Source: न्यूज़ भारती हिंदी11 Jan 2016 13:08:38

मुफ्ती मोहम्मद सईद इस ढंग से अचानक चले जाएंगे यह कल्पना किसी को हो भी नहीं सकती थी। लेकिन मृत्यु सच है और यह कभी भी आ सकती है। इसको रोकना हमारे आपके वश में नहीं है। एक भला चंगा व्यक्ति, विपरीत विचारधारा की पार्टी के साथ मिलकर सरकार चला रहा था और कुछ घंटे में अगर उसका इंतकाल हो गया तो उसका असर सामान्य नहीं हो सकता। जम्मू-कश्मीर की वर्तमान राजनीति में सईद की मौत का असर होना निश्चित है। हां, वो कैसा होगा, कितना होगा, कब दिखाई देगा इसके बारे में निश्चयात्मक तौर पर कुछ कुछ कहना जरा कठिन है। लेकिन यह प्रश्न तो उठेगा कि आखिर मुफ्ती की अनुपस्थिति से जम्मू-कश्मीर की राजनीति कितनी प्रभावित होगी? आखिर भाजपा की रणनीति अब क्या होगी?

वास्तव में मुफ्ती सईद की राष्ट्रीय स्तर पर जो भी छवि हो, जम्मू-कश्मीर की राजनीति के इस समय तक वे ऐसे अपरिहार्य व्यक्तित्व थे, जिनकी भूमिका को वहां नजरअंदाज करना संभव ही नहीं था। कांग्रेस पार्टी में अपनी राजनीति की लंबी पारी खेलने के बाद सईद ने जब देखा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के एकल वर्चस्व को प्रदेश में तोड़ना लगभग नामुमकिन है तो उन्होंने पीडीपी यानी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई और परिणाम हमारे सामने है। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस एवं भाजपा जैसी दो राष्ट्रीय पार्टियों के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस एवं पीडीपी दोनों वहां की राजनीति के स्थायी ध्रुव बन चुके हैं। या तो सरकार नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ बनेगी या फिर पीडीपी के साथ। राजनीति में ऐसी स्थिति पैदा कर देना सामान्य बात नहीं है। हालांकि इसमें उनकी बेटी मेहबूबा मुफ्ती का भी योगदान है, लेकिन मुख्य भूमिका और पहल तो स्व. सईद की ही थी।

जम्मू-कश्मीर के बाहर देश में मुफ्ती मोहम्मद सईद की छवि ऐसी नहीं थी कि उनके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण हो, किंतु जम्मू-कश्मीर में स्थिति अलग थी। राष्ट्रवादी भावनावाले व्यक्ति के लिए सईद से पूरी तरह सहमत होना जरा कठिन था। आतंकवादियों और अलगाववादियों के प्रति उनकी नरम नीतियों से हम आप सहमत हो भी कैसे सकते थे? विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उन्होंने शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने में अलगाववादियों, आतंकवादियों और यहां तक कि पाकिस्तान की भूमिका को भी स्वीकार करते हुए सबके प्रति आभार व्यक्त किया था। जब उनसे यह पूछा गया कि आपने उन्हें आभार कैसे व्यक्त कर दिया तो उनका जवाब था कि उन्होंने चाहा कि यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया चले तभी शांतिपूर्ण चुनाव हुआ। इससे देश में बवाल बचा। लोग यह प्रश्न उठाने लगे कि आखिर एक पार्टी का नेता जो मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो चुका था वह कैसे इस तरह की बातें कर सकता है? आभार तो सुरक्षा बलों को दिया जाना चाहिए था जिनने जान की बाजी लगाकर सुरक्षित चुनाव कराया, आतंकवादियों ने हमले किए तो उनसे जूझकर उनको विफल किया। लेकिन यह मुफ्ती सईद का विचार था जिससे वे डिगे नहीं।

इस प्रसंग की चर्चा यहां इसलिए आवश्यक है कि इससे यह पता चलता है कि मुफ्ती की राजनीतिक धारा सामान्य नहीं थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस इस तरह की बात सार्वजनिक स्तर पर कभी नहीं कर सकती है। जम्मू-कश्मीर में जब वे पहली बार 2002 में मुख्यमंत्री बने तब भी वो दो बातें कहते थे, गोली से नहीं बोली से तथा जख्म पर मरहम लगाना। हालांकि जिस दिन उनने शपथ लिया उसी दिन आतंकवादियों ने गोलियां चलाकर यह साबित कर दिया कि वो बोली की उनकी नीतियों के साथ नहीं हैं। वो आतंकवादियों और अलगाववादियों के प्रति नरम नीति के पक्षधर थे और इस कारण उनकी आलोचना होती थी। कांग्रेस के साथ आधे-आधे समय के तहत वे मुख्यमंत्री बनें पर कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद की नीतियों से उनकी असहमति होने लगी और अंततः गठबंधन टूट गया। दरअसल, कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी थी और धारा 370 और स्वायत्तता के हक में होने के बावजूद वह एकदम से मुफ्ती की सोच तक नहीं जा सकती थी। इस कारण उनका गठबंधन टूट गया और 6 वर्ष सत्ता से बाहर रहे।

भाजपा और सईद दरअसल जम्मू-कश्मीर राजनीति के दो ध्रुव थे जिनके मिलन की संभावना तक व्यक्त नहीं की जा सकती थी। लेकिन 2014 विधानसभा चुनाव के बाद जो समीकरण आए उसमें एक स्थिति यह थी कि भाजपा को बाहर रखकर सारी पार्टियां मिलकर सरकार बनाएं या फिर पीडीपी भाजपा की सरकार बने। पीडीपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस एवं कांग्रेस के खिलाफ तो प्रचार किया ही था, लेकिन भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके निशाने पर सबसे ज्यादा थे। मुफ्ती ने यह भय दिखाकर वोट हासिल किया था कि भाजपा सत्ता में आएगी तो आपकी पहचान खत्म हो जाएगी, आपकी स्वायत्ता का विध्वंस हो जाएगा आदि आदि। यह सच है कि इस कारण उनको अलगाववादियों तक का मौन समर्थन प्राप्त हुआ था। ध्यान रखिए मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी से केवल मुसलमान उम्मीदवार ही जीते। लेकिन मुफ्ती ने भाजपा के पास संदेश भेजा, क्योंकि वो नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ या उसके समर्थन से सरकार गठित करना अपनी राजनीति के लिए जोखिम भरा मानते थे। यह मुफ्ती की राजनीतिक कुशलता थी कि सीटों की संख्या समान होने के बावजूद उनने भाजपा से पूरे समय के लिए मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया, पिछली बार की तरह आधा समय वे एवं आधा समय कांग्रेस वाला समझौता नहीं किया। जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया उसमें भी भाजपा को अपने मुद्दों से पीछे हटना पड़ा। हालांकि सरकार में आने पर दोनों के बीच कई अवसर तनाव के आए। इनमें से एक था, राजनीतिक बंदियों की रिहाई का मामला। मुफ्ती की गोली नहीं बोली और जख्म पर मरहम का एक अर्थ यह था कि कश्मीर की आजादी के लिए लड़ाई लड़नेवालों को भी राजनीतिक कैदी मानकर रिहा किया जाए। उन्होंने इसकी शुरुआत भी की लेकिन भाजपा ने इसका विरोध किया और इससे उनको अपनी योजना लगभग स्थगित करनी पड़ी। मसर्रत आलम जैसे कुछ लोग रिहा हुए तो फिर जेल में डालना पड़ा।

मेहबूबा मुफ्ती उसी सोच की हैं लेकिन उनका कद मुफ्ती मोहम्मद जितना नहीं है। वैचारिक मतभेदों के बावजूद मुफ्ती सईद ने यह विश्वास पैदा किया था कि जम्मू-कश्मीर में सरकार स्थिर रहेगी। ऐसा मनोविज्ञान पैदा करना भी एक उपलब्धि ही कही जाएगी। क्या मेहबूबा ऐसा विश्वास कायम रख पाएंगी? यही ऐसा प्रश्न है जिस पर वर्तमान जम्मू-कश्मीर की राजनीति का भविष्य निर्भर करता है। मुफ्ती एक विचारधारा थे। राष्ट्रवादी से तो उनकी पूर्ण एकता संभव नहीं थी, पर वे कश्मीर में पाकिस्तान समर्थकों या आजादी समर्थक अलगावादियों से भी थोड़ा अलग थे। इस कारण वे अलगावादी भी नजर आते थे। मुफ्ती न पाकिस्तान के साथ कश्मीर के विलय के समर्थक थे, न उसकी आजादी के। वे भारत के अन्य राज्यों की तरह भी कश्मीर को सामान्य अंग बनाने के विरुद्ध थे। जम्मू-कश्मीर की चुनावी राजनीति में इस तरह की विचारधारा वाला दूसरा दल नहीं है। अपनी राजनीति के लिए उन्होंने यह महसूस किया कि यही विचारधारा उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामानांतर खड़ी कर सकती है और यही हुआ। यह विचारधारा ही थी जिसने 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उनके गृह मंत्री रहते पुत्री रुबिया सईद को अपहरणकर्ताओं से मुक्त कराने के लिए आतंकवादियों की रिहाई हुई। वे मानते थे कि हमारे नवजवानों ने बंदूक उठाया हुआ है उनसे गोली यानी सख्ती से निपटने की जगह बोली यानी बातचीत से निपटना ज्यादा बेहतर रास्ता है। हम आप इससे यकीनन सहमत नहीं हो सकते। किंतु कश्मीर में उनके समर्थन का आधार ही यही था। ऐसे व्यक्ति ने भाजपा के साथ सरकार बनाने का फैसला किया तो उसके लिए यह राजनीतिक जोखिम ही था। यह जोखिम उनके लिए लाभकारी होता या हानिकारक इसे देखने के लिए वे जिन्दा नहीं बचे।

यह स्वीकारने में आपत्ति नहीं है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के जाने से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बड़ी रिक्तता कायम हुई है। इस रिक्त्ता का असर सुनिश्चित है। निस्संदेह, उनकी उत्तराधिकारी के रूप में मेहबूबा मुफ्ती इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगी। वो क्या कर पातीं हैं यह देखना होगा। उनकी रिक्तता को वो भर पाती हैं या नहीं यह भी कहना कठिन है। अगर नहीं भर पातीं हैं तो फिर जम्मू-कश्मीर में इस विचार का कोई नया दल उभर सकता है, पीडीपी की एकता भंग हो सकती है। भाजपा इस समय कोई जोखिम नहीं उठाएगी और मेहबूबा को वह उनके उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार कर रही है। वह उसी तरह काम करेगी जैसे मुफ्ती सईद के साथ काम करती थी। अगर पीडीपी के अंदर कोई विद्रोह या टूट की संभावना बनती है तो फिर भाजपा का रंग बदलेगा। लेकिन किसी भी स्थिति के लिए हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए।