Source: न्यूज़ भारती हिंदी25 Jan 2016 13:06:30

पेशावर के सैनिक स्कूल के मासूमों पर हुए हमले के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि पेशावर एक बार फिर छात्रों के खून से लहूलुहान हो गया है। मजहबी गर्भ से उपजे आतंकवादियों ने पाकिस्तान की सैनिक पाठशाला में बीते साल दिसंबर में करीब डेढ़ सौ छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया। इन छात्रों को कतारबद्ध खड़ा करके सिर और छाती में गोलियां मारी गईं थी। हत्या की यही कू्ररता चारसद्दा के बादशाह खान विश्वविद्यालय में आतंकियों ने दिखाई है। निर्दोष व निहत्थे छात्रों को खून में बदलने वाले ये हत्यारे वाकई दरिंदे थे। इनका धर्म और ईमान से कोई वास्ता नहीं है। इस हमले की जुम्मेबारी तहरीक-ए-तालिबान ने ले ली है। इसी संगठन ने सैनिक स्कूल पर हमला बोला था। तब इसने अपनी प्रतिहिंसा जताते हुए कहा था कि ‘फौजियों के बच्चों को इसलिए मारा गया है, ताकि जिहादियों के खिलाफ वजीरिस्तान में पाक फौज जो मुहिम चला रही है,वह सैनिक अपनों के ही मरने की वैसी ही पीड़ा को समझ सकें।’ जाहिर है, आतंकियों का मासूम इंसानियत और मानवता से कोई वास्ता नहीं रह गया है। ये नए-नए आतंकी गिरोह खड़े करके केवल अपने घिनौने और बर्बर मंसूबों को हिंसक वारदातों से साधने में लगे है। लिहाजा इस पागलपन का इलाज वैश्विक स्तर पर ही तलाशना होगा।

विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ खेली गई इस खूनी होली को पाकिस्तान को एक बड़ी चेतावनी के रूप में लेने की जरुरत है। क्योंकि जिन भस्मासुरों को उसने भारत के खिलाफ खड़ा किया था, अब वे उसी के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं। बच्चों के साथ खूनी खेलकर आतंकियों ने साबित कर दिया है कि उन्हें पाक के भविष्य से कोई वास्ता नहीं है। क्योंकि किसी भी देश के विद्यार्थी कल का भविष्य होते हैं। हालांकि यह घटना उसी के बोए गए आतंकी बीजों का परिणाम है। इन बीजों को जमीन में डालते वक्त पाकिस्तान ने यह कतई नहीं सोचा था कि ये कल विष-फल के रूप में फलित होंगे और कालांतर में उसी को डंसने लग जाएंगे। इनके विषैले होने का पाक को अब पता चल रहा है। क्योंकि अब ये आतंकी न केवल पाक के सैनिक अड्डों पर हमला बोल रहे हैं, बल्कि छात्रों के जिंदगी से भी खेलने लग गए हैं। विवि  पर हुए इस हमले में 25 छात्र मारे गए हैं, यदि रसायनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक सैयद हामिद हुसैन अपनी लाइसेंसी पिस्तौल से आतंकियों का सामना करने आगे नहीं आते तो मारे गए छात्रों की संख्या कहीं ज्यादा होती। हालांकि इस जांबाज को अपनी जान गंवानी पड़ी। ये आतंकी पाक सेना के कराची हवाई अड्डे पर हमला बोलकर उसे कब्जाने की कोशिश कर चुके हैं। इसी हमले के बाद पाक फौज सतर्क हुई और उसने 2014 के जुलाई-अगस्त में उत्तरी वजीरिस्तान के आतंकी अड्डों पर हमला बोलकर करीब 400 आतंकियों को मार गिराया था। यहां इस्लामिक मूवमेंट ऑफ ईस्टर्न तुर्किस्तान, अलकायदा के मार्फत उग्रवादियों को प्रशिक्षित करने के शिविर चला रहा था। इन्हीं आतंकी संगठनों ने अक्टूबर, 2011 में चीन के सीक्यांग प्रांत में आतंकी हमला बोला था। इस घटना के पहले तक चीन भी आतंक की पनाहगाह बना हुआ था, लेकिन इस हमले से जब ऊंट पहाड़ के नीचे आया तो चीन को पता चला कि आतंकवाद क्या होता है? असल में पाले हुए सांप जब डंसते हैं, तब भूल का पता चलता है?

हमलावरों के अरबी भाषी होने से आशंका है, क्योंकि इनके तार कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एण्ड सीरिया से जुड़े हो सकते हैं। इराक के अनेक प्रांतों को कब्जाने के बाद आईएस की ताकत का डंका पूरी दुनिया में बजा है। हालांकि रूस द्वारा सीरिया पर किए जवाबी हमलों के बाद आईएस की ताकत कुछ कमजोर होने लगी है। बावजूद तमाम आतंकवादी संगठन मिलकर दुनिया को इस्लामिक दुनिया में बदलने की फिराक में हैं। तहरीक-ए-तालिबान, आईएस का साथ इसलिए ले सकता है, क्योंकि पाक फौज ने वजीरिस्तान में उसकी कमर तोड़कर रख दी है। वह वजूद के संकट से जूझ रहा है। शायद इसलिए उसने बदले की क्रूरता के चलते छात्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। जिससे उसे दुनिया के अन्य आतंकवादी संगठनों की मदद मिलना शुरू हो जाए? हालांकि उसकी यह हरकत वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से निपटने की भूमिका रचने का आधार भी बनी है। क्योंकि पाकिस्तान का राजतंत्र, आईएसआई और सेना अब अपना नजरिया बदलते दिख रहे हैं। इस हमले के बाद संभव है पाक नेताओं की समझ और परिपक्व हो? यदि पाक दहशतगर्दी को जड़-मूल से खत्म करने की ठोस पहल नहीं करता है तो उसे ऐसे खूनखराबों से निजात मिलना मुश्किल ही है।

पाकिस्तान को भारत के खिलाफ दो मुंही रणनीति से भी मुक्त होना होगा। क्योंकि एक ओर तो वह वजीरिस्तान को आतंक से छुटकारे के लिए फौज को खुली छूट देता है, लेकिन दूसरी तरफ पाक अधिकृत कश्मीर में उसी के सैनिक आंतक का प्रशिक्षण देनेवाले शिविरों का संरक्षण करते हैं। आंतकियों की भारत में घुसपैठ के लिए मदद करते हैं। यहां तक कि पाक सेना की वर्दी भी आंतकियों को पहनाकर नियंत्रण रेखा पर हमला बोलने की व्यूह रचना करते हैं। पठानकोट के वायुसैनिक अड्डे पर हुआ हमला इस दोहरी चाल का ताजा उदाहरण है। मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद जैसे आतंकी को भारत को नुकसान पहुंचाने की दृष्टि से खुला संरक्षण दिया जा रहा है। पाक को अब अपनी सुरक्षा के लिए आतंक के इस संरक्षणवाद से मुक्त होना होगा? हालांकि अब वह समझ रहा है कि आतंकवाद को सरंक्षण देने के परिणाम उसके लिए भी घातक हैं। 

इस्लामिक मजहब के बहाने इस आतंकवाद की पेशावर जैसी ही भयावहता सितंबर, 2004 में रूस में भी देखने में आई थी। तब रूस के उत्तरी ओसेतिया के बेसलान में चेचन इस्लामी कट्टरपंथीयों ने एक विद्यालय में घुसकर करीब 700 छात्रों को बंधक बना लिया था। इन्हें छुड़ाने की सैनिक कार्रवाई में करीब 400 बच्चे हताहत हो गए थे। इस घटना को दुनिया अब तक भूली नहीं है। हालांकि पेशावर में ही आठवें दशक में एक सरकारी स्कूल में आतंकियों ने टाइमबम से हमला बोला था, जिसमें पांच बच्चे खलाक हो गए थे। दुनिया में यदि इन चरमपंथियों की ताकत बढ़ती रही है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इन्हें राज्य-सत्ताओं का सहयोग मिलता रहा है। पाक-सत्ता व सेना भी अपने सामरिक, राजनीतिक और रणनीतिक हित साधने लिए आतंकी संगठनों की पीठ थपथपाती रही है। जिसका दुष्परिणाम उसे अब देखने को मिल रहा है।

पाक की इस घटना से सबसे ज्यादा सचेत भारत को होने की जरुरत है। क्योंकि कमजोर पड़ रहे बौखलाए आतंकवादियों का आसान निशाना भारत ही है। बीते साल मेंहदी मसरूर विश्वास की गिरफ्तारी हुई। इस युवा इंजीनियर के चेहरे से जब नकाब हटा, तब पता चला कि यह आतंकी संगठन आईएस को साइबर तकनीक के स्तर पर मदद कर रहा था। यह अरबी भाषा में लिखे, संदेशों का अंग्रेजी में अनुवाद करके उन्हें ट्विटर पर पोस्ट करता था। जिससे युवा इस्लाम धर्मावलंबियों की मानसिकता को बदला जा सके। करीब दो साल से आतंकी हरकतों को उकसाने के काम में लगे, इस युवा की करतूतों की भनक हमारी सुरक्षा व गुप्तचर एजेंसियों को बड़ी देर से लगी। ब्रिटेन के टीवी चैनल ने जब इस करतूत का खुलासा अपनी खबर में किया, तब कहीं जाकर मेंहदी की गिरफ़्तारी हुई। जाहिर है, भारत को इन सिरफिरे आतंकियों से पाकिस्तान से कहीं ज्यादा सतर्क रहने की जरुरत है। क्योंकि वहां तो आतंकियों ने अफगानिस्तान और इराक की तरह तबाही के आलम का सिलसिला शुरू कर दिया है।