(गुरु गोविन्द सिंह जयंती पर विशेष)

बैसाखी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। औरंगजेब के अत्याचारों को इस एक दिन के लिए भूलकर लोग खुशी से झूम रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे। परंतु श्री गुरुगोविन्द सिंह इस पर्व के अवसर को गुरु भक्ति की परीक्षा के सुअवसर के रूप में बदल देना चाहते थे। वे जानते थे कि मुगल सत्ता से संघर्ष किये बिना भारतीय समाज स्वाभिमान से जी नहीं सकता। वे यह भी जानते थे कि शक्ति और भक्ति दोनों ही धर्म की संस्थापना के लिए परमावश्यक हैं। अत: उन्होंने बैसाखी के मेले में एक बड़ा अखाड़ा बनाया, जहाँ पर देश भर से अनेक लोग आए। गुरुगोविन्द सिंह के चेहरे का तेज और उनका प्रभावी व्यक्तित्व आज कुछ महान व्यक्तियों की शोध के लिए बड़ी तेजस्विता से प्रगट हो रहा था। उन्होंने हजारों भक्तों से आह्वान किया कि ‘आज धर्म पर संकट आया है, लाखों लोग मुगलों के अत्याचार से त्रस्त हैं, कौन ऐसा वीर है जो धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तत्पर है?’ गुरुगोविन्द सिंह के हाथों में नंगी तलवार देखकर उनके इस प्रश्न से लोग भयभीत हो गए और बहुतों को इस प्रश्न पर आश्चर्य भी हुआ। कुछ सोच रहे थे कि आज गुरुजी क्यों अपने शिष्यों को अपना बलिदान करने का आह्वान कर रहे हैं।

सम्पूर्ण जनसमुदाय स्तब्ध हो गया था। लोग एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे। गुरुजी ने पुन: प्रश्न किया कि ‘क्या इस भारतवर्ष में कोई ऐसा वीर नहीं जो धर्म के लिए अपना बलिदान दे सके।’ जब किसी ने उत्तर नहीं दिया। तब उन्होंने कहा, ‘क्या इसी दिन के लिए तुमने जन्म लिया है कि जब महान कार्य के लिए तुम्हारी आवश्यकता पड़े, तो तुम सिर झुकाये खड़े रहो। कोई है ऐसा भक्त जो धर्म-भक्ति की बलिवेदी पर अपनेआप को समर्पित कर दे।’

तभी लाहौर का एक दयाराम खत्री उठा और उसने कहा, ‘‘मैं प्रस्तुत हूँ।” गुरु उसे अपने साथ कक्ष के भीतर ले गए। वहाँ पहले से कुछ बकरे बांधकर रखे गये थे। गुरु ने एक बकरे का सिर काटकर रक्तरंजित तलवार थामे पुन: सभा में प्रवेश किया। पुन: वही सवाल! ‘एक के बलिदान से कार्य नहीं चलेगा, है कोई और जो धर्म के लिए अपने प्राण दे दे?’  इस बार दिल्ली का एक जाट ‘धर्मदास’ आगे बढ़ा। गुरु उसे भी अन्दर ले गए। पुन: बाहर आकर वही प्रश्न। इस प्रकार तीन और व्यक्ति अंदर ले जाये गये और वे थे द्वारिका का एक धोबी मोहकमचंद, जगन्नाथपुरी का रसोइया हिम्मत और बीदर का नाई साहबचन्द।

गुरु ने इन पांचों को सुन्दर वस्त्र पहनाए। उन्हें ‘पंज प्यारे’ कहकर सम्बोधित किया। उन पांचों को लेकर वे बाहर आये तो सभा स्तब्ध रह गई। बैठे हुए सभी लज्जित हुए। इन पंज प्यारों में केवल एक खत्री था। शेष चारों उस वर्ग के थे, जिन्हें निचला वर्ग कहा जाता था। गुरु ने उन्हें सर्वप्रथम दीक्षित किया और आश्चर्य – स्वयं भी उनसे दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने ‘खालसा’ को ‘गुरु’ का स्थान दिया और ‘गुरु’ को ‘खालसा’ का। गुरु ने उनके साथ बैठकर भोजन किया। उन पांचों को जो अधिकार उन्होंने दिये, उनसे अधिक कोई भी अधिकार अपने लिए नहीं रखे। जो प्रतिज्ञाएं उनसे कराईं, वे स्वयं भी की। इस प्रकार गुरुगोविन्द सिंह ने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को ‘खालसा’ में परिवर्तित किया। ईश्वर के प्रति निश्चल प्रेम ही सर्वोपरि है, अत: तीर्थ, दान, दया, तप और संयम का गुण जिसमें है, जिसके हृदय में पूर्ण ज्योति का प्रकाश है वह पवित्र व्यक्ति ही ‘खालसा’ है। ऊंच, नीच, जात-पात का भेद नष्ट कर, सबके प्रति उन्होंने समानता की दृष्टि लाने की घोषणा की। उन्होंने सभी को आज्ञा दी कि अपने नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग करें। इसी समय वे स्वयं, गुरुगोविन्द राय से गुरुगोविन्द सिंह बने।

वे पवित्र हैं

गुरु महाराज ने उन पांचों वीरों की ओर इंगित करते हुए कहा कि ये खालिस हैं यानी पवित्र हैं-

जे आरज (आर्य) तू खालिस होवे। हँस-हँस शीश धर्म हित खोवे।।

गुरु महाराज ने एक बड़ा कडाह मंगवाया और उसमें पानी, दूध व बताशा मिलाकर उस घोल को अपनी दुधारी तलवार से चलाया और इस अमृत को उन्होंने उन पंज प्यारों को चखाकर सिंह बनाया। फिर स्वयं उन पंज प्यारों के सामने घुटनों के बल बैठकर उन्होंने उनसे प्रार्थना कि वे उन्हें अमृत चखायें। उन्होंने पंच ‘क’ – ‘केश’, ‘कड़ा’, ‘कंघा’, ‘कच्छ’ और ‘कृपाल’ – धारण करने का निर्देश प्रत्येक सिख के लिए दिया। ‘समर्पण’, ‘शुचित्व’, ‘दैवभक्ति’, ‘शील’ और ‘शौर्य’ का भाव इसके पीछे था। दुनिया के इतिहास में यह बेजोड़ उदाहरण है जब गुरु ने अपने शिष्यों से दीक्षा लेकर सबकी समानता का प्रभावी उद्घोष किया हो। अमृत चखकर वे गोविन्दराय से गोविन्द सिंह बन गए। बाद में गुरु महाराज ने आह्वान किया कि जो-जो धर्म की रक्षा में अपने शीश कटाने को प्रस्तुत हों वे अमृत चखने के लिए आगे आयें और देखते-ही-देखते सिंहों की विशाल वाहिनी खड़ी हो गयी।