Source: एजेंसियाँ12 Jan 2016 11:28:59

 नई दिल्ली, जनवरी 12: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बच्‍चों के साथ होने वाले यौन अपराधों में आरोपियों के खिलाफ सजा को और कठोर व सख्त बनाने लिए संसद को विचार करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिगों के साथ दुष्कर्म और यौन दुर्व्यवहार करने वालों को सख्त से सख्त सजा देने के लिए संसद अगर चाहे तो कानून बनाने के बारे में विचार करे।
जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस एन.वी. रमना की बैंच ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय महिला वकील संघ की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान यह बात कही।इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट महिला वकील संघ ने नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने वाले अपराधियों के 'बंध्याकरण' (कैस्ट्रेशन) कराने के प्रावधान की मांग की है।बैंच ने याचिकाकर्ता की वकील महालक्ष्मी पवानी को बताया कि आवेश और भावुकता के आधार पर अपराधियों को सख्त सजा देने के लिए कानून नहीं बनाए जा सकते।

कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की इस बात का जिक्र किया कि कानून बनाने की शक्ति संसद के पास है। यह काम कोर्ट नहीं कर सकता।वकील महालक्ष्मी पवानी से कोर्ट ने कहा कि कोर्ट वे सजाएं नहीं दे सकती जो कानून में मौजूद नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि हम यह बात साफ कर देना चाहते हैं कि कोर्ट न तो अपराध की परिभाषा गढ़ती हैं और न ही सजा के तरीके।कोर्ट ने मामले को संसद के विवेक पर छोड़ते हुए कहा कि इस मामले में सजा को निर्णायक होना चाहिए।

कोर्ट ने महिला वकील संघ की ओर से दिए गए बंध्याकरण के सुझाव को 'अस्वीकार्य' बताया। कोर्ट ने कहा कि उसे कोई ऐसी सजा नहीं सुझानी चाहिए जिसके बारे में फैसला लेने का अधिकार संसद का है। अटॉर्नी जनरल रोहतगी ने कोर्ट से कहा कि वह इस मुद्दे को सरकार के संज्ञान में लाएंगे। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बलात्कार से जुड़े मामलों में पहले से ही कानून बने हुए हैं, लिहाजा न्यायालय संसद को नया कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकती। जानकारी है कि साल 2015 में बच्चे के साथ बलात्कार के 892 मामलों को पंजीकृत किया गया है।