रहें। सरकार कह चुकी है कि हर साल पेंशन की समीक्षा नहीं हो सकती, यह काफी पेचीदा है। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होता। वहीं उन्हें न्यायिक समिति के पास अपनी बातें रखने की छूट है। जाहिर है, ये ऐसे मामले नहीं हैं जिन्हें लेकर सरकार की आलोचना की जाए अथवा लिखित आश्वासन नहीं मिलने की सूरत में फिर से धरना-प्रदर्शन पर बैठने की बात की जाए।

इस फैसले में राजनीतिक स्तर पर जो मीन-मेख निकाली जा रही है, वह विरोध के लिए विरोध की प्रवृत्ति का परिचायक है। कम से कम कांग्रेस के पास को इस फैसले की आलोचना करने का नैतिक आधार बिल्कुल नहीं है। यह बात रिकॉर्ड पर है कि यूपीए सरकार के रक्षामंत्री ने वन रैंक वन पेंशन को लागू करना आर्थिक तौर पर असंभव काम बताया था। बाद में ऐन चुनाव के पहले जिस तरह इस मांग को स्वीकार करने और इस हेतु पांच सौ करोड़ रुपये की व्यवस्था का ऐलान किया गया, वह भी राजनीतिक बाजीगरी का उपक्रम था। बेहतर होगा कि कम से कम अब इस विषय पर राजनीति न की जाए।