Source: न्यूज़ भारती हिंदी18 Jan 2016 12:17:36

मसूद अजहर पर कार्रवाई को मुंबई हमले के संदर्भ में हुई कार्रवाई से अलग होकर देखें

भारत के सामने मुंबई हमले के मामले में हुई गिरफ्तारियों तथा मुकदमों की परिणति का निराशाजनक उदाहरण है। इसके आलोक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पहल पर जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ हो रही कार्रवाई की आने वाली खबरों से हम ज्यादा उत्साहित नहीं हो सकते। आखिर दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है। ऐसा नहीं होता तो जिस तेजी से पाकिस्तान सरकार ने पठानकोट हमले के बाद कार्रवाई करते हुए जैश के कार्यालयों, उनसे जुड़े लोगों के घरों, कार्यालयों पर छापे मारे हैं, काफी आतंकवादियों, उनके रिश्तेदारों को पकड़ा है और सबसे बढ़कर बड़ी कार्रवाई करते हुए जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर और उसके भाई रउफ अजहर को हिरासत में लिए जाने की खबर सही है, जिसकी पूरी संभावना है तो उसके बाद भारत में पाकिस्तान की ओर विशेषकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की वाहवाही होती। मसूद अजहर को पकड़कर पूछताछ करना सामान्य घटना नहीं है। उसकी पाकिस्तान में एक धार्मिक नेता के रूप में इज्जत है तथा उसका भाषण जगह-जगह होता रहता है। उसके समर्थकों की संख्या बहुत बड़ी है। उसके खिलाफ पाकिस्तान में कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं है। इसमें नवाज सरकार द्वारा उसे पकड़कर यदि उसके बहावलपुर स्थित मुख्यालय तक को सील कर दिया गया है तो इसे साधारण घटना नहीं माना जा सकता।

हम आगे बढ़ें और इसकी निष्पक्ष एवं तार्किक विवेचना करें उसके पहले कम से कम एक पक्ष पर हमें अवश्य संतोष होना चाहिए कि पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान केन्द्रित भारतीय कूटनीति वाकई सफल रही है। हमले के एक सप्ताह के अंदर पाकिस्तान द्वारा आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई पहली बार हुई है। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर जन्म दिवस कूटनीति की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। हालांकि हम भारतीय इतने हीनग्रंथि के शिकार हैं कि अपना श्रेय भी दूसरों को दे देते हैं। ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो कार्रवाइयों का श्रेय अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के दबाव को देते हैं। हम क्यों भूल रहे हैं कि अमेरिका ने भी पाकिस्तान से यदि पठानकोट मामले में कार्रवाई एवं दोषियों को कानून के कठघरे में लाने को कहा कि तो यह भी भारतीय कूटनीति की ही सफलता है। अगर नवाज शरीफ एवं मोदी के बीच हमले के बाद कई बार बातचीत हुई तो उसके प्रभाव को मत नकारिए। भारत ने यह भी साफ कह दिया था कि पाकिस्तान की त्वरित और निर्णायक कार्रवाई के बाद ही प्रस्तावित विदेश सचिव स्तर की बातचीत शुरू हो सकती है। इसके पहले 26 नवम्बर, 2008 को मुंबई हमले के बाद आरंभ में तो पाकिस्तान ने सहानुभूति प्रकट की लेकिन उसके बाद वह यह मानने से ही इन्कार करने लगा कि हमलावर पाकिस्तानी थे एवं वहां से आए थे। यह लंबा चला। जब पाकिस्तान की मीडिया ने ही जिंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल अमीर कसाब के पाकिस्तानी गांव एवं घर तक का पता बता दिया तो उसके सामने कोई चारा नहीं रहा। फिर उसने सबूत के पुख्ता न होने की शिकायत करनी आरंभ कर दी और इसका अंत ही नहीं हुआ। हालांकि इसके बावजूद पाकिस्तान को हाफिज सईद से लेकर जकीउर रहमान लखवी एंवं सात लोगों को पकड़ना पड़ा, उन पर मुकदमा चला। उसमें हम यहां विस्तार से न जाएं। बस, केवल इतना ही बताना पर्याप्त है कि इतना होने में ही महीनों लग गए और भारतीय कूटनीति को काफी मशक्कत करते रहनी पड़ी।

अगर पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान के रवैये से तुलना करें तो बिल्कुल उलट स्थिति दिखाई देगी। इस बार पाकिस्तान नकार का चरित्र दिखाने की जगह कार्रवाई मोड में सामने आया है। नवाज शरीफ ने कई बड़ी बैठकें पठानकोट हमले पर की है जिसमें दो में सेना प्रमुख एवं आईएसआईएस प्रमुख भी रहे हैं। यानी नवाज ने सेना एवं आईएसआई को विश्वास में लेकर कार्रवाई की शुरुआत की। मुंबई हमले के दौरान यूसुफ रजा गिलानी की सरकार ने ऐसा नहीं किया था। शरीफ ने जो संयुक्त दल गठित किया उसमें सैन्य खुफिया, खुफिया ब्यूरो, पुलिस एवं आईएसआई को शामिल किया है। यह मंबई हमले के संदर्भ में हुई कार्रवाई से ज्यादा गंभीर एवं सशक्त जांच दल है। कहने का तात्पर्य यह कि इस बार हर कार्रवाई में सेना शामिल है। यानी संभावित ठिकानों पर जितने छापे पड़े, जितने लोग पकड़े गए तथा जितने स्थान सील किए गए सब सेना एवं आईएसआई की सहभागिता से क्योंकि जांच दल के वे अंग हैं। मसूद अजहर पर हाथ डालने से पहले भी नवाज शरीफ ने सुबह बैठक बुलाई। यानी इसमें भी सेना, आईएसआई, आईबी एवं वरिष्ठ मंत्रियों से सलाह मशविरा के बाद छापे एवं पकड़ धकड़ आरंभ किया गया। नवाज शरीफ का प्रकट रुख आरंभ से नकारात्मक नहीं सकारात्मक रहा। हमले के संदर्भ में पहली ही उच्च स्तरीय बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक वक्तव्य जारी किया जिसके अनुसार पाकिस्तान की धरती से आतंकवाद मिटाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। साथ ही कहीं भी आतंकवाद को फैलाने के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल न करने देने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

हालांकि अभी तक हमारे पास मसूद अजहर के बारे में जितनी जानकारियां हैं उनके अनुसार आईएसआई का उसे पूरा संरक्षण और समर्थन प्राप्त रहा है। 1999 दिसंबर में कंधार विमान अपहरण कांड के बाद जब वह रिहा हुआ तो कुछ समय छिपा रहा। लेकिन छह महीने बाद ही उसने बहावलपुर में एक बहुत बड़ी सभा की जिसमें उसने भारत को बरबाद करने का ऐलान किया था। उस सभा पाकिस्तान की सेना एवं आईएसआई का समर्थन प्राप्त था। माना जाता है कि आईएसआई की सहमति से ही उसने मार्च 2000 में हरकत-उल-मुजाहिदीन को विभाजित कर जैश-ए-मोहम्मद बनाया। उस पर पठानकोट हमले की साजिश रचने के पूर्व 13 दिसम्बर, 2001 में भारतीय संसद पर हमले करवाने का भी आरोप है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर अक्टूबर, 2001 के हमले के पीछे भी इसी संगठन का हाथ था। स्वयं पाकिस्तान में 2002 में अमेरिकी पत्रकार डेनियर पर्ल की हत्या भी इसी पर करवाने का आरोप है। 2002 में भारत के दबाव पर ही राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में जैश पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब संसद पर हमले के बाद भारत ने सीमा पर सेना को युद्व की अवस्था में तैनात रखा था। उस बाध्यकारी कूटनीति के परिणामस्वरूप दुनिया के प्रमुख देशों ने मुशर्रफ पर दबाव बनाया और उनने एक साथ कई संगठनों को प्रतिबंधित किया था तथा लश्कर, सिपाह ए साहबा जैसे संगठन बनाने का निषेध कर दिया था। उसके बावजूद मसूद अजहर की गतिविधियां जारीं रहीं। वह इस समय अपने मुख्यालय को इतना विस्तृत और परिष्कृत बनाने में लगा था जहां से वह सारी गतिविधियां चला सकें। उसके लिए वित्त पोषण आखिर पाकिस्तान से ही आता है।

तो जिस व्यक्ति को सेना और आईएसआई का इतना समर्थन प्राप्त रहा हो उसके खिलाफ वह वाकई यथेष्ठ कानूनी कार्रवाई करे इस पर सहसा विश्वास करना कठिन है। नवाज शरीफ भी इसे समझते हैं। हमें भी यह समझना होगा। लेकिन तत्काल जिस ढंग से कार्रवाई हुई है और पठानकोट हमले के बाद से जिस तरह का रुख पाकिस्तान सरकार का रहा है उसे देखते हुए और तमाम निराशाजनक संभावनाओं के रहते हुए भी निराश नहीं हो सकते। पाकिस्तान एक असंतुलित, अगठित राष्ट्र राज्य है जिसके यहां कहने के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली होते हुए भी राजनीतिक सत्ता, सैनिक सत्ता, मजहबी सत्ता जैसे अलग-अलग सत्ता केन्द्र हैं और उनमें राजनीतिक सत्ता शायद सबसे कमजोर है जिसे सबसे मजबूत होना चाहिए था। इसमें आतंकवाद की एक सत्ता भी आ गई है जो तीनों सत्ताओं को चुनौती देते हुए पाकिस्तान का ही ध्वंस करने पर उतारू है। ऐसे पाकिस्तान को आसानी से हम संतुलित, सामान्य, सुगठित राष्ट्र राज्य में परिणत नहीं कर सकते। कश्मीर को लेकर उसने जो ढांचा विकसित कर दिया है उसे वह पूरी तरह नष्ट नहीं कर सकता। इसलिए उसके कदमों की सीमाएं हमें समझनी होगी। वह एक ऐसा देश है जिससे अन्य सामान्य देशों की तरह कार्रवाई आज की स्थिति में संभव नहीं है। तब भी मान लीजिए कि एक बार जैश के खिलाफ इतनी व्यापक कार्रवाई हो रही है, मसूद अजहर तक को हाफिज सईद की तरह घर में नजरबंद करने के विपरीत जांच दल उठाकर ले गई तो फिर इसका भारत के लिए परिणाम सकारात्मक ही आएगा। एक बार इतनी छापामारी और कार्यस्थलों के सील होने के बाद इनके लिए फिर से अगले कुछ महीनों तक तो संगठित होकर भारत में हमले की साजिश रचना, उसके लिए भर्तियां करना, तैयारी करना, घुसपैठ कराना आदि संभव हो ही नहीं सकता। तत्काल इतना तो हुआ। जो पहले से घुसपैठ कर गए होंगे या करने की तैयारी में छिपे होंगे वही कुछ कर सकते हैं। अब आगे के कदमों के लिए प्रतीक्षा करिए, दबाव बनाए रखिए, संभावित सबूत जुटाकर प्रदान करते रहिए और अपने देश की सुरक्षा व्यवस्था की जो भयावह कमजोरियां उजागर हुईं हैं उनको दूरे करने के लिए प्राणपण से लगिए।