नागपुर, जनवरी 16 : स्वामी विवेकानन्द भारतीय संस्कृति, परम्परा, वेदान्त, उपनिषद् और संन्यास धर्म के महान प्रतीक हैं। उन्होंने शिकागो की विश्व धर्म सम्मलेन में पाश्चात्य जगत के सामने भारत को प्रस्थापित किया। भारतीय संस्कृति, धर्म, परम्परा और इतिहास को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द, वास्तव में भारत का व्यक्त स्वरूप है, ऐसा प्रतिपादन करते हुए विवेकानन्द केन्द्र के अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष एम.हनुमंतराव ने कहा कि स्वामीजी ने दुनिया में भारत के आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मगौरव को बढ़ाया। 

श्री हनुमंतराव स्वामी विवेकानन्द जयंती के अवसर पर विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी शाखा नागपुर द्वारा आयोजित एक व्याख्यान समारोह को संबोधित कर रहे थे। शिवाजी नगर नागरिक मंडल के प्रांगण में आयोजित इस समारोह के दौरान व्यासपीठ पर बतौर अध्यक्ष गंधे इंस्टीट्यूटशन्स के चेयरमैन मोहन गंधे, विवेकानन्द केन्द्र नागपुर के नगर संचालक व नागपुर मेडिकल कॉलेज के सुप्रीटेंडेंट डॉ. जगदीश हेडाऊ तथा नगर प्रमुख गौरी खेर व्यासपीठ पर विराजमान थे। 

12 जनवरी को “जन-मन के विवेकानन्द” विषय पर समारोह को संबोधित करते हुए श्री हनुमंतराव ने कहा कि स्वामीजी के जन्म से पूर्व सन 1850 के दौरान अंग्रेजों ने “इण्डिया अंड इट्स इनहैबिट्स (India and its Inhabitants)” नामक पुस्तक प्रकाशित किया। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास, संस्कृति, परम्परा और सभ्यता को गलत ढंग से लिखा गया। भारतीय संस्कृति और भारतीय जनजीवन का मजाक उड़ाया गया और इस पुस्तक को भारत ही नहीं सारी दुनिया में प्रसारित किया गया। भारत के युवा विद्यार्थी भी इस पुस्तक को पढ़कर आत्मग्लानि का अनुभव करते थे। वहीं भारत के प्रति दुनिया का दृष्टिकोण एक गुलाम और पिछड़ा हुआ देश के रूप में बन गया था। ऐसी विकत परिस्थिति में सं 1863 में स्वामी विवेकानन्दजी का जन्म हुआ। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस देव से दीक्षा प्राप्त की। सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करते हुए भारत के जनमानस की स्थिति को नजदीक से समझा। अपने भारत भ्रमण के दौरान स्वामीजी बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से मिले, गरीब से गरीब जन सामान्य से भेट की। देशवासियों की गरीबी, अज्ञानता और आत्मग्लानि ने स्वामीजी को द्रवित कर दिया था। स्वामीजी ने भारत को इस आत्मग्लानि उबारने के लिए 25, 26 और 27 दिसम्बर, 1892 को कन्याकुमारी स्थित समुद्र के मध्य श्रीपाद शिला पर ध्यान किया।

श्री हनुमंतराव ने बताया कि स्वामी विवेकानन्द जब लोगों से मिलते तो भगवान या मोक्ष पर चर्चा नहीं करते थे, उनकी चर्चा का विषय रहता था राष्ट्र, समाज और संस्कृति। उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक शक्ति से भारत के प्रति दुनिया का दृष्टिकोण ही बदल दिया। स्वामीजी के व्याख्यानों की वजह से पाश्चात्य जगत के लोग भारत को श्रद्धाभाव से देखने लगे। स्वामीजी ने भारत की संस्कृति, धर्म, ऐतिहासिक विरासतों और अध्यात्म से देश और दुनिया को परिचित कराया। इस कारण देशवासियों का आत्मगौरव बढ़ा और दुनिया भारत की महानता से परिचित हो पाया।  

केन्द्र के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष ने बताया कि वेदांत केसरी के नाम से विख्यात वीर संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने आध्यात्म को पूजा-पाठ के कर्मकांड से निकालकर उसे सेवाकार्यों की ओर मोड़ दिया। स्वामीजी ने कहा “मानव सेवा ही माधव सेवा है”। श्री हनुमंतराव ने अनेक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि स्वामीजी का प्रभाव विश्वपटल पर किस तरह था। उन्होंने बताया कि जब स्वामीजी विदेश से भारत लौटे तो भूमि पर पैर रखते ही देश की मिट्टी को सिर पर धारण किया। स्वामीजी के साथ आए 6-7 अंग्रेज भी स्वामीजी को देखकर भारत भूमि का वन्दन करने लगे। उन्होंने सूरजराव नामक सैनिक के स्वामी निश्चयानंद बनने का प्रसंग बताया। उन्होंने बताया कि स्वामीजी से प्रभावित होकर चेन्नई के समीप वनियाम्बडी के वेंकटस्वामी नायडू स्वामीजी की वेशभूषा बनाकर बीच बाजार में स्वामी विवेकानन्द का भाषण सुनाते-सुनाते किस तरह रामकृष्ण मठ के संन्यासी बन गए। हनुमंतरावजी अनेक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि स्वामी विवेकानन्द देश के जन-मन में बसे हैं और आज भी लाखों लोग स्वामीजी से राष्ट्रकार्य की प्रेरणा पा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कह कि स्वामी विवेकानन्द वास्तव में विश्वगुरु थे। जबतक विवेकानन्द को लोग याद करेंगे भारत का नाम रहेगा और जबजब भारत की बात होगी स्वामी विवेकानन्द का नाम आएगा। स्वामीजी वास्तव में भारत के घनीभूत रूप हैं।

इस दौरान कार्यक्रम के अध्यक्ष मोहन गंधे ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी चुनौतियों का डटकर सामना करने में सकुचाते हैं। स्वामी विवेकानन्द के विचार युवाओं को संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। प्रारंभ में केन्द्र कार्यकर्ता महेश गुप्ता ने जहां पद्मश्री अरुणिमा सिन्हा के प्रेरक जीवन से अवगत कराया, वहीं सौमित्र दाभोलकर ने सुपर 30 के जनक आनंद कुमार के शिक्षा क्षेत्र में योगदान की चर्चा की। इस दौरान भरिय संकृति परीक्षा और गीता निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन वैभव जोशी ने किया। कार्यक्रम की प्रस्तावना लखेश्वर चंद्रवंशी ने रखी तथा केन्द्र की नगर प्रमुख गौरी खेर ने आभार व्यक्त किया। श्रेयस नेमाडे ने गीत प्रस्तुत किया वहीं कुमारी वेदवती ने वन्दे मातरम् गाया। कार्यक्रम में राष्ट्रसेविका समिति की पूर्व प्रमुख संचालिका प्रमिलाताई मेढ़े, कर्नल (रिटायर्ड) सुनील देशपांडे, डॉ.विलास देशपांडे, फ़्लाइंग ऑफिसर (रिटायर्ड) शिवाली देशपांडे सहित भारी संख्या में नगर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।