पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन-दर्शन पर आधारित “कारुण्य ऋषि” पुस्तक का लोकार्पण  

नागपुर, जनवरी 19, लखेश्वर चंद्रवंशी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हृदय की करुणा और तपस्वी जीवन यही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का परिचय है। उनके द्वारा प्रतिपादित एकात्म-मानव दर्शन का रूप नया है, पर वह है पुराना ही। भारतीय मनीषियों के चिंतन का मूल तत्व है “एकात्म-मानव दर्शन”। सरसंघचालक, डॉ. कुमार शास्त्री द्वारा लिखित “कारुण्य ऋषि” नामक पुस्तक के लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि एकात्म-मानव दर्शन यह एक दर्शन है, यह कोई ‘इज्म’ या ‘वाद’ नहीं। इज्म संकुचित शब्द है। आप इज्म के दायरे को लांघ नहीं सकते, आपको इज्म के चौखट में रहकर ही अपना काम करना होता है जबकि दर्शन व्यापक होता है। दर्शन हर काल में विस्तारित होता है और वह युगानुकुल स्वरूप धारण करता है। लेकिन हम दर्शन के मार्गदर्शन को छोड़कर पाश्चात्य विचारों का अनुकरण कर रहे हैं। इस कारण हमारे जीवन में विडम्बना दिखाई देती है। 

भारतीय विचार मंच, नागपुर द्वारा शंकर नगर स्थित “साई सभागृह” में आयोजित इस लोकार्पण समारोह के दौरान व्यासपीठ पर वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक मा.गो.वैद्य, मराठी साहित्यकार आशा बगे, गिरीश गांधी, लेखक कुमार शास्त्री तथा भारतीय विचार मंच के नागपुर संयोजक उमेश अंधारे विराजमान थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में इस पुस्तक की रचना की गई है।

डॉ. भागवत ने कहा कि हमारे देश में चाणक्य नीति, विदुर नीति, शुक्र नीति बहुत पहले रखी गई है, जो समाज का मार्गदर्शन करती आई है। लेकिन भारत का अपना कोई विचार था ही नहीं, हम जंगली थे, हम अंग्रेजों की वजह से सभ्य बनें, ऐसा हमें बताया गया और हमने गर्दन हिलाकर उसे स्वीकार भी कर लिया। और उसके बाद पाश्चात्य विचारों के अनुकरण का सिलसिला शुरू हो गया। स्वतंत्रता के पश्चात् इसमें कुछ बदलाव आएगा ऐसा लगा था, पर ऐसा हुआ नहीं। ऐसे समय में दीनदयालजी ने एकात्म-मानव दर्शन देश के सामने प्रस्तुत किया। सरसंघचालक ने जोर देते हुए कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश का यह एकमात्र दर्शन है।

सरसंघचालक ने कहा कि सृष्टि के प्रत्येक घटक से हमारा सम्बन्ध है। इसलिए हम सबके कल्याण की कामना करते हैं, हम किसी के नाश की बात नहीं सोचते। हमारी अवधारणा है कि मूल तत्व एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न है, दिश एक है। बहार से दिखनेवाली विविधता को स्वीकारते हुए भी हम सबमें एकात्म को निहारते हैं। यह हमारी विशेषता है। यह सनातन विचार युगानुकुल होता गया। इस सनातन विचार को हमारे मनीषियों ने समय-समय पर जन-जन तक पहुंचाया। स्वामी विवेकानन्द, रविंद्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और योगी अरविन्द ने इस विचार को जन सामान्य तक पहुंचाने का कार्य किया।  
सरसंघचालक ने कहा कि शरीर, मन, बुद्धि या व्यक्ति, समाज, सृष्टि अथवा अर्थ, काम, मोक्ष अलग-अलग नहीं है, वरन सबका एक-दूसरे से सम्बन्ध, सब एक-दूसरे के पूरक हैं। इन सबको जोडनेवाला तत्व है परमेष्ठी। मनुष्य के विकास के साथ ही समाज और सृष्टि का विकास अपनेआप होता है, यह अपना विचार है। धर्म सभी विचारों का चिति (आत्म तत्व) है। अर्थ, कम और मोक्ष में समन्वय साधने का कार्य धर्म करता है। धर्म सबको अनुशासित करता है और सबका मार्गदर्शन भी करता है। इसलिए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि भारत की चिति धर्म है, जबतक भारत में धर्म है दुनिया की कोई ताकत भारत का बाल भी बांका नहीं कर सकता।

डॉ. भागवत ने कहा कि आज साधन बढ़ गए हैं पर मनुष्य के जीवन से सुख, शांति और आराम खो गया है। इसका कारण है संकुचितता। हम अपने संकुचितता को छोड़कर अपने साथ परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के कल्याण का भी विचार करें। समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के प्रति गहन आत्मीयता को लेकर उसके विकास के लिए भी आगे आएं। यही पंडित दीनदयाल के एकात्म-मानव दर्शन का मूल है। पंडितजी ने केवल दर्शन ही नहीं दिया, वरन इस दर्शन को स्वयं जी कर दिखाया। उनके दर्शन से हमारे हृदय में भी समाज के अभावग्रस्त जनमानस के प्रति आत्मीयता जगे, यह आवश्यक है।  

इस अवसर पर वरिष्ठ विचारक मा.गो.वैद्य ने कहा कि समाजवाद और कम्युनिज्म से दौर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म-मानव दर्शन देश के सम्मुख रखा। समाजवाद अर्थ के उत्पादन और वितरण का साधन मात्र है, जबकि दीनदयालजी का दर्शन व्यष्टि से समष्टि को जोड़ता है। वह समाज के अभावग्रस्त व वंचितों के प्रति आत्मीयता को जगाता है। इसके पूर्व लेखक कुमार शास्त्री, आशा बगे, गिरीश गांधी  तथा उमेश अंधारे ने अपने मनोभाव रखे। तत्पश्तात सरसंघचालक डॉ.भागवत तथा व्यासपीठ पर विराजमान मान्यवरों ने “कारुण्य ऋषि” पुस्तक का विमोचन किया। कार्यक्रम का संचलन आशुतोष अडोणी ने किया।